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श्रीमद्भगवद्गीता १७.१६ — मनःप्रसादः सौम्यत्वम् — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता १७.१६ — मनःप्रसादः सौम्यत्वम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

मनःप्रसादः
manaḥ-prasādaḥ
मन की प्रसन्नता, विचारों की प्रफुल्लता
सौम्यत्वम्
saumyatvam
सौम्यता, सहृदयता
मौनम्
maunam
मौन
आत्मविनिग्रहः
ātma-vinigrahaḥ
आत्मसंयम, मन का निग्रह
भावसंशुद्धिः
bhāva-sanśhuddhiḥ
स्वभाव की शुद्धि, भाव की शुद्धि
इति
iti
इस प्रकार
एतत्
etat
यह, ये
तपः
tapaḥ
तप
मानसम्
mānasam
मन का, मानसिक
उच्यते
uchyate
कहलाता है, घोषित किया जाता है

Complete Translation

मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 17, Verse 16

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

सत्रहवें अध्याय, श्रद्धात्रय विभाग योग में, तप (तपस्या) को शरीर, वाणी और मन के तप में वर्गीकृत किया गया है। शारीरिक और वाचिक तप का वर्णन करने के बाद, श्रीकृष्ण यहाँ मानस तप की परिभाषा देते हैं — मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और हृदय की शुद्धि — वह आन्तरिक अनुशासन जो शेष को पूर्ण और मुकुटित करता है।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता 17.16 का मुख्य संदेश क्या है?
श्रीकृष्ण मन के तप (मानस तप) को मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और स्वभाव की शुद्धि के रूप में परिभाषित करते हैं। यह सिखाता है कि सच्चा आन्तरिक अनुशासन अपने विचारों और भावों को शान्ति, करुणा और स्पष्टता में निरन्तर परिष्कृत करना है।
'मानस तप' (मन का तप) क्या है?
यह मन और हृदय का आन्तरिक तप है, जो शरीर के तप (17.14) और वाणी के तप (17.15) से भिन्न है। इसमें प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और भाव की शुद्धि का विकास सम्मिलित है — एक ऐसा परिष्कार जो दैनिक जीवन में सबके लिए सुलभ है।
मन का तप क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
क्योंकि मन ही समस्त कर्म और भाव का मूल है। आन्तरिक प्रसन्नता और शुद्धि के बिना, बाह्य साधनाएँ अधूरी रह जाती हैं। मन को शुद्ध करके यह तप स्थायी शान्ति, सद्संबंध और भक्ति व आत्म-साक्षात्कार के योग्य हृदय प्रदान करता है।
मैं इस श्लोक को दैनिक जीवन में कैसे प्रयोग कर सकता हूँ?
इसके पाँच गुणों को कोमल दैनिक अभ्यास के रूप में लें: मन को प्रसन्न रखें, दूसरों के साथ सौम्य रहें, मौन के क्षण रखें, आवेगपूर्ण प्रतिक्रियाओं को रोकें, और शुद्ध इरादों से कार्य करें। प्रत्येक प्रातः श्लोक का जप दिन के लिए ये संकल्प स्थापित करने में सहायता करता है।

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