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श्रीमद्भगवद्गीता १७.१५ — अनुद्वेगकरं वाक्यम्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 प्रातःकाल, विशेषकर बैठकों, वार्तालाप या शिक्षण के दिन से पहले·📜 Bhagavad Gita Chapter 17, Verse 15

अन्य नाम / खोज: anudvega karam vakyam · anudvega karam vakyam satyam priya hitam cha yat · svadhyayabhyasanam chaiva vangmayam tapa uchyate · bhagavad gita 17.15 · gita 17 15 · austerity of speech gita verse

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अर्थ

त्रिविध श्रद्धा के अध्याय में श्रीकृष्ण वाणी के तप की परिभाषा देते हैं। जिह्वा का सच्चा अनुशासन यह है कि ऐसे वचन बोले जाएँ जो दूसरों को व्यथित न करें, जो सत्य, प्रिय और वास्तव में हितकारी हों — साथ ही शास्त्र का नियमित स्वाध्याय और पाठ। यह एक श्लोक सम्यक् वाणी विषयक गीता का सर्वाधिक व्यावहारिक मार्गदर्शन है, जो किसी भी शारीरिक तप के समान पवित्र करने वाला अनुशासन है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 17, Verse 15 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

सत्रहवें अध्याय, श्रद्धात्रय विभाग योग में, श्रीकृष्ण बताते हैं कि किस प्रकार श्रद्धा और आचरण तीन गुणों से रंजित होते हैं। शरीर, वाणी और मन के तप का वर्णन करते हुए वे वाणी के तप की यह परिभाषा देते हैं: ऐसे वचन जो उद्वेग न उत्पन्न करें, सत्य, प्रिय और हितकारी हों, और जो शास्त्र के स्वाध्याय से युक्त हों।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि जिन ऋषियों ने वाणी का तप सिद्ध किया, उन्हें 'वाक्-सिद्धि' प्राप्त हुई — वह शक्ति जिससे उनके कोमल, सत्य वचन सदा सत्य होते और आशीर्वाद लाते — जो अनुशासित वाणी की आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अर्थ:जो वाणी उद्वेग उत्पन्न न करने वाली, सत्य, प्रिय और हितकारक हो, तथा वेदों के स्वाध्याय का नियमित अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अनुद्वेगकरम्🔊anudvega-karamउद्वेग या व्यथा उत्पन्न न करने वाली
वाक्यम्🔊vākyamवाणी, वचन
सत्यम्🔊satyamसत्य
प्रियहितम्🔊priya-hitamप्रिय और हितकारी
🔊chaऔर
यत्🔊yatजो
स्वाध्याय🔊svādhyāyaशास्त्रों का स्वाध्याय / वेदों का पाठ
अभ्यसनम्🔊abhyasanamअभ्यास, नियमित साधना
च एव🔊cha evaऔर भी
वाङ्मयम्🔊vāṅ-mayamवाणी संबंधी, जिह्वा से संबंधित
तपः🔊tapaḥतप, तपस्या
उच्यते🔊uchyateकहलाता है, कहा जाता है

श्रीमद्भगवद्गीता १७.१५ — अनुद्वेगकरं वाक्यम् पाठ के लाभ

दयालु, सत्य और हितकारी वाणी का अनुशासन सिखाता है

कठोर, चुभने वाले या उद्वेगकारी शब्दों से बचने में सहायता करता है जो विवाद उत्पन्न करते हैं

सम्यक् वाणी को आध्यात्मिक तप के रूप में जिह्वा और मन को शुद्ध करता है

पवित्र ग्रंथों के नियमित स्वाध्याय और पाठ को प्रोत्साहित करता है

संबंधों को सुधारता है और परिवार तथा समाज में सद्भाव लाता है

सत्य बोलने की उच्च वृत्ति का निर्माण करता है जो साथ ही कोमल और उपयोगी भी हो

श्रीमद्भगवद्गीता १७.१५ — अनुद्वेगकरं वाक्यम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयप्रातःकाल, विशेषकर बैठकों, वार्तालाप या शिक्षण के दिन से पहले

इस श्लोक का प्रातःकाल पाठ करें और दिनभर अपने वचनों के लिए इसकी चार-कसौटी अपनाएँ — क्या वे उद्वेग न उत्पन्न करने वाले, सत्य, प्रिय और हितकारी हैं? जैसा श्लोक सुझाता है, इसे थोड़े दैनिक शास्त्र-स्वाध्याय (स्वाध्याय) के साथ जोड़ें। जब भी आप क्रोध या असावधानी में बोलने को उद्यत हों, इसका स्मरण करके वाणी को ही एक पवित्र करने वाले तप में बदल दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह ऐसे वचन बोलने का अनुशासन है जो दूसरों को व्यथित न करें, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हों, साथ ही शास्त्र के नियमित स्वाध्याय का अभ्यास। श्रीकृष्ण इसे जिह्वा का तप (तपस्या) कहते हैं।
यहाँ सम्यक् वाणी के चार लक्षण हैं: अनुद्वेगकरम् (उद्वेग न उत्पन्न करने वाली, चुभने वाली नहीं), सत्यम् (सत्य), प्रिय (प्रिय और अनुकूल), और हितम् (हितकारी)। ये मिलकर सुनिश्चित करते हैं कि वचन सत्य भी हों, कोमल भी और वास्तव में सहायक भी।
यह श्लोक चाहता है कि वाणी सत्य, प्रिय और हितकारी एक साथ हो। आदर्श यह है कि जो सत्य है उसे ऐसे ढंग से कहा जाए जो कोमल और रचनात्मक हो। जब कोई कठोर सत्य कहना आवश्यक हो, तो यह शिक्षा उसे श्रोता के कल्याण की चिंता के साथ कोमलता से कहने का मार्गदर्शन करती है।
स्वाध्याय — पवित्र ग्रंथों का नियमित पाठ और अध्ययन — जिह्वा को प्रशिक्षित और पवित्र करता है, मन को उन्नत वचनों से भरता है, और स्वाभाविक रूप से सत्य, हितकारी वाणी की ओर प्रवृत्त करता है। इसलिए इसे वाणी के अनुशासन का अंग माना गया है।

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