श्रीमद्भगवद्गीता २.४० — नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति
अन्य नाम / खोज: nehabhikrama nasho asti · na iha abhikrama nasho · bhagavad gita 2.40 · gita 2 40 · svalpam apyasya dharmasya · no effort is lost gita
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✦ अर्थ
इस प्रिय श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता का एक सबसे उत्साहवर्धक आश्वासन देते हैं। निष्काम कर्मयोग के मार्ग पर किया गया कोई भी सच्चा प्रयत्न कभी व्यर्थ नहीं जाता, और अधूरे अभ्यास से किसी हानि की आशंका भी नहीं रहती। इस मार्ग पर किया गया थोड़ा-सा आरम्भ भी जीव को महान् भय — जन्म-मृत्यु के भय — से रक्षा करता है। यह सब संकोच को दूर कर साधक को आरम्भ करने की प्रेरणा देता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 40 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
दूसरे अध्याय सांख्ययोग में श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म (बुद्धियोग / कर्मयोग) के मार्ग का परिचय देना आरम्भ करते हैं। उसे निर्भय होकर इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए श्रीकृष्ण घोषणा करते हैं कि इस मार्ग पर कोई प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता और अधूरे अभ्यास से कोई हानि नहीं होती — इसका थोड़ा-सा भाग भी महान् रक्षा प्रदान करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
यह प्रिय शिक्षा है कि धर्म के मार्ग पर उठाया गया एक भी सच्चा कदम कभी मिटता नहीं; सन्त आश्वासन देते हैं कि जो साधक अधूरा रह जाता है, वह भी उस प्रयास का पुण्य भावी जीवनों में साथ ले जाता है, जहाँ वह फलित होकर उसे गहनतम भयों से बचा लेता है।
मंत्र
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नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt
अर्थ:इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता २.४० — नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति पाठ के लाभ
आध्यात्मिक मार्ग पर संकोच और असफलता के भय को दूर करता है
साधक को आश्वस्त करता है कि कर्मयोग में किया गया कोई सच्चा प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता
यह विश्वास देता है कि थोड़ा-सा आरम्भ भी महान् रक्षा लाता है
बार-बार के जन्म-मृत्यु (संसार) के महान् भय से मुक्त करता है
दृढ़ता को प्रोत्साहित करता है — अधूरे अभ्यास से कोई नकारात्मक फल नहीं होता
किसी भी धर्मपूर्ण कार्य में आशा और स्थिरता भरता है
श्रीमद्भगवद्गीता २.४० — नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति जप विधि
जब भी संदेह या प्रयास के व्यर्थ जाने का भय उठे, इस श्लोक का पाठ करें। इसके आश्वासन को मन में बैठने दें — धर्म के मार्ग पर कोई सच्ची वस्तु कभी नष्ट नहीं होती। यह किसी नई साधना, अध्ययन या श्रेष्ठ कार्य के आरम्भ से पहले विशेष रूप से सहायक है; संकोच को मिटाने और अपने संकल्प को नया करने के लिए इसका पाठ करें, यह विश्वास रखते हुए कि छोटा-सा कदम भी सुरक्षित और फलदायी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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