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श्रीमद्भगवद्गीता 2.14 — मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता 2.14 — मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

मात्रास्पर्शाः
mātrā-sparśhāḥ
इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग
तु
tu
वस्तुतः
कौन्तेय
kaunteya
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन
शीत
śhīta
शीत, ठण्ड
उष्ण
uṣhṇa
उष्ण, गर्मी
सुख
sukha
सुख, आनन्द
दुःख
duḥkha
दुःख, पीड़ा
दाः
dāḥ
देने वाले
आगम
āgama
आना, प्रकट होना
अपायिनः
apāyinaḥ
जाना, लुप्त होना
अनित्याः
anityāḥ
अनित्य, क्षणभंगुर
तान्
tān
उन्हें
तितिक्षस्व
titikṣhasva
सहन करो, धैर्य रखो
भारत
bhārata
हे भरतवंशी (अर्जुन)

Complete Translation

हे कुन्तीपुत्र ! शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत ! उनको तुम सहन करो।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 14

Author: Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa)

Period: Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में कहे गए ये श्लोक सांख्ययोग अध्याय में शोकाकुल अर्जुन को श्रीकृष्ण के प्रथम उपदेशों में से हैं। आत्मा की नित्यता को समझाने के पश्चात्, श्रीकृष्ण अब शरीर के द्वन्द्वों को सहन करने की व्यावहारिक साधना की ओर मुड़ते हैं। तितिक्षा का यह उपदेश वेदान्त की आध्यात्मिक साधना का एक आधारस्तम्भ बन गया, जिसे युगों-युगों से सन्तों और आचार्यों ने दोहराया है।

Frequently Asked Questions

श्रीमद्भगवद्गीता 2.14 का मूल उपदेश क्या है?
यह बताता है कि शीत, उष्ण, सुख और दुःख इन्द्रियों के विषयों के साथ संयोग से ही उत्पन्न होते हैं। चूँकि इनका प्रारम्भ और अन्त होता है, वे अनित्य हैं और इन्हें मन को विचलित होने देने के स्थान पर शान्त धैर्य के साथ सहन करना चाहिए।
यहाँ तितिक्षा का क्या अर्थ है?
तितिक्षा धैर्यपूर्ण सहनशीलता है — द्वन्द्वों (सुख-दुःख, शीत-उष्ण) को बिना प्रसन्न या उदास हुए सहने की क्षमता। श्रीकृष्ण इसे मन की स्थिरता और आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक साधना के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
श्रीकृष्ण इन्द्रिय-अनुभवों को अनित्य क्यों कहते हैं?
क्योंकि वे इन्द्रियों और विषयों के बदलते संयोग से उत्पन्न होते हैं, वे निरन्तर उत्पन्न (आगम) होते और नष्ट (अपायी) होते रहते हैं। इनकी क्षणभंगुर प्रकृति को पहचानना मनुष्य को क्षणिक राग-द्वेष का दास बनने से मुक्त करता है।
मैं इस श्लोक को दैनिक जीवन में कैसे लागू करूँ?
जब असुविधा, आलोचना, हानि या किसी अप्रिय अनुभव का सामना हो, तब स्मरण रखें कि वह क्षणिक है। उस भावना को एक गुजरती लहर की भाँति देखें, उसे धैर्यपूर्वक सहन करें, और मन को अपरिवर्तनशील आत्मा में स्थिर रखें।

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