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श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ — चञ्चलं हि मनः कृष्ण — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ — चञ्चलं हि मनः कृष्ण

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

चञ्चलम्
chañchalam
चंचल
हि
hi
निश्चय ही
मनः
manaḥ
मन
कृष्ण
kṛiṣhṇa
हे कृष्ण
प्रमाथि
pramāthi
प्रमथनशील, विक्षुब्ध करने वाला
बलवत्
bala-vat
बलवान
दृढम्
dṛiḍham
हठी, अटल
तस्य
tasya
उसका
अहम्
aham
मैं
निग्रहम्
nigraham
निग्रह, वश में करना
मन्ये
manye
मानता हूँ, समझता हूँ
वायोः
vāyoḥ
वायु का
इव
iva
समान
सुदुष्करम्
su-duṣhkaram
अत्यंत कठिन

Complete Translation

क्योंकि हे कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह करना मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ ।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 6, Verse 34

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

छठे अध्याय, ध्यानयोग में, श्रीकृष्ण ध्यान एवं समता की साधना का वर्णन करते हैं। अर्जुन स्पष्ट रूप से उत्तर देते हैं कि ऐसे चंचल मन को वश में करना वायु को रोकने के समान कठिन प्रतीत होता है। उनका यह सच्चा संदेह श्रीकृष्ण के उस प्रसिद्ध आश्वासन को जन्म देता है कि अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।

Frequently Asked Questions

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ में अर्जुन मन की तुलना वायु से क्यों करते हैं?
अर्जुन कहते हैं कि मन वायु के समान वश में करना कठिन है क्योंकि दोनों ही चंचल, बलवान और मानो पकड़ या रोक पाना असम्भव हैं। यह तुलना सजीव रूप से दर्शाती है कि मन ध्यान में किस प्रकार निरंतर गतिशील रहता है और स्थिर होने का विरोध करता है।
इस शिकायत का श्रीकृष्ण क्या उत्तर देते हैं?
ठीक अगले श्लोक (६.३५) में श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं कि मन चंचल और कठिनता से वश में आने वाला है, किन्तु अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि अभ्यास (निरंतर साधना) और वैराग्य (अनासक्ति) द्वारा इसे निश्चय ही वश में किया जा सकता है। इस प्रकार ६.३४ प्रश्न है और ६.३५ व्यावहारिक समाधान।
यहाँ मन के कौन-से चार गुण बताए गए हैं?
अर्जुन मन को चंचल (अस्थिर), प्रमाथी (विक्षुब्ध करने वाला, इंद्रियों एवं शरीर को भी क्षुब्ध करने वाला), बलवत् (बलवान) और दृढ़ (हठी या अटल) बताते हैं। ये मिलकर समझाते हैं कि मन को वश में करना इतना चुनौतीपूर्ण क्यों है।
यह श्लोक आज के साधकों के लिए कैसे उपयोगी है?
यह साधकों को आश्वस्त करता है कि भटकता मन सामान्य है, सच्चे साधकों के लिए भी। कठिनाई को ईमानदारी से स्वीकार कर, फिर श्रीकृष्ण की सलाह के अनुसार निरंतर अभ्यास एवं वैराग्य लागू करके, कोई भी धीरे-धीरे चंचल मन पर अधिकार पा सकता है।

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