श्रीमद्भगवद्गीता 13.8 — अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा
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✦ अर्थ
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग अध्याय में श्रीकृष्ण उन गुणों की प्रसिद्ध सूची आरम्भ करते हैं जो मिलकर सच्चा ज्ञान कहलाते हैं। यह श्लोक अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य-सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम को ज्ञान का साधन और लक्षण बताता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 13, Verse 8 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
तेरहवें अध्याय में, श्रीकृष्ण क्षेत्र (खेत, शरीर और प्रकृति) तथा क्षेत्रज्ञ (ज्ञाता, आत्मा) के बीच महान् भेद बताते हैं। ज्ञेय परम का वर्णन करने से पूर्व, वे ज्ञान को सिद्धान्त नहीं, अपितु गुणों की सूची के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसका यह श्लोक आरम्भ है। वेदान्ती आचार्य इस अंश को आध्यात्मिक चरित्र की व्यावहारिक पाठ्यचर्या के रूप में आदर देते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सन्त सिखाते हैं कि जो इस श्लोक के गुणों को निरन्तर विकसित करता है, उसमें ज्ञान स्वयं ही उदित होने लगता है; इसमें वर्णित विनम्रता और आत्मसंयम हृदय को इतना शुद्ध कर देते हैं कि आत्मा निर्बाध रूप से प्रकाशित हो उठती है।
मंत्र
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अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥
amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ
अर्थ:अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता 13.8 — अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा पाठ के लाभ
उन मूलभूत गुणों की सूची देता है जो सच्चा ज्ञान (ज्ञान) रचते हैं
विनम्रता (अमानित्व) और निष्कपटता (अदम्भित्व) विकसित करता है
आचरण में अहिंसा, क्षमा और सरलता को स्थापित करता है
आध्यात्मिक गुरु (आचार्य) के प्रति श्रद्धा और सेवा को प्रोत्साहित करता है
शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम का विकास करता है
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श्रीमद्भगवद्गीता 13.8 — अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा जप विधि
श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और प्रत्येक गुण पर बारी-बारी चिन्तन करें — विनम्रता, निष्कपटता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु-सेवा, शुद्धि, स्थिरता, आत्मसंयम। इसे अपने आचरण की जाँच के लिए दैनिक दर्पण के रूप में प्रयोग करें और जो गुण सबसे दुर्बल हो उसे मृदुता से दृढ़ करें, क्योंकि श्रीकृष्ण इन्हीं गुणों को 'ज्ञान' कहते हैं।
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