देहिनोऽस्मिन्यथा देहे — Word-by-Word Meaning
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
देहिनः
dehinaḥ
देही (देह में रहने वाली जीवात्मा) का
अस्मिन्
asmin
इस में
यथा
yathā
जैसे
देहे
dehe
देह में
कौमारम्
kaumāram
बाल्यावस्था
यौवनम्
yauvanam
युवावस्था
जरा
jarā
वृद्धावस्था
तथा
tathā
वैसे ही, उसी प्रकार
देहान्तर
dehāntara
दूसरा शरीर
प्राप्तिः
prāptiḥ
प्राप्ति, अर्जन
धीरः
dhīraḥ
धीर, ज्ञानी, स्थिरबुद्धि पुरुष
तत्र
tatra
इसमें, इस विषय में
न मुह्यति
na muhyati
मोहित नहीं होता, शोक नहीं करता
Complete Translation
जैसे इस देह में देही (जीवात्मा) की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 13
Author: Spoken by Lord Krishna to Arjuna; recorded by Sage Veda Vyasa in the Mahabharata (Bhishma Parva)
Period: Ancient (part of the Mahabharata, traditionally dated to the Dvapara Yuga)
कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर अर्जुन अपने गुरुओं, बुजुर्गों और स्वजनों से युद्ध करने और उनका वध करने के विचार से शोक से जड़ हो गया था। गीता का दर्शन वास्तव में यहीं दूसरे अध्याय, सांख्य योग में आरम्भ होता है, जहाँ श्रीकृष्ण आत्मा के सच्चे स्वरूप को प्रकट कर अर्जुन के शोक को दूर करते हैं। यह श्लोक उस उपदेश के पहले और सबसे प्रसिद्ध कथनों में से एक है — आत्मा नित्य है और केवल देह से देह में संक्रमण करती है।
Frequently Asked Questions
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे का अर्थ क्या है?▼
इसका अर्थ है — 'जैसे देही (आत्मा) इस देह में बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था से गुजरता है, वैसे ही मृत्यु के पश्चात उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है; धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।' यह भगवद्गीता 2.13 में आत्मा की नित्यता और पुनर्जन्म पर श्रीकृष्ण का मूल उपदेश है।
श्रीकृष्ण यह श्लोक अर्जुन से क्यों कहते हैं?▼
अर्जुन युद्ध में अपने स्वजनों की मृत्यु के विचार से शोक से व्याकुल था। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती — वह केवल पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करती है, जैसे मनुष्य स्वाभाविक रूप से बाल्यावस्था से वृद्धावस्था में जाता है। अतः ज्ञानी पुरुष मृत्यु पर शोक नहीं करता।
श्लोक में वर्णित 'धीर' (स्थिर पुरुष) कौन है?▼
धीर वह ज्ञानी, आत्मसंयमी पुरुष है जो नित्य आत्मा और नश्वर शरीर के भेद को समझता है। इस ज्ञान के कारण वह मृत्यु के समक्ष भी अविचलित और मोहरहित रहता है।
क्या यह श्लोक दिवंगत आत्मा के लिए जपा जा सकता है?▼
हाँ। यह श्लोक परंपरागत रूप से शोक के समय और दिवंगत के स्मरण में, आत्मा के अविनाशी स्वरूप के ध्यान के रूप में पढ़ा जाता है। यह शोकग्रस्त को शान्ति देता है और इस सत्य की पुष्टि करता है कि आत्मा अमर है।
Ready to start chanting?
See Benefits & How to Chant →