श्रीमद्भगवद्गीता २.५५ — प्रजहाति यदा कामान् — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता २.५५ — प्रजहाति यदा कामान्
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
श्रीभगवान् उवाच
śhrī bhagavān uvācha
श्री भगवान् ने कहा
प्रजहाति
prajahāti
त्याग देता है, पूरी तरह छोड़ देता है
यदा
yadā
जब
कामान्
kāmān
कामनाएँ, स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ
सर्वान्
sarvān
सब
पार्थ
pārtha
हे पार्थ (अर्जुन, पृथा-पुत्र)
मनः-गतान्
manaḥ-gatān
मन की, मन में स्थित
आत्मनि
ātmani
आत्मा में
एव
eva
केवल, ही
आत्मना
ātmanā
आत्मा से, शुद्ध मन से
तुष्टः
tuṣhṭaḥ
सन्तुष्ट, तृप्त
स्थित-प्रज्ञः
sthita-prajñaḥ
स्थिर बुद्धि वाला, जिसकी बुद्धि अटल है
तदा
tadā
तब, उस समय
उच्यते
uchyate
कहा जाता है, कहलाता है
Complete Translation
श्री भगवान् ने कहा — हे पार्थ! जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 55
Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)
Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
सांख्ययोग अध्याय के अन्त में अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता, बैठता और चलता है। श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ का एक दीप्तिमान चित्र प्रस्तुत करते हुए यहाँ से आरम्भ करते हैं — ऐसा पुरुष मन की सब कामनाओं को त्याग चुका है और केवल आत्मा में ही पूर्ण सन्तुष्ट है। ये श्लोक आत्मज्ञानी ऋषि का शास्त्रीय वर्णन बन गए।
Frequently Asked Questions
भगवद्गीता 2.55 की मुख्य शिक्षा क्या है?▼
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला पुरुष (स्थितप्रज्ञ) वह है जिसने मन की सब स्वार्थपूर्ण कामनाओं को त्याग दिया है और केवल आत्मा में ही पूर्ण सन्तुष्ट रहता है। सच्ची और स्थायी तृप्ति बाहरी वस्तुओं से नहीं, अपने भीतरी स्वरूप में टिकने से मिलती है।
स्थितप्रज्ञ कौन है?▼
स्थितप्रज्ञ वह ज्ञानी है जिसकी बुद्धि स्थिर और दृढ़ है — जो सुख या दुःख से विचलित नहीं होता। श्लोक 2.55 उन कई श्लोकों (2.55–2.72) में से पहला है जिनमें श्रीकृष्ण ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष के गुण, आचरण और शान्ति का वर्णन करते हैं।
क्या यह श्लोक सब इच्छाएँ छोड़ने को कहता है?▼
यह मन की उन स्वार्थपूर्ण, बाँधने वाली कामनाओं से मुक्ति की ओर संकेत करता है जो आन्तरिक शान्ति को भंग करती हैं। उद्देश्य निर्जीव दमन नहीं, बल्कि वह स्वाभाविक पूर्णता है जिसमें मनुष्य सुख के लिए बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता, क्योंकि उसने आत्मा में ही पूर्ण सन्तोष पा लिया है।
इस श्लोक को दैनिक जीवन में कैसे अपनाएँ?▼
एक के बाद एक कामना का पीछा करने के बजाय सन्तोष के लिए भीतर की ओर मुड़ने का अभ्यास करें। जब मन कुछ चाहे, स्वयं को धीरे से याद दिलाएँ कि स्थायी शान्ति भीतर है। समय के साथ यह स्थितप्रज्ञ का स्थिर, शान्त मन विकसित करता है और बेचैनी से मुक्त करता है।
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