श्रीमद्भगवद्गीता १७.१६ — मनःप्रसादः सौम्यत्वम्
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✦ अर्थ
इस सौम्य और व्यावहारिक श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण मन के तप (मानस तप) की परिभाषा देते हैं — मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और हृदय की शुद्धि। शरीर की कठोर साधनाओं के विपरीत, यह एक आन्तरिक परिष्कार है जिसे कोई भी विकसित कर सकता है। यह श्लोक दैनिक जीवन के लिए एक सुन्दर मार्गदर्शन है, जो सिखाता है कि सच्चा तप अपने विचारों और भावों को शान्ति, करुणा और स्पष्टता में निरन्तर शुद्ध करना है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 17, Verse 16 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
सत्रहवें अध्याय, श्रद्धात्रय विभाग योग में, तप (तपस्या) को शरीर, वाणी और मन के तप में वर्गीकृत किया गया है। शारीरिक और वाचिक तप का वर्णन करने के बाद, श्रीकृष्ण यहाँ मानस तप की परिभाषा देते हैं — मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और हृदय की शुद्धि — वह आन्तरिक अनुशासन जो शेष को पूर्ण और मुकुटित करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
आध्यात्मिक गुरु इस श्लोक की ओर इस प्रमाण के रूप में संकेत करते हैं कि सर्वोच्च तप के लिए किसी कठोर तपस्या की आवश्यकता नहीं — केवल मन का धैर्यपूर्वक परिष्कार; अनेक साधक साक्षी देते हैं कि शान्ति, सौम्यता और मौन को चुपचाप विकसित करने ने उनके जीवन को किसी भी कठोर साधना से अधिक गहराई से रूपान्तरित किया।
मंत्र
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मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ bhāva-sanśhuddhir ity etat tapo mānasam uchyate
अर्थ:मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १७.१६ — मनःप्रसादः सौम्यत्वम् पाठ के लाभ
मन की प्रसन्नता और प्रफुल्लता (मनःप्रसाद) को विकसित करता है
दूसरों के साथ व्यवहार में सौम्यता और सहृदयता विकसित करता है
मौन और आन्तरिक स्थिरता के अभ्यास को प्रोत्साहित करता है
आत्मसंयम और चंचल विचारों पर अधिकार को सुदृढ़ करता है
अपने भावों और इरादों को शुद्ध करता है, आन्तरिक स्वभाव को परिष्कृत करता है
सबके लिए सुलभ, तप का एक व्यावहारिक दैनिक रूप प्रदान करता है
श्रीमद्भगवद्गीता १७.१६ — मनःप्रसादः सौम्यत्वम् जप विधि
इस श्लोक का प्रत्येक प्रातः दिन की रूपरेखा के रूप में जप करें, इसके पाँच गुणों — प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम, हृदय की शुद्धि — को एक-एक करके कोमल संकल्पों के रूप में लें। इसे अपने मन को ही तप का अर्पण बनाने दें, अपने विचारों और भावों को शान्ति और करुणा में परिष्कृत करें। दिनभर इसकी ओर लौटना मन को स्थिर और हृदय को कोमल करने में सहायता करता है।
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