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श्रीमद्भगवद्गीता २.५५ — प्रजहाति यदा कामान्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकालीन ध्यान अथवा सायंकाल आन्तरिक सन्तोष और आत्म-संयम पर मनन के समय·📜 Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 55

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अर्थ

यह श्लोक स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि वाले ज्ञानी — के उस प्रसिद्ध वर्णन का आरम्भ है, जो श्रीकृष्ण अर्जुन के इस प्रश्न के उत्तर में देते हैं कि ऐसा पुरुष कैसे बोलता, बैठता और चलता है। श्रीकृष्ण की पहली कसौटी आन्तरिक स्वतन्त्रता है — जब मनुष्य मन की प्रत्येक कामना का त्याग कर देता है और केवल आत्मा में ही पूर्ण सन्तोष पा लेता है, बाहर किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती, तब उसने अटल ज्ञान प्राप्त कर लिया है। यह श्लोक आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्य को भीतर पाई जाने वाली तृप्ति के रूप में परिभाषित करता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 55 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

सांख्ययोग अध्याय के अन्त में अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता, बैठता और चलता है। श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ का एक दीप्तिमान चित्र प्रस्तुत करते हुए यहाँ से आरम्भ करते हैं — ऐसा पुरुष मन की सब कामनाओं को त्याग चुका है और केवल आत्मा में ही पूर्ण सन्तुष्ट है। ये श्लोक आत्मज्ञानी ऋषि का शास्त्रीय वर्णन बन गए।

शास्त्रों में वर्णित

ऋषियों ने स्थितप्रज्ञ के इन श्लोकों को सदा आत्म-परीक्षण का दर्पण माना है, और भक्त बताते हैं कि 'प्रजहाति यदा कामान्' पर चिन्तन करने से कामना की निरन्तर खिंचावट ढीली पड़ गई, और बेचैनी का स्थान एक शान्त, आत्मनिर्भर सन्तोष ने ले लिया, जिसे कोई बाहरी हानि हिला नहीं सकी।

मंत्र

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श्रीभगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

śhrī bhagavān uvācha prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān ātmany-evātmanā tuṣhṭaḥ sthita-prajñas tadochyate

अर्थ:श्री भगवान् ने कहा — हे पार्थ! जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

श्रीभगवान् उवाच🔊śhrī bhagavān uvāchaश्री भगवान् ने कहा
प्रजहाति🔊prajahātiत्याग देता है, पूरी तरह छोड़ देता है
यदा🔊yadāजब
कामान्🔊kāmānकामनाएँ, स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ
सर्वान्🔊sarvānसब
पार्थ🔊pārthaहे पार्थ (अर्जुन, पृथा-पुत्र)
मनः-गतान्🔊manaḥ-gatānमन की, मन में स्थित
आत्मनि🔊ātmaniआत्मा में
एव🔊evaकेवल, ही
आत्मना🔊ātmanāआत्मा से, शुद्ध मन से
तुष्टः🔊tuṣhṭaḥसन्तुष्ट, तृप्त
स्थित-प्रज्ञः🔊sthita-prajñaḥस्थिर बुद्धि वाला, जिसकी बुद्धि अटल है
तदा🔊tadāतब, उस समय
उच्यते🔊uchyateकहा जाता है, कहलाता है

श्रीमद्भगवद्गीता २.५५ — प्रजहाति यदा कामान् पाठ के लाभ

स्थिर बुद्धि वाले पुरुष (स्थितप्रज्ञ) के लक्षण प्रकट करता है

साधक को आत्मा में स्थायी सन्तोष पाने का मार्ग दिखाता है

चंचल मन की अनन्त कामनाओं को छोड़ने में सहायता करता है

बाहरी परिस्थितियों से स्वतन्त्र आन्तरिक शान्ति का विकास करता है

समता, आत्म-संयम और कामना से मुक्ति की प्रेरणा देता है

आध्यात्मिक मार्ग के लक्ष्य का ध्यानमय आदर्श बनता है

श्रीमद्भगवद्गीता २.५५ — प्रजहाति यदा कामान् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकालीन ध्यान अथवा सायंकाल आन्तरिक सन्तोष और आत्म-संयम पर मनन के समय

इस श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और उस अवस्था पर चिन्तन करें जिसमें मनुष्य मन की कामनाओं से मुक्त होकर अपने भीतर ही सन्तुष्ट रहता है। इसे प्रतिदिन की आकांक्षा बनाएँ कि तृप्ति बाहरी वस्तुओं में नहीं, भीतर की ओर मुड़कर खोजें। चिन्तन के साथ बार-बार दोहराने पर यह धीरे-धीरे कामना की पकड़ ढीली करता है और मन को आत्मा की शान्ति में स्थिर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला पुरुष (स्थितप्रज्ञ) वह है जिसने मन की सब स्वार्थपूर्ण कामनाओं को त्याग दिया है और केवल आत्मा में ही पूर्ण सन्तुष्ट रहता है। सच्ची और स्थायी तृप्ति बाहरी वस्तुओं से नहीं, अपने भीतरी स्वरूप में टिकने से मिलती है।
स्थितप्रज्ञ वह ज्ञानी है जिसकी बुद्धि स्थिर और दृढ़ है — जो सुख या दुःख से विचलित नहीं होता। श्लोक 2.55 उन कई श्लोकों (2.55–2.72) में से पहला है जिनमें श्रीकृष्ण ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष के गुण, आचरण और शान्ति का वर्णन करते हैं।
यह मन की उन स्वार्थपूर्ण, बाँधने वाली कामनाओं से मुक्ति की ओर संकेत करता है जो आन्तरिक शान्ति को भंग करती हैं। उद्देश्य निर्जीव दमन नहीं, बल्कि वह स्वाभाविक पूर्णता है जिसमें मनुष्य सुख के लिए बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता, क्योंकि उसने आत्मा में ही पूर्ण सन्तोष पा लिया है।
एक के बाद एक कामना का पीछा करने के बजाय सन्तोष के लिए भीतर की ओर मुड़ने का अभ्यास करें। जब मन कुछ चाहे, स्वयं को धीरे से याद दिलाएँ कि स्थायी शान्ति भीतर है। समय के साथ यह स्थितप्रज्ञ का स्थिर, शान्त मन विकसित करता है और बेचैनी से मुक्त करता है।

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