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श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ — चञ्चलं हि मनः कृष्ण

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 ध्यान या प्राणायाम से पूर्व, विशेषकर जब मन बिखरा हुआ अनुभव हो·📜 Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 34

अन्य नाम / खोज: chanchalam hi manah krishna · chanchalam hi manah pramathi · bhagavad gita 6.34 · gita 6 34 · mind is restless verse · vayor iva suduṣhkaram

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अर्थ

इस अत्यन्त सरल और सच्चे श्लोक में अर्जुन हर साधक की कठिनाई व्यक्त करते हैं — मन चंचल, प्रमथनशील, बलवान और हठी है, और उसका निग्रह करना वायु को रोकने के समान असम्भव प्रतीत होता है। यह भटकते मन के संघर्ष की पूर्ण अभिव्यक्ति है। अगले श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण का कोमल उत्तर — कि अभ्यास और वैराग्य द्वारा मन को निश्चय ही वश में किया जा सकता है — इसे ध्यान पर सबसे व्यावहारिक प्रसंगों में से एक बना देता है।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 34 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

छठे अध्याय, ध्यानयोग में, श्रीकृष्ण ध्यान एवं समता की साधना का वर्णन करते हैं। अर्जुन स्पष्ट रूप से उत्तर देते हैं कि ऐसे चंचल मन को वश में करना वायु को रोकने के समान कठिन प्रतीत होता है। उनका यह सच्चा संदेह श्रीकृष्ण के उस प्रसिद्ध आश्वासन को जन्म देता है कि अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।

शास्त्रों में वर्णित

अनेक पीढ़ियों के साधकों ने यह सांत्वना पाई है कि अर्जुन ने भी मन को अनियंत्रित पाया; परंपरा मानती है कि अर्जुन की भाँति इस कठिनाई को सच्चे मन से भगवान के समक्ष स्वीकार करना ही, मन को धीरे-धीरे स्थिर करने हेतु आवश्यक कृपा एवं मार्गदर्शन को आकर्षित कर लेता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

chañchalaṁ hi manaḥ kṛiṣhṇa pramāthi balavad dṛiḍham tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣhkaram

अर्थ:क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह करना मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ ।।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

चञ्चलम्🔊chañchalamचंचल
हि🔊hiनिश्चय ही
मनः🔊manaḥमन
कृष्ण🔊kṛiṣhṇaहे कृष्ण
प्रमाथि🔊pramāthiप्रमथनशील, विक्षुब्ध करने वाला
बलवत्🔊bala-vatबलवान
दृढम्🔊dṛiḍhamहठी, अटल
तस्य🔊tasyaउसका
अहम्🔊ahamमैं
निग्रहम्🔊nigrahamनिग्रह, वश में करना
मन्ये🔊manyeमानता हूँ, समझता हूँ
वायोः🔊vāyoḥवायु का
इव🔊ivaसमान
सुदुष्करम्🔊su-duṣhkaramअत्यंत कठिन

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ — चञ्चलं हि मनः कृष्ण पाठ के लाभ

चंचल मन के सार्वभौमिक संघर्ष को मान्यता देता है और उसे शब्द देता है

ध्यान में अपनी कठिनाइयों के विषय में ईमानदारी को प्रोत्साहित करता है

अभ्यास एवं वैराग्य रूपी श्रीकृष्ण के उपाय के लिए भूमिका तैयार करता है

साधक को स्मरण कराता है कि महान आत्माएँ भी मन को वश में करना कठिन पाती हैं

साधना में धैर्य एवं दृढ़ता की प्रेरणा देता है

बाधा को स्पष्ट रूप से नाम देकर, उस पर विजय पाने से पूर्व, ध्यान को गहन करने में सहायता करता है

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ — चञ्चलं हि मनः कृष्ण जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयध्यान या प्राणायाम से पूर्व, विशेषकर जब मन बिखरा हुआ अनुभव हो

जब आपका मन क्षुब्ध और स्थिरता का विरोधी लगे, तब इस श्लोक का पाठ करें। अर्जुन की भाँति बिना आत्म-निंदा के स्वीकार करें कि मन स्वभावतः चंचल है। फिर श्रीकृष्ण के उत्तर (६.३५) का स्मरण करें कि मन निरंतर अभ्यास एवं विरक्ति से जीता जाता है, और कोमलता से अपना ध्यान आरम्भ करें। इस श्लोक के साथ कुछ मिनट श्वास-जागरूकता जोड़ने से गहन साधना से पूर्व बिखरा मन स्थिर हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन कहते हैं कि मन वायु के समान वश में करना कठिन है क्योंकि दोनों ही चंचल, बलवान और मानो पकड़ या रोक पाना असम्भव हैं। यह तुलना सजीव रूप से दर्शाती है कि मन ध्यान में किस प्रकार निरंतर गतिशील रहता है और स्थिर होने का विरोध करता है।
ठीक अगले श्लोक (६.३५) में श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं कि मन चंचल और कठिनता से वश में आने वाला है, किन्तु अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि अभ्यास (निरंतर साधना) और वैराग्य (अनासक्ति) द्वारा इसे निश्चय ही वश में किया जा सकता है। इस प्रकार ६.३४ प्रश्न है और ६.३५ व्यावहारिक समाधान।
अर्जुन मन को चंचल (अस्थिर), प्रमाथी (विक्षुब्ध करने वाला, इंद्रियों एवं शरीर को भी क्षुब्ध करने वाला), बलवत् (बलवान) और दृढ़ (हठी या अटल) बताते हैं। ये मिलकर समझाते हैं कि मन को वश में करना इतना चुनौतीपूर्ण क्यों है।
यह साधकों को आश्वस्त करता है कि भटकता मन सामान्य है, सच्चे साधकों के लिए भी। कठिनाई को ईमानदारी से स्वीकार कर, फिर श्रीकृष्ण की सलाह के अनुसार निरंतर अभ्यास एवं वैराग्य लागू करके, कोई भी धीरे-धीरे चंचल मन पर अधिकार पा सकता है।

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