श्रीमद्भगवद्गीता ५.८ — नैव किंचित्करोमीति
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✦ अर्थ
कर्म-संन्यास योग अध्याय के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मज्ञानी मुनि की आन्तरिक दृष्टि का वर्णन करते हैं। समस्त स्वाभाविक क्रियाओं — देखने, सुनने, खाने, चलने, सोने — में पूर्णतः संलग्न रहते हुए भी तत्त्ववेत्ता यह समझता है कि वह स्वयं, शुद्ध आत्मा, कर्ता नहीं है; इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरत रही हैं। अकर्तृत्व के इस बोध में स्थित रहकर वह सब कर्मों के बीच भी अलिप्त और मुक्त रहता है। (यह भाव श्लोक ५.९ में आगे चलता है।)
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 5, Verse 8 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
पाँचवें अध्याय कर्म-संन्यास योग में श्रीकृष्ण संन्यास और कर्म का समन्वय करते हुए मुक्त मुनि की आन्तरिक दृष्टि प्रकट करते हैं। श्लोक ५.८ और ५.९ वर्णन करते हैं कि ऐसा पुरुष देह की प्रत्येक क्रिया करते हुए भी इसी निश्चय में स्थित रहता है कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरतती हैं और आत्मा कुछ नहीं करती — और इस प्रकार वह संसार में कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
आत्म-साक्षात्कार परम्परा के ऋषियों ने इस श्लोक को संसार में रहते हुए भी भीतर से मुक्त रहने का रहस्य बताया है, और साधक बताते हैं कि दैनिक क्रियाओं में 'मैं कर्ता नहीं हूँ' का भाव धारण करने से चंचल अहंकार शान्त हुआ और किसी भी कर्म से अछूती एक स्थिर स्तब्धता प्रकट हुई।
मंत्र
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नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्॥
naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit paśhyañ śhṛiṇvan spṛiśhañ jighrann aśhnan gachchhan svapañ śhvasan
अर्थ:तत्त्व को जानने वाला युक्त पुरुष देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ और श्वास लेता हुआ भी यह मानता है (जानता है) कि 'मैं तो कुछ भी नहीं करता हूँ' — यह समझकर कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरत रही हैं।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ५.८ — नैव किंचित्करोमीति पाठ के लाभ
सब क्रियाओं के बीच भी ऋषि की अकर्तृत्व की दृष्टि को प्रकट करता है
मन को अहंकार के 'मैं कर्ता हूँ' भाव से मुक्त करता है
संसार में पूर्णतः सक्रिय रहते हुए भी शान्ति और वैराग्य लाता है
आत्मा को इन्द्रियों से परे साक्षी रूप में समझने की गहराई देता है
पहचान को शुद्ध आत्मा की ओर मोड़कर कर्म के बन्धन को विलीन करता है
कर्मयोग और आत्म-विचार के एक साथ अभ्यास को सहारा देता है
श्रीमद्भगवद्गीता ५.८ — नैव किंचित्करोमीति जप विधि
इस श्लोक का धीरे-धीरे पाठ करें और चिन्तन करें कि देह के सभी कार्य स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं जबकि सच्चा आत्मा मौन साक्षी बना रहता है। दिनभर कोमलता से इस भाव का स्मरण करें — 'इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरतती हैं; मैं, आत्मा, कर्ता नहीं हूँ।' निरन्तर अभ्यास करने पर यह चिन्तन अहंकार की पकड़ को ढीला करता है और समस्त कर्म के बीच एक शान्त वैराग्य ले आता है।
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