श्रीमद्भगवद्गीता 2.14 — मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय
अन्य नाम / खोज: matra sparshas tu kaunteya · bhagavad gita 2.14 · gita chapter 2 verse 14 · titiksha shloka · enduring pleasure and pain gita
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✦ अर्थ
सांख्ययोग के इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि शीत-उष्ण और सुख-दुःख इन्द्रियों तथा विषयों के संयोग से ही उत्पन्न होते हैं। ये अनुभव आते-जाते रहते हैं, अनित्य हैं, इसलिए इन्हें धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए। यह समता और तितिक्षा का मूलभूत उपदेश है जो साधक को मन की स्थिरता के लिए तैयार करता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 14 · Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa) · Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में कहे गए ये श्लोक सांख्ययोग अध्याय में शोकाकुल अर्जुन को श्रीकृष्ण के प्रथम उपदेशों में से हैं। आत्मा की नित्यता को समझाने के पश्चात्, श्रीकृष्ण अब शरीर के द्वन्द्वों को सहन करने की व्यावहारिक साधना की ओर मुड़ते हैं। तितिक्षा का यह उपदेश वेदान्त की आध्यात्मिक साधना का एक आधारस्तम्भ बन गया, जिसे युगों-युगों से सन्तों और आचार्यों ने दोहराया है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
सन्त कहते हैं कि जो इस श्लोक को आत्मसात् कर लेते हैं वे सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों में अविचलित रहते हैं; इसके द्वारा प्रेरित धैर्यपूर्ण सहनशीलता उसी अध्याय में आगे वर्णित स्थितप्रज्ञ की अखण्ड शान्ति में परिपक्व हो जाती है, ऐसा कहा जाता है।
मंत्र
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मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata
अर्थ:हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता 2.14 — मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय पाठ के लाभ
सुख और दुःख दोनों के प्रति तितिक्षा (धैर्यपूर्ण सहनशीलता) को विकसित करता है
जीवन के द्वन्द्वों के बीच समता और आन्तरिक स्थिरता विकसित करता है
साधक को स्मरण कराता है कि समस्त इन्द्रिय-अनुभव क्षणिक और क्षणभंगुर हैं
क्षणभंगुर भावनाओं से तादात्म्य को ढीला करके चिन्ता को कम करता है
स्थितप्रज्ञ (स्थिरबुद्धि वाला) बनने की नींव रखता है
कष्ट, रोग या असुविधा के समय एक शक्तिशाली चिन्तन
श्रीमद्भगवद्गीता 2.14 — मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय जप विधि
शान्त बैठकर श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें और उसके अर्थ पर चिन्तन करें। जब भी शीत या उष्ण, लाभ या हानि, प्रशंसा या निन्दा आपको विचलित करे, तब 'आगमापायिनोऽनित्याः' का स्मरण करें — वे आते-जाते हैं, वे अनित्य हैं। स्थिर श्वास लें और प्रतिरोध किए बिना उस संवेदना को गुजरने दें, तितिक्षा की साक्षी-वृत्ति को धारण करते हुए।
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