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श्रीमद्भगवद्गीता ६.१९ — यथा दीपो निवातस्थो

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 ध्यान के लिए बैठने से पहले, प्रातःकाल या संध्या के समय किसी शांत स्थान में·📜 Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 19

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अर्थ

श्रीकृष्ण समस्त योग की सबसे सुंदर छवियों में से एक प्रस्तुत करते हैं: वायुरहित स्थान में जलता दीपक, पूर्णतः स्थिर। ऐसा ही उस योगी का चित्त होता है जिसने अपने विचारों को संयमित कर लिया है और जो आत्मा के ध्यान में निरंतर लीन है — निष्कंप, शांत और प्रकाशमान। यह श्लोक ध्यानयोग के लक्ष्य का वर्णन करता है, जहाँ पूर्णतः स्थिर मन भीतर के देदीप्यमान आत्मा को प्रकट करता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 19 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

छठे अध्याय, ध्यानयोग में, श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं कि साधक को कैसे ध्यान करना चाहिए — आसन, मुद्रा, मन का स्थिर होना और इंद्रियों का संयम। ज्यों-ज्यों अभ्यास से मन स्थिर होता है, वह यहाँ वर्णित अवस्था तक पहुँचता है, जो वायुरहित वायु में निश्चल जलते दीपक के समान है, पूर्णतः आत्मा में लीन।

शास्त्रों में वर्णित

विभिन्न परंपराओं के साधक बताते हैं कि जब मन अंततः किसी सुरक्षित ज्योति-सा स्थिर हो जाता है, तब एक आंतरिक प्रकाश और गहन शांति स्वयं ही उदित होती है — यही अनुभव यह श्लोक स्थिर ध्यान के फल के रूप में दर्शाता है।

मंत्र

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यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥

yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā yogino yata-chittasya yuñjato yogam ātmanaḥ

अर्थ:जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक नहीं हिलता, वैसी ही उपमा उस योगी के लिए कही गई है जिसका चित्त संयमित है और जो आत्मा के ध्यान में निरंतर लगा हुआ है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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यथा🔊yathāजैसे, के समान
दीपः🔊dīpaḥदीपक, ज्योति
निवातस्थः🔊nivāta-sthaḥवायुरहित स्थान में स्थित
न इङ्गते🔊na iṅgateहिलता या काँपता नहीं
सा🔊यह, वह
उपमा🔊upamāउपमा, सादृश्य
स्मृता🔊smṛitāमाना जाता है, कहा गया है
योगिनः🔊yoginaḥयोगी का
यतचित्तस्य🔊yata-chittasyaजिसका चित्त संयमित एवं अनुशासित है
युञ्जतः🔊yuñjataḥनिरंतर अभ्यास करते हुए, योग में लगे हुए
योगम्🔊yogamयोग, ध्यान
आत्मनः🔊ātmanaḥआत्मा का, परमात्मा पर

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१९ — यथा दीपो निवातस्थो पाठ के लाभ

ध्यान करते मन को स्थिर एवं शांत करने के लिए एक सजीव छवि प्रदान करता है

गहन, अविचल एकाग्रता (ध्यान) के अभ्यास की प्रेरणा देता है

भीतरी स्थिरता, शांति एवं मानसिक चंचलता से मुक्ति लाता है

शांत हुए मन से प्रकट होने वाले प्रकाशमान आत्मा का प्रतीक है

ध्यान के लिए एक सुरक्षित, विकर्षण-रहित वातावरण को प्रोत्साहित करता है

साधना में तल्लीनता एवं एकाग्रता को गहन करता है

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१९ — यथा दीपो निवातस्थो जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयध्यान के लिए बैठने से पहले, प्रातःकाल या संध्या के समय किसी शांत स्थान में

ध्यान में बैठते समय इस श्लोक का पाठ करें, फिर स्थिर वायु में बिना काँपे जलती एक दीपशिखा की कल्पना करें। अपने मन को वही ज्योति बनने दें — शांत, सीधी और अविचल — और कोमलता से ध्यान को भीतरी आत्मा पर टिकाएँ। जब भी विचार वायु में लौ की भाँति फड़फड़ाने लगें, स्थिरता एवं एकाग्रता पुनः पाने के लिए इसी छवि पर लौट आएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकृष्ण ध्यान में लीन योगी के संयमित मन की तुलना वायुरहित स्थान में रखे उस दीपक से करते हैं जो हिलता नहीं। यह सम्पूर्ण गीता में आंतरिक स्थिरता की सर्वाधिक प्रिय छवियों में से एक है।
निष्कंप ज्योति उस मन का प्रतीक है जो संयमित विचार एवं निरंतर आत्म-ध्यान द्वारा पूर्णतः शांत और एकाग्र हो गया है। विकर्षण की कोई 'वायु' न होने पर मन स्थिर रूप से प्रकाशित होता है और भीतर आत्मा के प्रकाश को प्रकट करता है।
एक शांत, विकर्षण-रहित वातावरण (वह 'वायुरहित स्थान') बनाएँ, स्थिर बैठें, और अपना ध्यान कोमलता एवं निरंतरता से आत्मा या अपने चुने हुए केंद्र पर टिकाए रखें। जब मन डगमगाए, तब स्थिर ज्योति की छवि का स्मरण करें और उसे पुनः अखंड स्थिरता में बैठने दें।
यह छठे अध्याय, ध्यानयोग का अंश है, जहाँ श्रीकृष्ण ध्यान की विधि, आसन एवं आंतरिक अवस्था का वर्णन करते हैं। यह श्लोक उस पूर्णतः लीन, अविचल मन का वर्णन करता है जिसे प्राप्त करना इस साधना का लक्ष्य है।

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