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श्रीमद्भगवद्गीता १७.१५ — अनुद्वेगकरं वाक्यम् PDF

श्रीमद्भगवद्गीता १७.१५ — अनुद्वेगकरं वाक्यम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

जो वाणी उद्वेग उत्पन्न न करने वाली, सत्य, प्रिय और हितकारक हो, तथा वेदों के स्वाध्याय का नियमित अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।