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भवानीभुजङ्गम् Meaning — Line by Line

भवानीभुजङ्गम्

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of भवानीभुजङ्गम् with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

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  1. Verse 1. ṣaḍādhārapaṅkeruhāntarvirājat
  2. Verse 2. jvalatkoṭibālārkabhāsāruṇāṅgīṃ
  3. Verse 3. kvaṇatkiṅkiṇīnūpurodbhāsiratna-
  4. Verse 4. suśoṇāmbarābaddhanīvīvirājan-
  5. Verse 5. lasadvṛttagambhīranābhīsarojaṃ
  6. Verse 6. kucau kuṅkumāgāragarbhapravālau
  7. Verse 7. lalāṭaśriyaṃ vallabhaikānubhāvāṃ
  8. Verse 8. bhaje vaktramabjaprabhājālalolaṃ
  9. Verse 9. suphullāravindāyatākṣīṃ suvakṣo-
  10. Verse 10. sunāsāpuṭaṃ sundarabhrūlalāṭaṃ
  11. Verse 11. parāśaktirājñīsamākrāntaviśvāṃ
  12. Verse 12. śrutīnāṃ muhurbhūṣaṇaṃ tarkagamyaṃ
  13. Verse 13. mahāyogapīṭhe paribhrājamāne
  14. Verse 14. idaṃ yastu nityaṃ samādhāya cittaṃ
  15. Verse 15. kavitvaṃ ca vāgmitvamedhādikaṃ ca
  16. Verse 16. bhavāni tvadīyāṅghrisevānuraktān
  17. Verse 17. bhavāni tvadīyaṃ padāmbhojapotaṃ
Verse 1#

ṣaḍādhārapaṅkeruhāntarvirājat

षडाधारपङ्केरुहान्तर्विराजत् सुषुम्नान्तरालेऽतितेजोल्लसन्तीम् सुधामण्डलं द्रावयन्तीं पिबन्तीं सुधामूर्तिमीडे चिदानन्दरूपाम् १॥

ṣaḍādhārapaṅkeruhāntarvirājat suṣumnāntarāle'titejollasantīm | sudhāmaṇḍalaṃ drāvayantīṃ pibantīṃ sudhāmūrtimīḍe cidānandarūpām || 1||

Meaning1. मैं उस नेक्टार-स्वरूपा, चिदानन्द-रूपा देवी की स्तुति करता हूँ — जो षट्चक्रों के कमलों के भीतर विराजती हैं, सुषुम्ना के मध्य में अति तेज से देदीप्यमान हैं, और जो अमृत-मण्डल को द्रवित करके पान करती हैं।

Verse 2#

jvalatkoṭibālārkabhāsāruṇāṅgīṃ

ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गीं सुलावण्यशृङ्गारशोभाभिरामाम् महापद्मकिञ्जल्कमध्ये विराजत्- त्रिकोणे निषण्णां भजे श्रीभवानीम् २॥

jvalatkoṭibālārkabhāsāruṇāṅgīṃ sulāvaṇyaśṛṅgāraśobhābhirāmām | mahāpadmakiñjalkamadhye virājat- trikoṇe niṣaṇṇāṃ bhaje śrībhavānīm || 2||

Meaning2. मैं श्रीभवानी की उपासना करता हूँ, जिनके अंग करोड़ों उदित बालसूर्यों की आभा-से अरुण हैं, जो सुलावण्य एवं शृंगार की शोभा से अभिराम हैं, और जो महापद्म के किंजल्क के मध्य विराजमान त्रिकोण पर आसीन हैं।

Verse 3#

kvaṇatkiṅkiṇīnūpurodbhāsiratna-

क्वणत्किङ्किणीनूपुरोद्भासिरत्न- प्रभालीढलाक्षार्द्रपादाब्जयुग्माम् अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानां महात्रिपुरां श्रीशिवां भावयामि ३॥

kvaṇatkiṅkiṇīnūpurodbhāsiratna- prabhālīḍhalākṣārdrapādābjayugmām | ajeśācyutādyaiḥ suraiḥ sevyamānāṃ mahātripurāṃ śrīśivāṃ bhāvayāmi || 3||

Meaning3. मैं महात्रिपुरा, श्रीशिवा (शक्ति) का ध्यान करता हूँ, जिनके चरण-कमल — रत्नजटित क्वणित किंकिणी-नूपुरों की प्रभा से दीप्त और लाक्षारस से आर्द्र — ब्रह्मा, शिव, विष्णु आदि देवों से सेवित हैं।

Verse 4#

suśoṇāmbarābaddhanīvīvirājan-

सुशोणाम्बराबद्धनीवीविराजन्- महारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम् स्फुरद्दक्षिणावर्तनाभिं तस्या भजे वल्लरीवद्विशालं त्रिवल्लीम् ४॥

suśoṇāmbarābaddhanīvīvirājan- mahāratnakāñcīkalāpaṃ nitambam | sphuraddakṣiṇāvartanābhiṃ ca tasyā bhaje vallarīvadviśālaṃ trivallīm || 4||

Meaning4. मैं उनके नितम्ब की उपासना करता हूँ, जो सुशोण वस्त्र की नीवी और महारत्न-काञ्ची से सुशोभित है, जिनकी नाभि दक्षिणावर्त है, तथा जिनकी त्रिवली लता-सी विशाल एवं मनोहर है।

Verse 5#

lasadvṛttagambhīranābhīsarojaṃ

लसद्वृत्तगम्भीरनाभीसरोजं निजाङ्गोद्भवस्थूलरोमावलीभिः भ्रमद्भ्रमराडम्बरं सुन्दराख्यं भजे तत्तटित्कोटिकान्तं भवान्याः ५॥

lasadvṛttagambhīranābhīsarojaṃ nijāṅgodbhavasthūlaromāvalībhiḥ | bhramadbhramarāḍambaraṃ sundarākhyaṃ bhaje tattaṭitkoṭikāntaṃ bhavānyāḥ || 5||

Meaning5. मैं भवानी के उस नाभि-कमल की उपासना करता हूँ — गोल, गम्भीर और सुन्दर — जो शरीर से उत्पन्न रोमावली से भ्रमरसमूह-सा घिरा है, और जो करोड़ों विद्युत्-सा कान्तिमान है।

Verse 6#

kucau kuṅkumāgāragarbhapravālau

कुचौ कुङ्कुमागारगर्भप्रवालौ पराभीतिमुद्राकरस्योपकण्ठौ रमामन्दिरौ चामरारातिकुम्भौ भजे चन्दनालिप्तकौ भव्यरूपौ ६॥

kucau kuṅkumāgāragarbhapravālau parābhītimudrākarasyopakaṇṭhau | ramāmandirau cāmarārātikumbhau bhaje candanāliptakau bhavyarūpau || 6||

Meaning6. मैं उनके दोनों कुचों की उपासना करता हूँ, जो कुंकुम-भण्डार-से प्रवाल-वर्ण हैं, अभय एवं वर-मुद्रा वाले हाथ के समीप हैं, जो रमा (लक्ष्मी) के मन्दिर एवं गजकुम्भ-से हैं, चन्दन से लिप्त और भव्यरूप हैं।

Verse 7#

lalāṭaśriyaṃ vallabhaikānubhāvāṃ

ललाटश्रियं वल्लभैकानुभावां भुजामूलविन्यस्तचूताग्रकोटिम् कलङ्काधिवासं हसच्चन्द्रबिम्बं श्रिये नौमि कस्तूरिकातिप्रसन्नम् ७॥

lalāṭaśriyaṃ vallabhaikānubhāvāṃ bhujāmūlavinyastacūtāgrakoṭim | kalaṅkādhivāsaṃ hasaccandrabimbaṃ śriye naumi kastūrikātiprasannam || 7||

Meaning7. श्री (समृद्धि) के लिए मैं उनके ललाट की शोभा को प्रणाम करता हूँ — जो वल्लभ (शिव) के लिए अनुपम है, भुजमूल पर रखे आम्र-पल्लव-अग्र से युक्त है, जो कलंक (चन्द्रकला) का निवास हसते चन्द्रबिम्ब-सा है, और कस्तूरी से अति प्रसन्न है।

Verse 8#

bhaje vaktramabjaprabhājālalolaṃ

भजे वक्त्रमब्जप्रभाजाललोलं लसद्वारिजाक्षीयुगं विभ्रमाक्षम् ललाटान्तरालम्बिमाणिक्यभूषं वहन्तीं चलत्कुण्डलोद्योतगण्डम् ८॥

bhaje vaktramabjaprabhājālalolaṃ lasadvārijākṣīyugaṃ vibhramākṣam | lalāṭāntarālambimāṇikyabhūṣaṃ vahantīṃ calatkuṇḍalodyotagaṇḍam || 8||

Meaning8. मैं उनके मुख की उपासना करता हूँ, जो कमल-प्रभा के जाल से चंचल है, जो दीप्त कमलनयन एवं विभ्रमयुक्त नेत्रों को धारण करता है, ललाट पर लटकते माणिक्य से भूषित है, और चलते कुण्डलों की द्युति से जिनके कपोल प्रकाशित हैं।

Verse 9#

suphullāravindāyatākṣīṃ suvakṣo-

सुफुल्लारविन्दायताक्षीं सुवक्षो- रुहां चारुहासां सुकर्णावतंसाम् सुमध्यां सुवृत्तस्तनीं सुस्मितास्यां भजे श्रीमहेशीं भवानीं भवानीम् ९॥

suphullāravindāyatākṣīṃ suvakṣo- ruhāṃ cāruhāsāṃ sukarṇāvataṃsām | sumadhyāṃ suvṛttastanīṃ susmitāsyāṃ bhaje śrīmaheśīṃ bhavānīṃ bhavānīm || 9||

Meaning9. मैं श्रीमहेशी, भवानी, भवानी की उपासना करता हूँ — सुविकसित कमल-से दीर्घ नेत्रों वाली, सुन्दर वक्ष वाली, मनोहर हास वाली, सुकर्ण-आभूषणों वाली, सुमध्या, सुवृत्त-स्तनी और सुस्मित-मुखी।

Verse 10#

sunāsāpuṭaṃ sundarabhrūlalāṭaṃ

सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं तरङ्गायताक्षं सुधाधौतगण्डम् सुबिम्बाधरं कुन्ददन्तप्रभाढ्यं भजे चन्द्रचूडालसत्केशपाशम् १०॥

sunāsāpuṭaṃ sundarabhrūlalāṭaṃ taraṅgāyatākṣaṃ sudhādhautagaṇḍam | subimbādharaṃ kundadantaprabhāḍhyaṃ bhaje candracūḍālasatkeśapāśam || 10||

Meaning10. मैं उनकी उपासना करता हूँ — सुन्दर नासापुट, मनोहर भ्रू एवं ललाट, तरंग-से दीर्घ नेत्र, अमृत-धौत कपोल, बिम्बफल-से अधर, कुन्द-दन्त-प्रभा से युक्त, और चन्द्रचूड से सुशोभित केशपाश वाली।

Verse 11#

parāśaktirājñīsamākrāntaviśvāṃ

पराशक्तिराज्ञीसमाक्रान्तविश्वां परां भोगमोक्षप्रदां शाम्भवीं ताम् पराकारकामेश्वरीं कामकोटिं भजे चित्स्वरूपां जगन्मातरं श्रीम् ११॥

parāśaktirājñīsamākrāntaviśvāṃ parāṃ bhogamokṣapradāṃ śāmbhavīṃ tām | parākārakāmeśvarīṃ kāmakoṭiṃ bhaje citsvarūpāṃ jaganmātaraṃ śrīm || 11||

Meaning11. मैं श्री, जगन्माता, चिद्रूपा की उपासना करता हूँ — परा-शक्ति, समस्त विश्व पर अधिष्ठित राज्ञी, भोग एवं मोक्ष दोनों देने वाली शाम्भवी, परा कामेश्वरी एवं कामकोटि।

Verse 12#

śrutīnāṃ muhurbhūṣaṇaṃ tarkagamyaṃ

श्रुतीनां मुहुर्भूषणं तर्कगम्यं मनोवाक्पथातीतमत्यन्तदूरम् निजानन्दबीजं सदा बुद्धिनिष्ठं निराकारमोङ्कारगम्यं भजेऽहम् १२॥

śrutīnāṃ muhurbhūṣaṇaṃ tarkagamyaṃ manovākpathātītamatyantadūram | nijānandabījaṃ sadā buddhiniṣṭhaṃ nirākāramoṅkāragamyaṃ bhaje'ham || 12||

Meaning12. मैं उसकी उपासना करता हूँ, जो वेदों का सदा भूषण है, तर्क से ग्राह्य किन्तु मन-वाणी के पथ से अतीत एवं अत्यन्त दूर है, निज-आनन्द का बीज है, सदा बुद्धि में निष्ठित है, निराकार है और ओंकार द्वारा गम्य है।

Verse 13#

mahāyogapīṭhe paribhrājamāne

महायोगपीठे परिभ्राजमाने निषण्णं शिवेनापि साम्यं वहन्तीम् सहस्रारपद्मे सदा भावयामि प्रबुद्धां परां चिच्छरीरां भवानीम् १३॥

mahāyogapīṭhe paribhrājamāne niṣaṇṇaṃ śivenāpi sāmyaṃ vahantīm | sahasrārapadme sadā bhāvayāmi prabuddhāṃ parāṃ cicchharīrāṃ bhavānīm || 13||

Meaning13. मैं देदीप्यमान महायोगपीठ में, सहस्रार-कमल में, सदा भवानी का ध्यान करता हूँ — जो प्रबुद्ध, परा, चित्-शरीरा हैं और जो वहाँ शिव के साथ साम्य धारण किए विराजती हैं।

Verse 14#

idaṃ yastu nityaṃ samādhāya cittaṃ

इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेद्भक्तियुक्तो भवानीभुजङ्गम् मृत्युं विजित्यापि मेधां श्रियं समासाद्य देहान्तरे मुक्तिमेति १४॥

idaṃ yastu nityaṃ samādhāya cittaṃ paṭhedbhaktiyukto bhavānībhujaṅgam | sa mṛtyuṃ vijityāpi medhāṃ śriyaṃ ca samāsādya dehāntare muktimeti || 14||

Meaning14. जो भक्तियुक्त होकर चित्त को एकाग्र कर नित्य इस भवानीभुजंग का पाठ करता है, वह मृत्यु को भी जीतकर मेधा एवं श्री प्राप्त करता है और देहान्त के पश्चात् मुक्ति को प्राप्त होता है।

Verse 15#

kavitvaṃ ca vāgmitvamedhādikaṃ ca

कवित्वं वाग्मित्वमेधादिकं प्रसन्ना भवानी ददात्येव तस्मै इदं स्तोत्रराजं पठन्ति प्रकामं नरा ये नितान्तं प्रसीदेन्महेशी १५॥

kavitvaṃ ca vāgmitvamedhādikaṃ ca prasannā bhavānī dadātyeva tasmai | idaṃ stotrarājaṃ paṭhanti prakāmaṃ narā ye nitāntaṃ prasīdenmaheśī || 15||

Meaning15. प्रसन्न भवानी उसे कवित्व, वाग्मिता, मेधा आदि अवश्य प्रदान करती हैं। जो मनुष्य इस स्तोत्रराज का इच्छानुसार पाठ करते हैं, उन पर महेशी नितान्त प्रसन्न हों।

Verse 16#

bhavāni tvadīyāṅghrisevānuraktān

भवानि त्वदीयाङ्घ्रिसेवानुरक्तान् जनान्पाहि कारुण्यपूर्णैः कटाक्षैः जगन्मातरस्मादृशां पामराणां गतिस्त्वं विना नैव लोके मदम्ब १६॥

bhavāni tvadīyāṅghrisevānuraktān janānpāhi kāruṇyapūrṇaiḥ kaṭākṣaiḥ | jaganmātarasmādṛśāṃ pāmarāṇāṃ gatistvaṃ vinā naiva loke madamba || 16||

Meaning16. हे भवानि! अपने चरणों की सेवा में अनुरक्त जनों की करुणापूर्ण कटाक्षों से रक्षा कीजिए। हे जगन्माता! हम-जैसे पामरों के लिए संसार में आपके बिना कोई गति नहीं है, हे मेरी अम्बा।

Verse 17#

bhavāni tvadīyaṃ padāmbhojapotaṃ

भवानि त्वदीयं पदाम्भोजपोतं प्रपन्नाय याच्छम्भवे देहि मातः भवाम्भोधिमग्नं समुद्धर्तुमीशे भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि १७॥

bhavāni tvadīyaṃ padāmbhojapotaṃ prapannāya yācchambhave dehi mātaḥ | bhavāmbhodhimagnaṃ samuddhartumīśe bhavāni tvamekā gatirme bhavāni || 17||

Meaning17. हे भवानि! शरणागत मुझे शिव तक पहुँचाने वाली अपने पादाम्भोज की नौका प्रदान कीजिए, हे माता। आप संसार-सागर में डूबते को उद्धार करने में समर्थ हैं। हे भवानि! आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि।

Word-by-Word Breakdown

षडाधारपङ्केरुहान्तर्विराजत्
ṣaḍ-ādhāra-paṅkeruha-antar-virājat
षट् आधार-चक्रों के कमलों के भीतर देदीप्यमान
सुषुम्नान्तराले
suṣumnā-antarāle
सुषुम्ना (केन्द्रीय नाडी) के अन्तराल में
सुधामण्डलं द्रावयन्तीं पिबन्तीम्
sudhā-maṇḍalaṃ drāvayantīṃ pibantīm
जो अमृत-मण्डल (चन्द्र/अमृत) को द्रवित करके पान करती हैं
सुधामूर्तिम् ईडे चिदानन्दरूपाम्
sudhā-mūrtim īḍe cidānanda-rūpām
मैं उनकी स्तुति करता हूँ, जो अमृत की मूर्ति हैं, जिनका स्वरूप चित्-आनन्द है
ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गीम्
jvalat-koṭi-bālārka-bhāsā-aruṇa-aṅgīm
जिनका शरीर करोड़ों उदित बालसूर्यों की आभा-सा अरुण है
त्रिकोणे निषण्णां भजे श्रीभवानीम्
trikoṇe niṣaṇṇāṃ bhaje śrī-bhavānīm
मैं श्रीभवानी की उपासना करता हूँ, जो त्रिकोण में (महापद्म के मध्य) विराजमान हैं
क्वणत्किङ्किणीनूपुर
kvaṇat-kiṅkiṇī-nūpura
क्वणित किंकिणी (घुँघरुओं) से युक्त नूपुरों वाली
अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानाम्
aja-īśa-acyuta-ādyaiḥ suraiḥ sevyamānām
ब्रह्मा, शिव, विष्णु आदि देवों से सेवित
महात्रिपुरां श्रीशिवां भावयामि
mahā-tripurāṃ śrī-śivāṃ bhāvayāmi
मैं महात्रिपुरा, मंगलमयी शिवा (शक्ति) का ध्यान करता हूँ
महारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम्
mahā-ratna-kāñcī-kalāpaṃ nitambam
महारत्न-काञ्ची (करधनी) से वेष्टित नितम्ब वाली
कुचौ कुङ्कुमागारगर्भप्रवालौ
kucau kuṅkuma-āgāra-garbha-pravālau
जिनका वक्ष प्रवाल-सा अरुण है, कुंकुम से भरे भण्डार-सा
रमामन्दिरौ
ramā-mandirau
रमा (लक्ष्मी) का साक्षात् मन्दिर
हसच्चन्द्रबिम्बम्
hasat-candra-bimbam
(जिनका ललाट) हसते चन्द्रबिम्ब-सा है
कस्तूरिकातिप्रसन्नम्
kastūrikā-ati-prasannam
कस्तूरी-तिलक से अति प्रसन्न (मनोहर)
सुफुल्लारविन्दायताक्षीम्
suphulla-aravinda-āyata-akṣīm
सुविकसित कमल-से दीर्घ नेत्रों वाली
भजे श्रीमहेशीं भवानीं भवानीम्
bhaje śrī-maheśīṃ bhavānīṃ bhavānīm
मैं भवानी, भवानी, महेश्वरी महेशी की उपासना करता हूँ
चन्द्रचूडालसत्केशपाशम्
candra-cūḍā-lasat-keśa-pāśam
जिनका केशपाश चन्द्रकला को शिरोभूषण रूप में धारण किए शोभित है
परां भोगमोक्षप्रदां शाम्भवीम्
parāṃ bhoga-mokṣa-pradāṃ śāmbhavīm
परा शाम्भवी, भोग एवं मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली
मनोवाक्पथातीतम् अत्यन्तदूरम्
mano-vāk-patha-atītam atyanta-dūram
मन एवं वाणी के पथ से अतीत, अत्यन्त दूर (परे)
सहस्रारपद्मे सदा भावयामि
sahasrāra-padme sadā bhāvayāmi
सहस्रदल कमल (सहस्रार) में मैं सदा उनका ध्यान करता हूँ
भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि
bhavāni tvam-ekā gatir-me bhavāni
हे भवानि, आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि

Origin & History

Source: Devotional hymn attributed to Adi Shankaracharya (Sri Vidya / Shakta tradition)

Author: Adi Shankaracharya

Period: c. 8th century CE (traditional attribution)

भवानीभुजङ्गम् आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध 'भुजंगम्' स्तोत्रों में से एक है, जो सर्पिल भुजंगप्रयात छन्द में रचित है। सौन्दर्यलहरी की भाँति, यह कोमल भक्ति को श्रीविद्या एवं कुण्डलिनी योग के गूढ़ विज्ञान के साथ मिलाता है: कवि देवी की उपस्थिति को मूलाधार चक्र से सुषुम्ना द्वारा सहस्रार तक अनुगमन करते हैं, और उन्हें एक साथ सुन्दर माता एवं मन-वाणी से परे परा-शक्ति के रूप में स्तुति करते हैं। यह शाक्त साहित्य की सर्वाधिक मार्मिक शरणागतियों में से एक पर समाप्त होता है।

Frequently Asked Questions

भवानीभुजङ्गम् में 'भुजंगम्' का क्या अर्थ है?
'भुजंग' का अर्थ है सर्प, और 'भुजंगप्रयात' ('सर्प की गति') उस संस्कृत छन्द का नाम है जिसमें यह स्तोत्र रचा गया है — एक प्रवाहमय चतुष्पाद छन्द। अतः 'भवानीभुजंगम्' का अर्थ है भुजंगप्रयात छन्द में रचित भवानी की स्तुति, वही छन्द जो शंकराचार्य के सुब्रह्मण्यभुजंगम् में प्रयुक्त है।
भवानीभुजङ्गम् की रचना किसने की?
यह परम्परागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है, जिन्होंने कई 'भुजंगम्' स्तोत्र रचे। यह जटिल श्रीविद्या एवं कुण्डलिनी कल्पना के साथ देवी भवानी (पार्वती) की स्तुति करता है, चक्रों में उनकी उपस्थिति का वर्णन करते हुए।
इस स्तोत्र की कल्पना में क्या विशेष है?
भवानीभुजङ्गम् देवी के कुण्डलिनी-शक्ति रूप में आरोहण का अनुसरण करता है — षट्चक्रों एवं सुषुम्ना से आरम्भ होकर सहस्रदल सहस्रार-कमल में परिणत होता है, जहाँ वे शिव से एकाकार हैं। यह चरण-से-मुकुट भक्तिपूर्ण वर्णन को गहन योग एवं श्रीविद्या प्रतीकात्मकता के साथ मिलाता है।
भवानीभुजङ्गम् की प्रसिद्ध समापन पंक्ति क्या है?
अन्तिम श्लोक 'भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि' पर समाप्त होता है — 'हे भवानि, आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि' — जो दिव्य माता के प्रति पूर्ण शरणागति की सर्वाधिक प्रिय अभिव्यक्तियों में से एक है।

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