श्रीमद्भगवद्गीता १२.१५ — यस्मान्नोद्विजते लोको
अन्य नाम / खोज: yasman nodvijate loko · yasmaan nodvijate loko · bhagavad gita 12.15 · gita 12 15 · qualities of a devotee
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✦ अर्थ
यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने प्रिय भक्त के लक्षणों के सुंदर वर्णन का अंश है। ऐसा भक्त न किसी को उद्वेग देता है और न स्वयं किसी से उद्विग्न होता है, तथा हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता), भय और उद्वेग से मुक्त रहता है। यह भक्ति से उत्पन्न पूर्ण समता का चित्र है — एक ऐसी आत्मा जो सबके साथ और सब परिस्थितियों में शांत रहती है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 15 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
भक्ति योग अध्याय के समापन भाग में श्रीकृष्ण उन भक्तों के लक्षण बताते हैं जो उन्हें सर्वाधिक प्रिय हैं (12.13–12.20)। यह श्लोक ऐसे ही वर्णनों की माला में से एक है, जो भगवान की प्रेममयी भक्ति में लीन भक्त के शांत, अहिंसक और अविचल स्वभाव का चित्रण करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा में कहा जाता है कि इन गुणों को धारण करने वाले महान् भक्त ऐसी शांति विकीर्ण करते थे कि उनकी उपस्थिति में पशु और शत्रुभाव रखने वाले व्यक्ति भी शांत हो जाते थे — यह इस श्लोक का जीवन्त प्रमाण है कि जगत् न उन्हें उद्विग्न करता है और न वे जगत् से उद्विग्न होते हैं।
मंत्र
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यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
yasmān nodvijate loko lokān nodvijate cha yaḥ harṣhāmarṣha-bhayodvegair mukto yaḥ sa cha me priyaḥ
अर्थ:जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता) भय और उद्वेगों से मुक्त है,वह भक्त मुझे प्रिय है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १२.१५ — यस्मान्नोद्विजते लोको पाठ के लाभ
समता की प्रेरणा देता है — न दूसरों को उद्विग्न करना, न स्वयं उद्विग्न होना
मन को हर्ष, क्रोध, भय और चिंता से मुक्त करने में सहायक
उन गुणों का विकास करता है जो भक्त को भगवान को प्रिय बनाते हैं
समस्त प्राणियों से सौहार्दपूर्ण, शांतिमय सम्बन्ध को बढ़ावा देता है
जीवन के उतार-चढ़ाव में भावनात्मक स्थिरता को सुदृढ़ करता है
अपने चरित्र को श्रीकृष्ण की रुचि के अनुरूप ढालकर भक्ति को गहरा करता है
श्रीमद्भगवद्गीता १२.१५ — यस्मान्नोद्विजते लोको जप विधि
श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ें और प्रत्येक गुण को मन में उतरने दें: दूसरों को उद्विग्न न करना, स्वयं उद्विग्न न होना, हर्ष-ज्वर, असहिष्णुता, भय और चिंता से मुक्ति। इसे एक चिंतनात्मक आदर्श के रूप में लें — आंतरिक शांति के विकास की एक तालिका। जब जगत् आपको उद्विग्न करे, इस श्लोक पर लौटें और श्वास लें। इसे भौतिक फलों के लिए नहीं, अपितु स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन) के रूप में प्रयोग करना सर्वोत्तम है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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