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श्रीमद्भगवद्गीता ५.८ — नैव किंचित्करोमीति — Word-by-Word Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता ५.८ — नैव किंचित्करोमीति

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

न एव
na eva
बिल्कुल नहीं, कदापि नहीं
किंचित्
kiñchit
कुछ भी
करोमि
karomi
मैं करता हूँ
इति
iti
इस प्रकार
युक्तः
yuktaḥ
योग में स्थित, युक्त पुरुष
मन्येत
manyeta
मानता है, मानना चाहिए
तत्त्व-वित्
tattva-vit
तत्त्व का ज्ञाता
पश्यन्
paśhyan
देखता हुआ
श्रृण्वन्
śhṛiṇvan
सुनता हुआ
स्पृशन्
spṛiśhan
स्पर्श करता हुआ
जिघ्रन्
jighran
सूँघता हुआ
अश्नन्
aśhnan
खाता हुआ
गच्छन्
gachchhan
चलता हुआ
स्वपन्
svapan
सोता हुआ
श्वसन्
śhvasan
श्वास लेता हुआ

Complete Translation

तत्त्व को जानने वाला युक्त पुरुष देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ और श्वास लेता हुआ भी यह मानता है (जानता है) कि 'मैं तो कुछ भी नहीं करता हूँ' — यह समझकर कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरत रही हैं।।

Origin & History

Source: Bhagavad Gita Chapter 5, Verse 8

Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)

Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

पाँचवें अध्याय कर्म-संन्यास योग में श्रीकृष्ण संन्यास और कर्म का समन्वय करते हुए मुक्त मुनि की आन्तरिक दृष्टि प्रकट करते हैं। श्लोक ५.८ और ५.९ वर्णन करते हैं कि ऐसा पुरुष देह की प्रत्येक क्रिया करते हुए भी इसी निश्चय में स्थित रहता है कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरतती हैं और आत्मा कुछ नहीं करती — और इस प्रकार वह संसार में कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं।

Frequently Asked Questions

भगवद्गीता ५.८ की मुख्य शिक्षा क्या है?
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि आत्मज्ञानी तत्त्ववेत्ता जीवन की सभी स्वाभाविक क्रियाओं में लगे रहते हुए भी भीतर से जानता है कि 'मैं तो कुछ भी नहीं करता।' वह समझता है कि शुद्ध आत्मा कर्ता नहीं है; केवल इन्द्रियाँ अपने विषयों के साथ बरत रही हैं, जबकि वह अलिप्त साक्षी बना रहता है।
'मैं तो कुछ भी नहीं करता' का वास्तविक अर्थ क्या है?
इसका अर्थ शारीरिक निष्क्रियता नहीं है। मुनि देखता, सुनता, खाता और चलता रहता है, किन्तु वह देह-मन के स्थान पर अपरिवर्तनशील आत्मा से तादात्म्य रखता है। यह समझकर कि प्रकृति और इन्द्रियाँ ही समस्त कर्म करती हैं, वह अहंकार के मिथ्या कर्तृत्व-भाव से मुक्त रहता है।
यह श्लोक श्लोक ५.९ से कैसे जुड़ा है?
श्लोक ५.८ और ५.९ एक ही निरन्तर कथन बनाते हैं। श्लोक ५.८ देखने, सुनने, स्पर्श करने, सूँघने, खाने, चलने, सोने और श्वास लेने की गणना करता है; श्लोक ५.९ बोलने, त्यागने, ग्रहण करने, आँखें खोलने और बन्द करने के साथ इसे आगे बढ़ाता है — यह सब इस दृढ़ निश्चय के साथ कि इन्द्रियाँ ही विषयों में बरतती हैं, आत्मा नहीं।
मैं इस शिक्षा को दैनिक जीवन में कैसे लागू करूँ?
अपने कर्तव्य करते समय यह भाव जगाएँ कि देह और इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से कर्म कर रही हैं, जबकि आप, साक्षी आत्मा, शान्त और अनासक्त बने रहते हैं। अकर्तृत्व का यह भाव तनाव, अभिमान और चिन्ता को घटाता है, जिससे आप कुशलता से कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त रहते हैं।

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