श्रीमद्भगवद्गीता ३.१९ — तस्मादसक्तः सततम्
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✦ अर्थ
कर्मयोग अध्याय का यह श्लोक निष्काम कर्म का सार प्रस्तुत करता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को आदेश देते हैं कि वह अपने कर्तव्य का निरंतर पालन करे, परंतु उसके फल में आसक्ति से मुक्त रहे। रहस्य कर्म त्यागने में नहीं, बल्कि आसक्ति-रहित होकर कर्म करने में है — क्योंकि निष्क्रिय नहीं, अपितु अनासक्त कर्मी ही परमात्मा को प्राप्त करता है। यह सिखाता है कि सही भाव से किया गया कर्म स्वयं मोक्ष का साक्षात् मार्ग बन जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 3, Verse 19 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
तीसरे अध्याय कर्मयोग में अर्जुन पूछते हैं कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो उन्हें कर्म ही क्यों करना चाहिए। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कोई भी क्षणमात्र भी कर्म-रहित नहीं रह सकता, और ज्ञानी लोकहित के लिए कर्म करते हैं। यह श्लोक उसी उपदेश की पराकाष्ठा है: कर्तव्य का निरंतर पालन करो परंतु आसक्ति के बिना, क्योंकि निःस्वार्थ कर्म स्वयं परम लक्ष्य की ओर ले जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
युगों-युगों के कर्मयोगी — निःस्वार्थ राजाओं से लेकर ईश्वर के विनम्र सेवकों तक — संसार को त्यागकर नहीं, अपितु अपने कर्म को पूजा रूप में करके परम साक्षात्कार तक पहुँचे हैं, जो इस श्लोक के इस वचन को प्रमाणित करता है कि अनासक्त कर्ता परमात्मा को प्राप्त करता है।
मंत्र
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तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
tasmād asaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samāchara asakto hyācharan karma param āpnoti pūruṣhaḥ
अर्थ:इसलिए तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य-कर्म का भली-भाँति आचरण करो; क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ३.१९ — तस्मादसक्तः सततम् पाठ के लाभ
फल की चिंता किए बिना कर्म करने का रहस्य प्रकट करता है
साधारण कर्म को परमात्मा तक ले जाने वाली आध्यात्मिक साधना में बदल देता है
मन को तनाव, आसक्ति और असफलता के भय से मुक्त करता है
कर्तव्य को स्थिरता और निःस्वार्थ भाव से करने का अनुशासन बनाता है
हृदय को शुद्ध करता है और कर्म द्वारा मुक्ति के लिए तैयार करता है
यह दिखाकर आलस्य दूर करता है कि सही कर्म, न कि निष्क्रियता, मुक्ति की ओर ले जाता है
श्रीमद्भगवद्गीता ३.१९ — तस्मादसक्तः सततम् जप विधि
इस श्लोक का जप अपने दिन के आरंभ में या किसी भी उत्तरदायित्व को लेने से पूर्व करें, और इसके संदेश से अपने संकल्प को पुनः स्थापित करें: कर्म भली-भाँति करो, परंतु उसके परिणाम पर पकड़ छोड़ दो। यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली है जो महत्वाकांक्षा, दबाव या फल-चिंता से अभिभूत हैं। इसे दोहराकर स्थिर, निःस्वार्थ प्रयास में स्वयं को स्थापित करें, यह विश्वास रखते हुए कि ऐसा कर्म ही आपको परमात्मा की ओर ले जाता है।
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