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भवानीभुजङ्गम्

🕉️ hindu·📿 17× जप·🕐 शुक्रवार, नवरात्रि के दौरान, पूर्णिमा को, अथवा प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात्।·📜 Devotional hymn attributed to Adi Shankaracharya (Sri Vidya / Shakta tradition)

अन्य नाम / खोज: bhavani bhujangam · bhavani bhujanga stotram · bhavani bhujanga prayata stotram · shadadhara pankeruha · bhavani tvam eka gatir me

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अर्थ

भवानीभुजङ्गम् आदि शंकराचार्य द्वारा सुन्दर भुजंगप्रयात छन्द में रचित सत्रह श्लोकों की भक्तिपूर्ण स्तुति है। यह देवी भवानी (पार्वती) का चरण से मुकुट तक वर्णन करती है, जो षट्चक्रों एवं सुषुम्ना से होकर सहस्रार तक प्रकाशित होती हैं, और उन्हें भोग एवं मोक्ष दोनों देने वाली परा-शक्ति के रूप में पहचानती है। अन्तिम श्लोक हृदयस्पर्शी शरणागति हैं, जो प्रसिद्ध टेक 'भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि' पर समाप्त होते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Devotional hymn attributed to Adi Shankaracharya (Sri Vidya / Shakta tradition) · Adi Shankaracharya · c. 8th century CE (traditional attribution)

भवानीभुजङ्गम् आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध 'भुजंगम्' स्तोत्रों में से एक है, जो सर्पिल भुजंगप्रयात छन्द में रचित है। सौन्दर्यलहरी की भाँति, यह कोमल भक्ति को श्रीविद्या एवं कुण्डलिनी योग के गूढ़ विज्ञान के साथ मिलाता है: कवि देवी की उपस्थिति को मूलाधार चक्र से सुषुम्ना द्वारा सहस्रार तक अनुगमन करते हैं, और उन्हें एक साथ सुन्दर माता एवं मन-वाणी से परे परा-शक्ति के रूप में स्तुति करते हैं। यह शाक्त साहित्य की सर्वाधिक मार्मिक शरणागतियों में से एक पर समाप्त होता है।

शास्त्रों में वर्णित

स्तोत्र स्वयं अपना फल घोषित करता है: जो इसे स्थिर, भक्तियुक्त मन से नित्य पढ़ता है, वह 'मृत्यु को जीतता है, मेधा एवं श्री प्राप्त करता है, और दूसरे शरीर में मुक्ति पाता है।' भक्त सत्रहवें श्लोक को जीवनरक्षक मानते हैं — भवानी को संसार-सागर पार कराने वाली एकमात्र नौका कहते हैं — और इसके निरन्तर पाठ द्वारा उनकी कृपा में शरण एवं उद्धार पाने का अनुभव सुनाते हैं।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

षडाधारपङ्केरुहान्तर्विराजत् सुषुम्नान्तरालेऽतितेजोल्लसन्तीम् सुधामण्डलं द्रावयन्तीं पिबन्तीं सुधामूर्तिमीडे चिदानन्दरूपाम् १॥

ṣaḍādhārapaṅkeruhāntarvirājat suṣumnāntarāle'titejollasantīm | sudhāmaṇḍalaṃ drāvayantīṃ pibantīṃ sudhāmūrtimīḍe cidānandarūpām || 1||

अर्थ:1. मैं उस नेक्टार-स्वरूपा, चिदानन्द-रूपा देवी की स्तुति करता हूँ — जो षट्चक्रों के कमलों के भीतर विराजती हैं, सुषुम्ना के मध्य में अति तेज से देदीप्यमान हैं, और जो अमृत-मण्डल को द्रवित करके पान करती हैं।

श्लोक 2

ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गीं सुलावण्यशृङ्गारशोभाभिरामाम् महापद्मकिञ्जल्कमध्ये विराजत्- त्रिकोणे निषण्णां भजे श्रीभवानीम् २॥

jvalatkoṭibālārkabhāsāruṇāṅgīṃ sulāvaṇyaśṛṅgāraśobhābhirāmām | mahāpadmakiñjalkamadhye virājat- trikoṇe niṣaṇṇāṃ bhaje śrībhavānīm || 2||

अर्थ:2. मैं श्रीभवानी की उपासना करता हूँ, जिनके अंग करोड़ों उदित बालसूर्यों की आभा-से अरुण हैं, जो सुलावण्य एवं शृंगार की शोभा से अभिराम हैं, और जो महापद्म के किंजल्क के मध्य विराजमान त्रिकोण पर आसीन हैं।

श्लोक 3

क्वणत्किङ्किणीनूपुरोद्भासिरत्न- प्रभालीढलाक्षार्द्रपादाब्जयुग्माम् अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानां महात्रिपुरां श्रीशिवां भावयामि ३॥

kvaṇatkiṅkiṇīnūpurodbhāsiratna- prabhālīḍhalākṣārdrapādābjayugmām | ajeśācyutādyaiḥ suraiḥ sevyamānāṃ mahātripurāṃ śrīśivāṃ bhāvayāmi || 3||

अर्थ:3. मैं महात्रिपुरा, श्रीशिवा (शक्ति) का ध्यान करता हूँ, जिनके चरण-कमल — रत्नजटित क्वणित किंकिणी-नूपुरों की प्रभा से दीप्त और लाक्षारस से आर्द्र — ब्रह्मा, शिव, विष्णु आदि देवों से सेवित हैं।

श्लोक 4

सुशोणाम्बराबद्धनीवीविराजन्- महारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम् स्फुरद्दक्षिणावर्तनाभिं तस्या भजे वल्लरीवद्विशालं त्रिवल्लीम् ४॥

suśoṇāmbarābaddhanīvīvirājan- mahāratnakāñcīkalāpaṃ nitambam | sphuraddakṣiṇāvartanābhiṃ ca tasyā bhaje vallarīvadviśālaṃ trivallīm || 4||

अर्थ:4. मैं उनके नितम्ब की उपासना करता हूँ, जो सुशोण वस्त्र की नीवी और महारत्न-काञ्ची से सुशोभित है, जिनकी नाभि दक्षिणावर्त है, तथा जिनकी त्रिवली लता-सी विशाल एवं मनोहर है।

श्लोक 5

लसद्वृत्तगम्भीरनाभीसरोजं निजाङ्गोद्भवस्थूलरोमावलीभिः भ्रमद्भ्रमराडम्बरं सुन्दराख्यं भजे तत्तटित्कोटिकान्तं भवान्याः ५॥

lasadvṛttagambhīranābhīsarojaṃ nijāṅgodbhavasthūlaromāvalībhiḥ | bhramadbhramarāḍambaraṃ sundarākhyaṃ bhaje tattaṭitkoṭikāntaṃ bhavānyāḥ || 5||

अर्थ:5. मैं भवानी के उस नाभि-कमल की उपासना करता हूँ — गोल, गम्भीर और सुन्दर — जो शरीर से उत्पन्न रोमावली से भ्रमरसमूह-सा घिरा है, और जो करोड़ों विद्युत्-सा कान्तिमान है।

श्लोक 6

कुचौ कुङ्कुमागारगर्भप्रवालौ पराभीतिमुद्राकरस्योपकण्ठौ रमामन्दिरौ चामरारातिकुम्भौ भजे चन्दनालिप्तकौ भव्यरूपौ ६॥

kucau kuṅkumāgāragarbhapravālau parābhītimudrākarasyopakaṇṭhau | ramāmandirau cāmarārātikumbhau bhaje candanāliptakau bhavyarūpau || 6||

अर्थ:6. मैं उनके दोनों कुचों की उपासना करता हूँ, जो कुंकुम-भण्डार-से प्रवाल-वर्ण हैं, अभय एवं वर-मुद्रा वाले हाथ के समीप हैं, जो रमा (लक्ष्मी) के मन्दिर एवं गजकुम्भ-से हैं, चन्दन से लिप्त और भव्यरूप हैं।

श्लोक 7

ललाटश्रियं वल्लभैकानुभावां भुजामूलविन्यस्तचूताग्रकोटिम् कलङ्काधिवासं हसच्चन्द्रबिम्बं श्रिये नौमि कस्तूरिकातिप्रसन्नम् ७॥

lalāṭaśriyaṃ vallabhaikānubhāvāṃ bhujāmūlavinyastacūtāgrakoṭim | kalaṅkādhivāsaṃ hasaccandrabimbaṃ śriye naumi kastūrikātiprasannam || 7||

अर्थ:7. श्री (समृद्धि) के लिए मैं उनके ललाट की शोभा को प्रणाम करता हूँ — जो वल्लभ (शिव) के लिए अनुपम है, भुजमूल पर रखे आम्र-पल्लव-अग्र से युक्त है, जो कलंक (चन्द्रकला) का निवास हसते चन्द्रबिम्ब-सा है, और कस्तूरी से अति प्रसन्न है।

श्लोक 8

भजे वक्त्रमब्जप्रभाजाललोलं लसद्वारिजाक्षीयुगं विभ्रमाक्षम् ललाटान्तरालम्बिमाणिक्यभूषं वहन्तीं चलत्कुण्डलोद्योतगण्डम् ८॥

bhaje vaktramabjaprabhājālalolaṃ lasadvārijākṣīyugaṃ vibhramākṣam | lalāṭāntarālambimāṇikyabhūṣaṃ vahantīṃ calatkuṇḍalodyotagaṇḍam || 8||

अर्थ:8. मैं उनके मुख की उपासना करता हूँ, जो कमल-प्रभा के जाल से चंचल है, जो दीप्त कमलनयन एवं विभ्रमयुक्त नेत्रों को धारण करता है, ललाट पर लटकते माणिक्य से भूषित है, और चलते कुण्डलों की द्युति से जिनके कपोल प्रकाशित हैं।

श्लोक 9

सुफुल्लारविन्दायताक्षीं सुवक्षो- रुहां चारुहासां सुकर्णावतंसाम् सुमध्यां सुवृत्तस्तनीं सुस्मितास्यां भजे श्रीमहेशीं भवानीं भवानीम् ९॥

suphullāravindāyatākṣīṃ suvakṣo- ruhāṃ cāruhāsāṃ sukarṇāvataṃsām | sumadhyāṃ suvṛttastanīṃ susmitāsyāṃ bhaje śrīmaheśīṃ bhavānīṃ bhavānīm || 9||

अर्थ:9. मैं श्रीमहेशी, भवानी, भवानी की उपासना करता हूँ — सुविकसित कमल-से दीर्घ नेत्रों वाली, सुन्दर वक्ष वाली, मनोहर हास वाली, सुकर्ण-आभूषणों वाली, सुमध्या, सुवृत्त-स्तनी और सुस्मित-मुखी।

श्लोक 10

सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं तरङ्गायताक्षं सुधाधौतगण्डम् सुबिम्बाधरं कुन्ददन्तप्रभाढ्यं भजे चन्द्रचूडालसत्केशपाशम् १०॥

sunāsāpuṭaṃ sundarabhrūlalāṭaṃ taraṅgāyatākṣaṃ sudhādhautagaṇḍam | subimbādharaṃ kundadantaprabhāḍhyaṃ bhaje candracūḍālasatkeśapāśam || 10||

अर्थ:10. मैं उनकी उपासना करता हूँ — सुन्दर नासापुट, मनोहर भ्रू एवं ललाट, तरंग-से दीर्घ नेत्र, अमृत-धौत कपोल, बिम्बफल-से अधर, कुन्द-दन्त-प्रभा से युक्त, और चन्द्रचूड से सुशोभित केशपाश वाली।

श्लोक 11

पराशक्तिराज्ञीसमाक्रान्तविश्वां परां भोगमोक्षप्रदां शाम्भवीं ताम् पराकारकामेश्वरीं कामकोटिं भजे चित्स्वरूपां जगन्मातरं श्रीम् ११॥

parāśaktirājñīsamākrāntaviśvāṃ parāṃ bhogamokṣapradāṃ śāmbhavīṃ tām | parākārakāmeśvarīṃ kāmakoṭiṃ bhaje citsvarūpāṃ jaganmātaraṃ śrīm || 11||

अर्थ:11. मैं श्री, जगन्माता, चिद्रूपा की उपासना करता हूँ — परा-शक्ति, समस्त विश्व पर अधिष्ठित राज्ञी, भोग एवं मोक्ष दोनों देने वाली शाम्भवी, परा कामेश्वरी एवं कामकोटि।

श्लोक 12

श्रुतीनां मुहुर्भूषणं तर्कगम्यं मनोवाक्पथातीतमत्यन्तदूरम् निजानन्दबीजं सदा बुद्धिनिष्ठं निराकारमोङ्कारगम्यं भजेऽहम् १२॥

śrutīnāṃ muhurbhūṣaṇaṃ tarkagamyaṃ manovākpathātītamatyantadūram | nijānandabījaṃ sadā buddhiniṣṭhaṃ nirākāramoṅkāragamyaṃ bhaje'ham || 12||

अर्थ:12. मैं उसकी उपासना करता हूँ, जो वेदों का सदा भूषण है, तर्क से ग्राह्य किन्तु मन-वाणी के पथ से अतीत एवं अत्यन्त दूर है, निज-आनन्द का बीज है, सदा बुद्धि में निष्ठित है, निराकार है और ओंकार द्वारा गम्य है।

श्लोक 13

महायोगपीठे परिभ्राजमाने निषण्णं शिवेनापि साम्यं वहन्तीम् सहस्रारपद्मे सदा भावयामि प्रबुद्धां परां चिच्छरीरां भवानीम् १३॥

mahāyogapīṭhe paribhrājamāne niṣaṇṇaṃ śivenāpi sāmyaṃ vahantīm | sahasrārapadme sadā bhāvayāmi prabuddhāṃ parāṃ cicchharīrāṃ bhavānīm || 13||

अर्थ:13. मैं देदीप्यमान महायोगपीठ में, सहस्रार-कमल में, सदा भवानी का ध्यान करता हूँ — जो प्रबुद्ध, परा, चित्-शरीरा हैं और जो वहाँ शिव के साथ साम्य धारण किए विराजती हैं।

श्लोक 14

इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेद्भक्तियुक्तो भवानीभुजङ्गम् मृत्युं विजित्यापि मेधां श्रियं समासाद्य देहान्तरे मुक्तिमेति १४॥

idaṃ yastu nityaṃ samādhāya cittaṃ paṭhedbhaktiyukto bhavānībhujaṅgam | sa mṛtyuṃ vijityāpi medhāṃ śriyaṃ ca samāsādya dehāntare muktimeti || 14||

अर्थ:14. जो भक्तियुक्त होकर चित्त को एकाग्र कर नित्य इस भवानीभुजंग का पाठ करता है, वह मृत्यु को भी जीतकर मेधा एवं श्री प्राप्त करता है और देहान्त के पश्चात् मुक्ति को प्राप्त होता है।

श्लोक 15

कवित्वं वाग्मित्वमेधादिकं प्रसन्ना भवानी ददात्येव तस्मै इदं स्तोत्रराजं पठन्ति प्रकामं नरा ये नितान्तं प्रसीदेन्महेशी १५॥

kavitvaṃ ca vāgmitvamedhādikaṃ ca prasannā bhavānī dadātyeva tasmai | idaṃ stotrarājaṃ paṭhanti prakāmaṃ narā ye nitāntaṃ prasīdenmaheśī || 15||

अर्थ:15. प्रसन्न भवानी उसे कवित्व, वाग्मिता, मेधा आदि अवश्य प्रदान करती हैं। जो मनुष्य इस स्तोत्रराज का इच्छानुसार पाठ करते हैं, उन पर महेशी नितान्त प्रसन्न हों।

श्लोक 16

भवानि त्वदीयाङ्घ्रिसेवानुरक्तान् जनान्पाहि कारुण्यपूर्णैः कटाक्षैः जगन्मातरस्मादृशां पामराणां गतिस्त्वं विना नैव लोके मदम्ब १६॥

bhavāni tvadīyāṅghrisevānuraktān janānpāhi kāruṇyapūrṇaiḥ kaṭākṣaiḥ | jaganmātarasmādṛśāṃ pāmarāṇāṃ gatistvaṃ vinā naiva loke madamba || 16||

अर्थ:16. हे भवानि! अपने चरणों की सेवा में अनुरक्त जनों की करुणापूर्ण कटाक्षों से रक्षा कीजिए। हे जगन्माता! हम-जैसे पामरों के लिए संसार में आपके बिना कोई गति नहीं है, हे मेरी अम्बा।

श्लोक 17

भवानि त्वदीयं पदाम्भोजपोतं प्रपन्नाय याच्छम्भवे देहि मातः भवाम्भोधिमग्नं समुद्धर्तुमीशे भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि १७॥

bhavāni tvadīyaṃ padāmbhojapotaṃ prapannāya yācchambhave dehi mātaḥ | bhavāmbhodhimagnaṃ samuddhartumīśe bhavāni tvamekā gatirme bhavāni || 17||

अर्थ:17. हे भवानि! शरणागत मुझे शिव तक पहुँचाने वाली अपने पादाम्भोज की नौका प्रदान कीजिए, हे माता। आप संसार-सागर में डूबते को उद्धार करने में समर्थ हैं। हे भवानि! आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

षडाधारपङ्केरुहान्तर्विराजत्🔊ṣaḍ-ādhāra-paṅkeruha-antar-virājatषट् आधार-चक्रों के कमलों के भीतर देदीप्यमान
सुषुम्नान्तराले🔊suṣumnā-antarāleसुषुम्ना (केन्द्रीय नाडी) के अन्तराल में
सुधामण्डलं द्रावयन्तीं पिबन्तीम्🔊sudhā-maṇḍalaṃ drāvayantīṃ pibantīmजो अमृत-मण्डल (चन्द्र/अमृत) को द्रवित करके पान करती हैं
सुधामूर्तिम् ईडे चिदानन्दरूपाम्🔊sudhā-mūrtim īḍe cidānanda-rūpāmमैं उनकी स्तुति करता हूँ, जो अमृत की मूर्ति हैं, जिनका स्वरूप चित्-आनन्द है
ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गीम्🔊jvalat-koṭi-bālārka-bhāsā-aruṇa-aṅgīmजिनका शरीर करोड़ों उदित बालसूर्यों की आभा-सा अरुण है
त्रिकोणे निषण्णां भजे श्रीभवानीम्🔊trikoṇe niṣaṇṇāṃ bhaje śrī-bhavānīmमैं श्रीभवानी की उपासना करता हूँ, जो त्रिकोण में (महापद्म के मध्य) विराजमान हैं
क्वणत्किङ्किणीनूपुर🔊kvaṇat-kiṅkiṇī-nūpuraक्वणित किंकिणी (घुँघरुओं) से युक्त नूपुरों वाली
अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानाम्🔊aja-īśa-acyuta-ādyaiḥ suraiḥ sevyamānāmब्रह्मा, शिव, विष्णु आदि देवों से सेवित
महात्रिपुरां श्रीशिवां भावयामि🔊mahā-tripurāṃ śrī-śivāṃ bhāvayāmiमैं महात्रिपुरा, मंगलमयी शिवा (शक्ति) का ध्यान करता हूँ
महारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम्🔊mahā-ratna-kāñcī-kalāpaṃ nitambamमहारत्न-काञ्ची (करधनी) से वेष्टित नितम्ब वाली
कुचौ कुङ्कुमागारगर्भप्रवालौ🔊kucau kuṅkuma-āgāra-garbha-pravālauजिनका वक्ष प्रवाल-सा अरुण है, कुंकुम से भरे भण्डार-सा
रमामन्दिरौ🔊ramā-mandirauरमा (लक्ष्मी) का साक्षात् मन्दिर
हसच्चन्द्रबिम्बम्🔊hasat-candra-bimbam(जिनका ललाट) हसते चन्द्रबिम्ब-सा है
कस्तूरिकातिप्रसन्नम्🔊kastūrikā-ati-prasannamकस्तूरी-तिलक से अति प्रसन्न (मनोहर)
सुफुल्लारविन्दायताक्षीम्🔊suphulla-aravinda-āyata-akṣīmसुविकसित कमल-से दीर्घ नेत्रों वाली
भजे श्रीमहेशीं भवानीं भवानीम्🔊bhaje śrī-maheśīṃ bhavānīṃ bhavānīmमैं भवानी, भवानी, महेश्वरी महेशी की उपासना करता हूँ
चन्द्रचूडालसत्केशपाशम्🔊candra-cūḍā-lasat-keśa-pāśamजिनका केशपाश चन्द्रकला को शिरोभूषण रूप में धारण किए शोभित है
परां भोगमोक्षप्रदां शाम्भवीम्🔊parāṃ bhoga-mokṣa-pradāṃ śāmbhavīmपरा शाम्भवी, भोग एवं मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली
मनोवाक्पथातीतम् अत्यन्तदूरम्🔊mano-vāk-patha-atītam atyanta-dūramमन एवं वाणी के पथ से अतीत, अत्यन्त दूर (परे)
सहस्रारपद्मे सदा भावयामि🔊sahasrāra-padme sadā bhāvayāmiसहस्रदल कमल (सहस्रार) में मैं सदा उनका ध्यान करता हूँ
भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि🔊bhavāni tvam-ekā gatir-me bhavāniहे भवानि, आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि

भवानीभुजङ्गम् पाठ के लाभ

मृत्यु के भय पर विजय एवं मुक्ति की प्राप्ति का वचन देता है (श्लोक 14)।

कवित्व, वाग्मिता एवं तीक्ष्ण मेधा प्रदान करता है (श्लोक 15)।

भवानी 'भोग-मोक्ष-प्रदा' होने से लौकिक भोग एवं अन्तिम मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

देवी का सम्पूर्ण चरण-से-मुकुट (अथवा मुकुट-से-चरण) ध्यान, जो दर्शन-साधना के लिए आदर्श है।

मूलाधार से चक्रों के माध्यम से सहस्रार तक चेतना के आरोहण में सहायक।

दिव्य माता के प्रति गहन भक्ति एवं पूर्ण शरणागति का भाव विकसित करता है।

श्री (समृद्धि) तथा देवी के करुणामय कटाक्षों की रक्षक कृपा प्रदान करता है।

भवानीभुजङ्गम् जप विधि

जप संख्या17बार
उत्तम समयशुक्रवार, नवरात्रि के दौरान, पूर्णिमा को, अथवा प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात्।

स्नान के पश्चात् देवी की प्रतिमा अथवा श्रीचक्र के समक्ष बैठें। सत्रह श्लोकों को शान्त, भक्तियुक्त मन से धीरे-धीरे पढ़ें (स्तोत्र स्वयं कहता है कि इसे 'समाधाय चित्तम्' — स्थिर मन से — पढ़ना चाहिए)। चरणों से ऊपर की ओर चक्रों के माध्यम से वर्णन का अनुसरण करें, प्रत्येक रूप की कल्पना करें, और समापन श्लोकों की शरणागति-भावना में अन्त करें। परम्परागत रूप से इसका नित्य पाठ किया जाता है; अन्तिम 'भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि' को हृदयस्पर्शी प्रार्थना के रूप में समाप्त करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'भुजंग' का अर्थ है सर्प, और 'भुजंगप्रयात' ('सर्प की गति') उस संस्कृत छन्द का नाम है जिसमें यह स्तोत्र रचा गया है — एक प्रवाहमय चतुष्पाद छन्द। अतः 'भवानीभुजंगम्' का अर्थ है भुजंगप्रयात छन्द में रचित भवानी की स्तुति, वही छन्द जो शंकराचार्य के सुब्रह्मण्यभुजंगम् में प्रयुक्त है।
यह परम्परागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है, जिन्होंने कई 'भुजंगम्' स्तोत्र रचे। यह जटिल श्रीविद्या एवं कुण्डलिनी कल्पना के साथ देवी भवानी (पार्वती) की स्तुति करता है, चक्रों में उनकी उपस्थिति का वर्णन करते हुए।
भवानीभुजङ्गम् देवी के कुण्डलिनी-शक्ति रूप में आरोहण का अनुसरण करता है — षट्चक्रों एवं सुषुम्ना से आरम्भ होकर सहस्रदल सहस्रार-कमल में परिणत होता है, जहाँ वे शिव से एकाकार हैं। यह चरण-से-मुकुट भक्तिपूर्ण वर्णन को गहन योग एवं श्रीविद्या प्रतीकात्मकता के साथ मिलाता है।
अन्तिम श्लोक 'भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि' पर समाप्त होता है — 'हे भवानि, आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि' — जो दिव्य माता के प्रति पूर्ण शरणागति की सर्वाधिक प्रिय अभिव्यक्तियों में से एक है।

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