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श्रीमद्भगवद्गीता २.६९ — या निशा सर्वभूतानां

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या ध्यान से पूर्व; तथा रात्रि में सोने से पहले मनन के लिए भी·📜 Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 69

अन्य नाम / खोज: ya nisha sarva bhutanam · ya nisha sarvabhutanam tasyam jagarti samyami · bhagavad gita 2.69 · gita 2 69 · sa nisha pashyato muneh · sthitaprajna verse

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अर्थ

यह गहन श्लोक आत्मज्ञानी स्थितप्रज्ञ मुनि के अन्तर्जीवन का वर्णन करता है। जिस ओर सामान्य प्राणी उदासीन रहते हैं — शाश्वत आत्मा और आध्यात्मिक सत्य — उसी में ज्ञानी पूर्णतः जागता और तल्लीन रहता है। और जिसके लिए संसार जागता रहता है — विषय और सांसारिक भोग — वह मुनि के लिए रात्रि के समान है, जिसमें वह कोई सार नहीं देखता। यह आत्मज्ञान से उत्पन्न दृष्टि के पूर्ण परिवर्तन को प्रकट करता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 69 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

दूसरे अध्याय सांख्ययोग के अन्त की ओर श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ — स्थिर, सुदृढ़ बुद्धि वाले पुरुष — का वर्णन करते हैं। यह श्लोक उसी चित्र का अंग है, जो आत्मज्ञान में स्थित पुरुष की दृष्टि के आन्तरिक परिवर्तन को दर्शाता है — जो शाश्वत के प्रति जागृत रहते हुए क्षणभंगुर संसार से अनासक्त रहता है।

शास्त्रों में वर्णित

ऋषि कहते हैं कि जो इस श्लोक को सच्चे अर्थ में ग्रहण कर लेता है, वह संसार में एक प्रकार की 'जागृत निद्रा' में जीने लगता है — बाहर से उपस्थित और सक्रिय, फिर भी भीतर से अपरिवर्तनशील आत्मा में तल्लीन, उन विक्षोभों से अछूता जो सामान्य मनों से शान्ति छीन लेते हैं।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

yā niśhā sarva-bhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti sanyamī yasyāṁ jāgrati bhūtāni sā niśhā paśhyato muneḥ

अर्थ:सब प्रणियों के लिए जो रात्रि है? उसमें संयमी पुरुष जागता है और जहाँ सब प्राणी जागते हैं? वह (तत्त्व को) देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

या🔊जो
निशा🔊niśhāरात्रि
सर्वभूतानाम्🔊sarva-bhūtānāmसब प्राणियों की
तस्याम्🔊tasyāmउसमें
जागर्ति🔊jāgartiजागता है
संयमी🔊sanyamīसंयमी पुरुष
यस्याम्🔊yasyāmजिसमें
जाग्रति🔊jāgratiजागते हैं
भूतानि🔊bhūtāniप्राणी, जीव
सा🔊वह
निशा🔊niśhāरात्रि
पश्यतः🔊paśhyataḥदेखने वाले की
मुनेः🔊muneḥमुनि की

श्रीमद्भगवद्गीता २.६९ — या निशा सर्वभूतानां पाठ के लाभ

आत्मसाक्षात्कारी मुनि (स्थितप्रज्ञ) की अन्तर्दृष्टि प्रकट करता है

मन को विषय-सुखों से शाश्वत आत्मा की ओर मोड़ने में सहायता करता है

सत् और असत् के बीच विवेक विकसित करता है

सांसारिक विक्षेपों से वैराग्य की प्रेरणा देता है

यह स्पष्ट करके ध्यान को गहरा करता है कि किसके प्रति जागना वास्तव में योग्य है

बाहरी दौड़ के बजाय आन्तरिक जागृति से स्थायी शान्ति देता है

श्रीमद्भगवद्गीता २.६९ — या निशा सर्वभूतानां जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या ध्यान से पूर्व; तथा रात्रि में सोने से पहले मनन के लिए भी

इस श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और यन्त्रवत् जपने के बजाय इसके अर्थ पर चिन्तन करें। विचार करें कि दिन भर आप किसके प्रति 'जागृत' रहते हैं — और धीरे से अपनी जागरूकता उस भीतरी आत्मा की ओर मोड़ें जिसके प्रति मुनि जागता है। यह रात्रि में सोने से पूर्व आत्म-विचार के लिए तथा ध्यान से पहले मन को स्थिर करने के लिए उत्तम श्लोक है, जो बाहरी विक्षेपों से हटकर भीतरी स्थिरता में प्रवेश कराता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्लोक 'रात्रि' और 'जागना' का प्रतीकात्मक प्रयोग करता है। मुनि शाश्वत आत्मा के ज्ञान में 'जागता' (सजग और तल्लीन) रहता है, जिसे सामान्य लोग 'रात्रि' मानकर उपेक्षा करते हैं। इसके विपरीत, जिन सांसारिक विषयों के लिए संसार 'जागता' है, वे मुनि के लिए 'रात्रि' हैं — वह उनमें कोई वास्तविक सार नहीं देखता।
मुनि वही स्थितप्रज्ञ है — स्थिर बुद्धि वाला पुरुष जिसका वर्णन दूसरे अध्याय के उत्तरार्ध में किया गया है। ऐसे मुनि ने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, मन को विषयों से हटा लिया है, और भीतरी सत्य तथा शान्ति में स्थित रहता है।
नहीं, यह पूर्णतः प्रतीकात्मक है। यह वास्तविक सोने-जागने के विषय में नहीं, बल्कि इस विषय में है कि किसकी ओर किसी की चेतना और रुचि लगी है। मुनि भीतर से आत्मा के प्रति जागृत रहता है, साथ ही सांसारिक चिन्ताओं से अनासक्त रहता है जो अधिकांश लोगों को बाँधे रखती हैं।
यह आत्म-परीक्षण को आमन्त्रित करता है — स्वयं से पूछें कि आप किसके प्रति सर्वाधिक 'जागृत' हैं। धीरे-धीरे ध्यान को शाश्वत आत्मा की ओर मोड़कर और अनन्त विषय-दौड़ से हटाकर, साधक आत्मसाक्षात्कारी मुनि की आन्तरिक जागृति और शान्ति के निकट पहुँचता है।

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