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श्रीमद्भगवद्गीता 2.56 — दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता 2.56 — दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

दुःखेषु
duḥkheṣhu
दुःखों में
अनुद्विग्नमनाः
anudvigna-manāḥ
जिसका मन विचलित नहीं होता
सुखेषु
sukheṣhu
सुखों में
विगतस्पृहः
vigata-spṛihaḥ
लालसा से रहित
वीत
vīta
रहित
राग
rāga
राग, आसक्ति
भय
bhaya
भय
क्रोधः
krodhaḥ
क्रोध
स्थितधीः
sthita-dhīḥ
स्थिर बुद्धि वाला, आत्मज्ञानी पुरुष
मुनिः
muniḥ
मुनि
उच्यते
uchyate
कहलाता है

Complete Translation

दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 2, Verse 56

Author: Bhagavan Sri Krishna (as recorded by Maharishi Veda Vyasa)

Period: Ancient (part of the Mahabharata, c. 5th–2nd century BCE in present form)

जब अर्जुन श्रीकृष्ण से स्थिर बुद्धि वाले पुरुष के लक्षण पूछते हैं, तो श्रीकृष्ण दीप्तिमान श्लोकों की एक श्रृंखला से उत्तर देते हैं, जिनमें यह सर्वाधिक प्रिय श्लोकों में से एक है। यह समस्त योग के लक्ष्य को सार रूप में प्रस्तुत करता है — ऐसा सन्तुलित मन जिसे न शोक न सुख विचलित कर सके। पीढ़ियों से साधक इन श्लोकों को आत्म-परीक्षण के दैनिक दर्पण रूप में कण्ठस्थ करते आए हैं।

Frequently Asked Questions

स्थितप्रज्ञ कौन है?
स्थितप्रज्ञ वह 'स्थिर बुद्धि वाला' पुरुष है जिसकी बुद्धि आत्मा में दृढ़तापूर्वक स्थित है। जैसा यह श्लोक बताता है, ऐसा मुनि दुःख से विचलित नहीं होता, सुख में लालसा नहीं रखता और राग, भय तथा क्रोध से मुक्त रहता है।
राग, भय और क्रोध का उल्लेख एक साथ क्यों किया गया है?
राग (आसक्ति) से ही हानि का भय और कामना के बाधित होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। श्रीकृष्ण तीनों का नाम लेते हैं क्योंकि आसक्ति से मुक्ति स्वाभाविक रूप से भय और क्रोध को मिटा देती है, जिससे स्थायी शान्ति मिलती है।
क्या यह श्लोक भावनाओं को सँभालने में उपयोगी है?
हाँ। यह गीता की भावनात्मक समता पर सबसे स्पष्ट शिक्षाओं में से एक है। इस पर नियमित चिन्तन मन को विपत्ति में शान्त और सफलता में सन्तुलित रहने का अभ्यास कराता है, जो योग का सार है।
यह श्लोक कहाँ आता है?
यह दूसरे अध्याय (सांख्ययोग) के अन्तिम भाग का है, जहाँ अर्जुन पूछते हैं कि स्थिर बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता, बैठता और चलता है, और श्रीकृष्ण इस प्रसिद्ध वर्णन से उत्तर देते हैं।

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