श्रीमद्भगवद्गीता ३.३० — मयि सर्वाणि कर्माणि
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✦ अर्थ
यह श्लोक तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण के कर्मयोग-उपदेश की पराकाष्ठा है। वे अर्जुन से कहते हैं कि वह प्रत्येक कर्म को भगवान को अर्पित करे, मन को आत्मा में स्थिर रखे, और फल की कामना, ममता तथा संताप से रहित होकर कर्म करे। यह संसार में कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त रहने का सम्पूर्ण सूत्र है — कर्तव्य को ईश्वर के प्रति समर्पण रूप में करना।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 3, Verse 30 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
कर्मयोग अध्याय में, यह समझाने के बाद कि ज्ञानी को भी लोकहित के लिए कर्म करना चाहिए, श्रीकृष्ण अर्जुन को बंधन के बिना कर्म करने की व्यावहारिक कुंजी देते हैं। यह श्लोक उस उपदेश का सार है: समस्त कर्मों को भगवान को अर्पित करो, मन को आत्मा में स्थिर करो, और कामना, ममता तथा चिंता से मुक्त होकर युद्ध करो — कर्तव्य को एक पवित्र अर्पण के रूप में करते हुए।
✦ शास्त्रों में वर्णित
जिन भक्तों ने प्रत्येक कर्म को प्रभु को अर्पित करना सीखा, जैसा यह श्लोक सिखाता है, वे कठिनतम कर्तव्यों को भी शांत, अव्यथित हृदय से निभाते रहे — यह जीवंत प्रमाण है कि भगवान को अर्पित कर्म सहज और मुक्त हो जाता है।
मंत्र
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मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥
mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā nirāśhīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigata-jvaraḥ
अर्थ:सम्पूर्ण कर्मों को अध्यात्म-चित्त से मुझमें अर्पण करके, आशा और ममता से रहित तथा संतापरहित होकर तुम युद्ध करो।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ३.३० — मयि सर्वाणि कर्माणि पाठ के लाभ
प्रत्येक कर्म को पूजा रूप में भगवान को अर्पित करने की कला सिखाता है
कर्म और कर्तव्य से व्याकुल चिंता, फिक्र और तनाव को दूर करता है
हृदय को फल की लालसा और 'मेरे' के बोझ से मुक्त करता है
कठिन कर्तव्यों का सामना शांत, समर्पित मन से करने का साहस बनाता है
कर्मयोग को भक्ति से जोड़ता है, श्रम को आध्यात्मिक साधना में बदलता है
पूर्ण रूप से सक्रिय रहते हुए भी आंतरिक शांति और अनासक्ति का विकास करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ३.३० — मयि सर्वाणि कर्माणि जप विधि
इस श्लोक का पाठ अपने दिन या किसी भी महत्वपूर्ण कर्तव्य के आरंभ में करें, अपने समस्त कर्मों को मन ही मन भगवान को अर्पित करते हुए और उनके फल के प्रति आसक्ति छोड़ते हुए। 'निराशीर्निर्ममो' शब्द आपको लालसा और ममता त्यागने की याद दिलाएँ, और 'विगत-ज्वरः' चिंता से मुक्त होकर कर्म करने की। यह दबाव, संघर्ष या भय का सामना करते समय विशेष रूप से प्रभावशाली है — कर्तव्य को एक अर्पण रूप में, शांत और अनासक्त भाव से करें।
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