देहिनोऽस्मिन्यथा देहे
अन्य नाम / खोज: dehino smin yatha dehe · bhagavad gita 2.13 · gita chapter 2 verse 13 · kaumaram yauvanam jara · dehantara prapti verse
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✦ अर्थ
भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 13) का यह प्रसिद्ध श्लोक आत्मा की नित्यता और पुनर्जन्म पर भगवान श्रीकृष्ण का मूलभूत उपदेश है। वे आत्मा के मृत्यु पर एक देह से दूसरे देह में जाने की तुलना उसी शरीर के बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था के क्रम से करते हैं — एक स्वाभाविक, निरंतर परिवर्तन। इसलिए धीर और ज्ञानी पुरुष मृत्यु पर शोक नहीं करते, क्योंकि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 13 · Spoken by Lord Krishna to Arjuna; recorded by Sage Veda Vyasa in the Mahabharata (Bhishma Parva) · Ancient (part of the Mahabharata, traditionally dated to the Dvapara Yuga)
कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर अर्जुन अपने गुरुओं, बुजुर्गों और स्वजनों से युद्ध करने और उनका वध करने के विचार से शोक से जड़ हो गया था। गीता का दर्शन वास्तव में यहीं दूसरे अध्याय, सांख्य योग में आरम्भ होता है, जहाँ श्रीकृष्ण आत्मा के सच्चे स्वरूप को प्रकट कर अर्जुन के शोक को दूर करते हैं। यह श्लोक उस उपदेश के पहले और सबसे प्रसिद्ध कथनों में से एक है — आत्मा नित्य है और केवल देह से देह में संक्रमण करती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
युगों-युगों से ऋषियों और भक्तों ने मृत्यु के क्षण में इस श्लोक से साहस प्राप्त किया है, अपनी अन्तिम साँस को निर्भय होकर सामना किया है क्योंकि वे जानते थे कि आत्मा कभी नहीं मारी जाती। कहा जाता है कि मृत्यु के समय इस एक श्लोक का चिंतन मन को स्थिर कर देता है और मृत्यु को भय से शान्त संक्रमण में बदल देता है।
मंत्र
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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati
अर्थ:जैसे इस देह में देही (जीवात्मा) की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे पाठ के लाभ
आत्मा के नित्य, अमर स्वरूप को प्रकट कर मृत्यु के भय को दूर करता है
प्रियजनों के वियोग में शोकग्रस्त लोगों को सान्त्वना और धैर्य प्रदान करता है
आत्मा और पुनर्जन्म की मूलभूत वेदान्तिक समझ को स्थापित करता है
देह और जीवन की बदलती अवस्थाओं के प्रति समता और वैराग्य का विकास करता है
एक ही जीवन से परे आत्मा की निरंतरता में आध्यात्मिक विश्वास को दृढ़ करता है
इस श्लोक का जप शोक और संक्रमण के समय व्याकुल मन को शान्त करता है
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे जप विधि
शान्त बैठकर इस श्लोक का संस्कृत में धीरे-धीरे पाठ करें, इस अर्थ पर चिंतन करते हुए कि आत्मा केवल वैसे ही शरीर बदलती है जैसे मनुष्य जीवन की अवस्थाएँ बदलता है। इसे 3, 11 या 21 बार जपा जा सकता है। यह श्लोक विशेषकर दिवंगत की शान्ति के लिए तथा शोकग्रस्त को सान्त्वना देने के लिए, भीतर स्थित अमर आत्मा का ध्यान करते हुए पढ़ा जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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