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श्रीमद्भगवद्गीता 2.56 — दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः से पूर्व) या किसी भी शान्त ध्यान-समय·📜 Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 56

अन्य नाम / खोज: duhkheshv anudvigna manah · bhagavad gita 2.56 · gita chapter 2 verse 56 · sthitaprajna shloka · sthita dhir munir uchyate

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अर्थ

यह प्रसिद्ध श्लोक स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि वाले मुनि का लक्षण बताता है। ऐसा पुरुष दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख की लालसा नहीं करता और राग, भय तथा क्रोध से रहित रहता है। यह दूसरे अध्याय के अंत में दिए गए स्थितप्रज्ञ-वर्णन का अंग है, जो पूर्ण समता का चित्र प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 56 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)

जब अर्जुन श्रीकृष्ण से स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के लक्षण पूछते हैं, तो श्रीकृष्ण दीप्तिमान श्लोकों की एक श्रृंखला से उत्तर देते हैं, जिनमें यह सर्वाधिक प्रिय श्लोकों में से एक है। यह समस्त योग के लक्ष्य को सार रूप में प्रस्तुत करता है — ऐसा सन्तुलित मन जिसे न शोक न सुख विचलित कर सके। पीढ़ियों से साधक इन श्लोकों को आत्म-परीक्षण के दैनिक दर्पण रूप में कण्ठस्थ करते आए हैं।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा में यह सिखाया जाता है कि जो स्थितप्रज्ञ के श्लोकों पर ध्यान करता है, वह धीरे-धीरे उनके गुण प्राप्त कर लेता है; सन्त ऐसे भक्तों का वर्णन करते हैं कि वे सांसारिक जीवन के तूफानों के बीच भी वायुरहित स्थान में स्थित दीपक के समान शान्त रहते हैं।

मंत्र

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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

duḥkheṣhv-anudvigna-manāḥ sukheṣhu vigata-spṛihaḥ vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir uchyate

अर्थ:दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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दुःखेषु🔊duḥkheṣhuदुःखों में
अनुद्विग्नमनाः🔊anudvigna-manāḥजिसका मन विचलित नहीं होता
सुखेषु🔊sukheṣhuसुखों में
विगतस्पृहः🔊vigata-spṛihaḥलालसा से रहित
वीत🔊vītaरहित
राग🔊rāgaराग, आसक्ति
भय🔊bhayaभय
क्रोधः🔊krodhaḥक्रोध
स्थितधीः🔊sthita-dhīḥस्थिर बुद्धि वाला, आत्मज्ञानी पुरुष
मुनिः🔊muniḥमुनि
उच्यते🔊uchyateकहलाता है

श्रीमद्भगवद्गीता 2.56 — दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः पाठ के लाभ

स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि वाले मुनि — के गुणों को परिभाषित करता है

मन को दुःख में अविचल और सुख में अनासक्त रहने में सहायता करता है

हृदय को राग, भय और क्रोध से मुक्त करता है

अटल आन्तरिक शान्ति विकसित करने का दैनिक चिन्तन है

साधक को आत्म-संयम और भावनात्मक सन्तुलन की ओर ले जाता है

उस समता की प्रेरणा देता है जो ध्यान और भक्ति की नींव है

श्रीमद्भगवद्गीता 2.56 — दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयब्रह्म मुहूर्त (प्रातः से पूर्व) या किसी भी शान्त ध्यान-समय

श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और प्रत्येक गुण पर चिन्तन करें — दुःख में अविचल, सुख में लालसा-रहित, राग, भय और क्रोध से परे। इसे दैनिक आत्म-समीक्षा के रूप में प्रयोग करें — जहाँ मन विचलित हो, उसे धीरे से देखें और स्थितप्रज्ञ की स्थिर, साक्षी शान्ति की ओर लौटने का संकल्प करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्थितप्रज्ञ वह 'स्थिर बुद्धि वाला' पुरुष है जिसकी बुद्धि आत्मा में दृढ़तापूर्वक स्थित है। जैसा यह श्लोक बताता है, ऐसा मुनि दुःख से विचलित नहीं होता, सुख में लालसा नहीं रखता और राग, भय तथा क्रोध से मुक्त रहता है।
राग (आसक्ति) से ही हानि का भय और कामना के बाधित होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। श्रीकृष्ण तीनों का नाम लेते हैं क्योंकि आसक्ति से मुक्ति स्वाभाविक रूप से भय और क्रोध को मिटा देती है, जिससे स्थायी शान्ति मिलती है।
हाँ। यह गीता की भावनात्मक समता पर सबसे स्पष्ट शिक्षाओं में से एक है। इस पर नियमित चिन्तन मन को विपत्ति में शान्त और सफलता में सन्तुलित रहने का अभ्यास कराता है, जो योग का सार है।
यह दूसरे अध्याय (सांख्ययोग) के अन्तिम भाग का है, जहाँ अर्जुन पूछते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता, बैठता और चलता है, और श्रीकृष्ण इस प्रसिद्ध वर्णन से उत्तर देते हैं।

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