ध्यायतो विषयान्पुंसः
अन्य नाम / खोज: dhyayato vishayan pumsah sangas teshupajayate · dhyayato vishayan · bhagavad gita 2.62
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✦ अर्थ
भगवद्गीता 2.62 मन के पतन के मनोविज्ञान को दर्शाती है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि विषयों का चिन्तन आसक्ति को जन्म देता है, आसक्ति से इच्छा उत्पन्न होती है, और अधूरी इच्छा क्रोध में बदल जाती है। अगले श्लोक के साथ यह उस श्रृंखला को दर्शाती है जो भटकते मन से विनाश तक ले जाती है, और साधक को मन की रक्षा करने की चेतावनी देती है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 62 · Veda Vyasa (Lord Krishna's teaching) · Itihasa (Mahabharata)
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय सांख्य योग में भगवान श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का वर्णन करते हैं। अनियंत्रित मन के खतरे को दिखाने के लिए वे इस श्लोक में यह बताते हैं कि केवल विषयों का चिन्तन किस प्रकार आसक्ति, फिर इच्छा, फिर क्रोध को जन्म देता है — एक ऐसी श्रृंखला जो अगले श्लोक में पूर्ण विनाश की ओर ले जाती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
आचार्य इस श्लोक को आन्तरिक जीवन का दर्पण बताते हैं: वे कहते हैं कि अनगिनत पतन एक ही भोगपूर्ण विचार से आरम्भ होते हैं; जो व्यक्ति यहाँ, श्रृंखला की पहली कड़ी पर ही मन को देखना सीख लेता है, वह उस क्रोध और मोह से बच जाता है जो अन्यथा उसके बाद आते।
मंत्र
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ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
अर्थ:विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है; आसक्ति से इच्छा (काम) और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ध्यायतो विषयान्पुंसः पाठ के लाभ
मन के पतन की सूक्ष्म श्रृंखला को प्रकट करती है — चिन्तन, आसक्ति, इच्छा, क्रोध।
आत्म-संयम का प्रबल साधन, जो हानिकारक विचारों को उनके मूल में ही पकड़ने में सहायक है।
मन को अस्वस्थ कामनाओं और विवेक के नाश से बचाने के लिए इसका पाठ और चिन्तन किया जाता है।
क्रोध और इच्छा के मनोविज्ञान को सिखाती है, ऐसी जागरूकता लाती है जो आन्तरिक नियंत्रण की ओर ले जाती है।
वैराग्य (निर्लिप्तता) और आध्यात्मिक मार्ग पर मन की स्थिरता को विकसित करने में सहायक है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः जप विधि
इस श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें और इसमें वर्णित प्रत्येक कड़ी पर चिन्तन करें — किस प्रकार विषयों का चिन्तन चरण-दर-चरण आसक्ति, इच्छा और क्रोध की ओर ले जाता है। इसका आत्म-जागरूकता के साधन के रूप में चिन्तन किया जाता है, ताकि हानिकारक मानसिक प्रवृत्तियों को उनके स्रोत पर ही पहचाना और रोका जा सके।
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