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श्रीमद्भगवद्गीता १३.२ — इदं शरीरं कौन्तेय

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातः ध्यान, अथवा आत्म-अन्वेषण और चिन्तनशील स्वाध्याय के समय।·📜 Bhagavad Gita Chapter 13, Verse 2

अन्य नाम / खोज: idam shariram kaunteya · kshetra kshetrajna · kshetrajnam chapi mam viddhi · bhagavad gita 13.2 · gita 13 2 · the body is the field gita verse

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अर्थ

यह श्लोक तेरहवें अध्याय का आरम्भ गीता के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विवेकों में से एक से करता है — शरीर और जो कुछ भी अनुभव किया जाता है वह 'क्षेत्र' है, जबकि शरीर को जानने वाला चेतन आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' (क्षेत्र का ज्ञाता) है। साधक को निरन्तर परिवर्तनशील क्षेत्र और भीतर के साक्षी ज्ञाता के बीच विवेक करना सिखाकर भगवान श्रीकृष्ण आत्मज्ञान की नींव रखते हैं — यह बोध कि हम शरीर नहीं, अपितु उसे जानने वाली चेतना हैं।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 13, Verse 2 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

तेरहवाँ अध्याय, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग, कर्म और भक्ति से मुड़कर शुद्ध ज्ञान की ओर जाता है। अपने आरम्भिक उपदेश में, श्रीकृष्ण शरीर को 'क्षेत्र' और चेतन आत्मा को उसका 'ज्ञाता' बताते हैं, और उस विवेकपूर्ण ज्ञान की नींव रखते हैं जिससे आत्मा शरीर से भिन्न रूप में जानी जाती है।

शास्त्रों में वर्णित

वेदान्त के आचार्यों ने इस एकमात्र विवेक — क्षेत्र और ज्ञाता — को मुक्ति का द्वार माना है; अनेक साधक बताते हैं कि केवल इस सत्य को धारण करना 'मैं ज्ञाता हूँ, क्षेत्र नहीं' — दीर्घकालीन मृत्यु-भय को विगलित कर अटल आन्तरिक शान्ति प्रकट कर देता है।

मंत्र

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श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥

śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ

अर्थ:श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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श्रीभगवानुवाच🔊śhrī-bhagavān uvāchaश्रीभगवान् बोले
इदम्🔊idamयह
शरीरम्🔊śharīramशरीर
कौन्तेय🔊kaunteyaहे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
क्षेत्रम्🔊kṣhetramक्षेत्र (कर्मों का खेत)
इति🔊itiइस प्रकार
अभिधीयते🔊abhidhīyateकहा जाता है
एतत्🔊etatइसे
यः🔊yaḥजो
वेत्ति🔊vettiजानता है
तम्🔊tamउस पुरुष को
प्राहुः🔊prāhuḥकहते हैं
क्षेत्रज्ञः🔊kṣhetra-jñaḥक्षेत्र का ज्ञाता
इति🔊itiइस प्रकार
तद्विदः🔊tat-vidaḥतत्त्व को जानने वाले, ज्ञानीजन

श्रीमद्भगवद्गीता १३.२ — इदं शरीरं कौन्तेय पाठ के लाभ

शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (ज्ञाता) के बीच मूलभूत विवेक की स्थापना करता है

आत्मज्ञान जगाता है — यह बोध कि हम साक्षी चेतना हैं

परिवर्तनशील शरीर से तादात्म्य ढीला कर वैराग्य और शान्ति लाता है

ध्यान और आन्तरिक अन्वेषण के लिए स्पष्ट ढाँचा देता है

नश्वर क्षेत्र के पीछे अमर ज्ञाता को प्रकट कर भय और शोक घटाता है

साधक को मुक्ति देने वाले ज्ञान (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ ज्ञान) की ओर ले जाता है

श्रीमद्भगवद्गीता १३.२ — इदं शरीरं कौन्तेय जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातः ध्यान, अथवा आत्म-अन्वेषण और चिन्तनशील स्वाध्याय के समय।

इस श्लोक को 'मैं कौन हूँ?' पर चिन्तन के आरम्भ के रूप में पढ़ें। जब आप 'क्षेत्रम्' (क्षेत्र) और 'क्षेत्रज्ञ' (ज्ञाता) का उच्चारण करें, तो मन को एक ओर शरीर और अनुभवों, तथा दूसरी ओर उन्हें जानने वाली मौन चेतना के बीच भेद करने दें। ध्यान से पूर्व इसका प्रयोग कर साक्षी ज्ञाता के रूप में अपनी पहचान में स्थिर हों, जो सभी दृश्य और अनुभूत के पीछे शान्ति से विद्यमान रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण तेरहवें अध्याय का मुख्य विवेक प्रस्तुत करते हैं — शरीर 'क्षेत्र' है, और शरीर को जानने वाला चेतन आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' है। यह श्लोक अनुभूत (दृश्य) को अनुभवकर्ता (द्रष्टा) से पृथक् करके आत्मज्ञान का उपदेश आरम्भ करता है।
क्षेत्र शरीर है, मन, इन्द्रियों और सभी अनुभूत वस्तुओं सहित — अनुभव का रंगमंच। क्षेत्रज्ञ वह चेतन आत्मा है, साक्षी जो क्षेत्र के प्रति जागरूक है। इन दोनों के बीच विवेक ही इस अध्याय का हृदय है।
क्योंकि मुक्ति तब आरम्भ होती है जब हम नश्वर शरीर से तादात्म्य त्याग कर स्वयं को अमर ज्ञाता के रूप में पहचानते हैं। यह विवेक भय, शोक और आसक्ति को विगलित करता है, और ध्यान, आत्म-अन्वेषण तथा मुक्तिदायक ज्ञान का आधार बनता है।
दिनभर, जो आप अनुभव करते हैं (संवेदनाएँ, विचार, शरीर — क्षेत्र) और जो उन्हें जानता है (ज्ञाता) — इन दोनों के अन्तर को धीरे से देखें। इस श्लोक का पाठ उस विवेक को दृढ़ करता है, जिससे वैराग्य, स्थिरता और आन्तरिक शान्ति आती है।

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