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भवानीभुजङ्गम् PDF

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षडाधारपङ्केरुहान्तर्विराजत् सुषुम्नान्तरालेऽतितेजोल्लसन्तीम् । सुधामण्डलं द्रावयन्तीं पिबन्तीं सुधामूर्तिमीडे चिदानन्दरूपाम् ॥ १॥

ṣaḍādhārapaṅkeruhāntarvirājat suṣumnāntarāle'titejollasantīm | sudhāmaṇḍalaṃ drāvayantīṃ pibantīṃ sudhāmūrtimīḍe cidānandarūpām || 1||

1. मैं उस नेक्टार-स्वरूपा, चिदानन्द-रूपा देवी की स्तुति करता हूँ — जो षट्चक्रों के कमलों के भीतर विराजती हैं, सुषुम्ना के मध्य में अति तेज से देदीप्यमान हैं, और जो अमृत-मण्डल को द्रवित करके पान करती हैं।

ज्वलत्कोटिबालार्कभासारुणाङ्गीं सुलावण्यशृङ्गारशोभाभिरामाम् । महापद्मकिञ्जल्कमध्ये विराजत्- त्रिकोणे निषण्णां भजे श्रीभवानीम् ॥ २॥

jvalatkoṭibālārkabhāsāruṇāṅgīṃ sulāvaṇyaśṛṅgāraśobhābhirāmām | mahāpadmakiñjalkamadhye virājat- trikoṇe niṣaṇṇāṃ bhaje śrībhavānīm || 2||

2. मैं श्रीभवानी की उपासना करता हूँ, जिनके अंग करोड़ों उदित बालसूर्यों की आभा-से अरुण हैं, जो सुलावण्य एवं शृंगार की शोभा से अभिराम हैं, और जो महापद्म के किंजल्क के मध्य विराजमान त्रिकोण पर आसीन हैं।

क्वणत्किङ्किणीनूपुरोद्भासिरत्न- प्रभालीढलाक्षार्द्रपादाब्जयुग्माम् । अजेशाच्युताद्यैः सुरैः सेव्यमानां महात्रिपुरां श्रीशिवां भावयामि ॥ ३॥

kvaṇatkiṅkiṇīnūpurodbhāsiratna- prabhālīḍhalākṣārdrapādābjayugmām | ajeśācyutādyaiḥ suraiḥ sevyamānāṃ mahātripurāṃ śrīśivāṃ bhāvayāmi || 3||

3. मैं महात्रिपुरा, श्रीशिवा (शक्ति) का ध्यान करता हूँ, जिनके चरण-कमल — रत्नजटित क्वणित किंकिणी-नूपुरों की प्रभा से दीप्त और लाक्षारस से आर्द्र — ब्रह्मा, शिव, विष्णु आदि देवों से सेवित हैं।

सुशोणाम्बराबद्धनीवीविराजन्- महारत्नकाञ्चीकलापं नितम्बम् । स्फुरद्दक्षिणावर्तनाभिं च तस्या भजे वल्लरीवद्विशालं त्रिवल्लीम् ॥ ४॥

suśoṇāmbarābaddhanīvīvirājan- mahāratnakāñcīkalāpaṃ nitambam | sphuraddakṣiṇāvartanābhiṃ ca tasyā bhaje vallarīvadviśālaṃ trivallīm || 4||

4. मैं उनके नितम्ब की उपासना करता हूँ, जो सुशोण वस्त्र की नीवी और महारत्न-काञ्ची से सुशोभित है, जिनकी नाभि दक्षिणावर्त है, तथा जिनकी त्रिवली लता-सी विशाल एवं मनोहर है।

लसद्वृत्तगम्भीरनाभीसरोजं निजाङ्गोद्भवस्थूलरोमावलीभिः । भ्रमद्भ्रमराडम्बरं सुन्दराख्यं भजे तत्तटित्कोटिकान्तं भवान्याः ॥ ५॥

lasadvṛttagambhīranābhīsarojaṃ nijāṅgodbhavasthūlaromāvalībhiḥ | bhramadbhramarāḍambaraṃ sundarākhyaṃ bhaje tattaṭitkoṭikāntaṃ bhavānyāḥ || 5||

5. मैं भवानी के उस नाभि-कमल की उपासना करता हूँ — गोल, गम्भीर और सुन्दर — जो शरीर से उत्पन्न रोमावली से भ्रमरसमूह-सा घिरा है, और जो करोड़ों विद्युत्-सा कान्तिमान है।

कुचौ कुङ्कुमागारगर्भप्रवालौ पराभीतिमुद्राकरस्योपकण्ठौ । रमामन्दिरौ चामरारातिकुम्भौ भजे चन्दनालिप्तकौ भव्यरूपौ ॥ ६॥

kucau kuṅkumāgāragarbhapravālau parābhītimudrākarasyopakaṇṭhau | ramāmandirau cāmarārātikumbhau bhaje candanāliptakau bhavyarūpau || 6||

6. मैं उनके दोनों कुचों की उपासना करता हूँ, जो कुंकुम-भण्डार-से प्रवाल-वर्ण हैं, अभय एवं वर-मुद्रा वाले हाथ के समीप हैं, जो रमा (लक्ष्मी) के मन्दिर एवं गजकुम्भ-से हैं, चन्दन से लिप्त और भव्यरूप हैं।

ललाटश्रियं वल्लभैकानुभावां भुजामूलविन्यस्तचूताग्रकोटिम् । कलङ्काधिवासं हसच्चन्द्रबिम्बं श्रिये नौमि कस्तूरिकातिप्रसन्नम् ॥ ७॥

lalāṭaśriyaṃ vallabhaikānubhāvāṃ bhujāmūlavinyastacūtāgrakoṭim | kalaṅkādhivāsaṃ hasaccandrabimbaṃ śriye naumi kastūrikātiprasannam || 7||

7. श्री (समृद्धि) के लिए मैं उनके ललाट की शोभा को प्रणाम करता हूँ — जो वल्लभ (शिव) के लिए अनुपम है, भुजमूल पर रखे आम्र-पल्लव-अग्र से युक्त है, जो कलंक (चन्द्रकला) का निवास हसते चन्द्रबिम्ब-सा है, और कस्तूरी से अति प्रसन्न है।

भजे वक्त्रमब्जप्रभाजाललोलं लसद्वारिजाक्षीयुगं विभ्रमाक्षम् । ललाटान्तरालम्बिमाणिक्यभूषं वहन्तीं चलत्कुण्डलोद्योतगण्डम् ॥ ८॥

bhaje vaktramabjaprabhājālalolaṃ lasadvārijākṣīyugaṃ vibhramākṣam | lalāṭāntarālambimāṇikyabhūṣaṃ vahantīṃ calatkuṇḍalodyotagaṇḍam || 8||

8. मैं उनके मुख की उपासना करता हूँ, जो कमल-प्रभा के जाल से चंचल है, जो दीप्त कमलनयन एवं विभ्रमयुक्त नेत्रों को धारण करता है, ललाट पर लटकते माणिक्य से भूषित है, और चलते कुण्डलों की द्युति से जिनके कपोल प्रकाशित हैं।

सुफुल्लारविन्दायताक्षीं सुवक्षो- रुहां चारुहासां सुकर्णावतंसाम् । सुमध्यां सुवृत्तस्तनीं सुस्मितास्यां भजे श्रीमहेशीं भवानीं भवानीम् ॥ ९॥

suphullāravindāyatākṣīṃ suvakṣo- ruhāṃ cāruhāsāṃ sukarṇāvataṃsām | sumadhyāṃ suvṛttastanīṃ susmitāsyāṃ bhaje śrīmaheśīṃ bhavānīṃ bhavānīm || 9||

9. मैं श्रीमहेशी, भवानी, भवानी की उपासना करता हूँ — सुविकसित कमल-से दीर्घ नेत्रों वाली, सुन्दर वक्ष वाली, मनोहर हास वाली, सुकर्ण-आभूषणों वाली, सुमध्या, सुवृत्त-स्तनी और सुस्मित-मुखी।

सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं तरङ्गायताक्षं सुधाधौतगण्डम् । सुबिम्बाधरं कुन्ददन्तप्रभाढ्यं भजे चन्द्रचूडालसत्केशपाशम् ॥ १०॥

sunāsāpuṭaṃ sundarabhrūlalāṭaṃ taraṅgāyatākṣaṃ sudhādhautagaṇḍam | subimbādharaṃ kundadantaprabhāḍhyaṃ bhaje candracūḍālasatkeśapāśam || 10||

10. मैं उनकी उपासना करता हूँ — सुन्दर नासापुट, मनोहर भ्रू एवं ललाट, तरंग-से दीर्घ नेत्र, अमृत-धौत कपोल, बिम्बफल-से अधर, कुन्द-दन्त-प्रभा से युक्त, और चन्द्रचूड से सुशोभित केशपाश वाली।

पराशक्तिराज्ञीसमाक्रान्तविश्वां परां भोगमोक्षप्रदां शाम्भवीं ताम् । पराकारकामेश्वरीं कामकोटिं भजे चित्स्वरूपां जगन्मातरं श्रीम् ॥ ११॥

parāśaktirājñīsamākrāntaviśvāṃ parāṃ bhogamokṣapradāṃ śāmbhavīṃ tām | parākārakāmeśvarīṃ kāmakoṭiṃ bhaje citsvarūpāṃ jaganmātaraṃ śrīm || 11||

11. मैं श्री, जगन्माता, चिद्रूपा की उपासना करता हूँ — परा-शक्ति, समस्त विश्व पर अधिष्ठित राज्ञी, भोग एवं मोक्ष दोनों देने वाली शाम्भवी, परा कामेश्वरी एवं कामकोटि।

श्रुतीनां मुहुर्भूषणं तर्कगम्यं मनोवाक्पथातीतमत्यन्तदूरम् । निजानन्दबीजं सदा बुद्धिनिष्ठं निराकारमोङ्कारगम्यं भजेऽहम् ॥ १२॥

śrutīnāṃ muhurbhūṣaṇaṃ tarkagamyaṃ manovākpathātītamatyantadūram | nijānandabījaṃ sadā buddhiniṣṭhaṃ nirākāramoṅkāragamyaṃ bhaje'ham || 12||

12. मैं उसकी उपासना करता हूँ, जो वेदों का सदा भूषण है, तर्क से ग्राह्य किन्तु मन-वाणी के पथ से अतीत एवं अत्यन्त दूर है, निज-आनन्द का बीज है, सदा बुद्धि में निष्ठित है, निराकार है और ओंकार द्वारा गम्य है।

महायोगपीठे परिभ्राजमाने निषण्णं शिवेनापि साम्यं वहन्तीम् । सहस्रारपद्मे सदा भावयामि प्रबुद्धां परां चिच्छरीरां भवानीम् ॥ १३॥

mahāyogapīṭhe paribhrājamāne niṣaṇṇaṃ śivenāpi sāmyaṃ vahantīm | sahasrārapadme sadā bhāvayāmi prabuddhāṃ parāṃ cicchharīrāṃ bhavānīm || 13||

13. मैं देदीप्यमान महायोगपीठ में, सहस्रार-कमल में, सदा भवानी का ध्यान करता हूँ — जो प्रबुद्ध, परा, चित्-शरीरा हैं और जो वहाँ शिव के साथ साम्य धारण किए विराजती हैं।

इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेद्भक्तियुक्तो भवानीभुजङ्गम् । स मृत्युं विजित्यापि मेधां श्रियं च समासाद्य देहान्तरे मुक्तिमेति ॥ १४॥

idaṃ yastu nityaṃ samādhāya cittaṃ paṭhedbhaktiyukto bhavānībhujaṅgam | sa mṛtyuṃ vijityāpi medhāṃ śriyaṃ ca samāsādya dehāntare muktimeti || 14||

14. जो भक्तियुक्त होकर चित्त को एकाग्र कर नित्य इस भवानीभुजंग का पाठ करता है, वह मृत्यु को भी जीतकर मेधा एवं श्री प्राप्त करता है और देहान्त के पश्चात् मुक्ति को प्राप्त होता है।

कवित्वं च वाग्मित्वमेधादिकं च प्रसन्ना भवानी ददात्येव तस्मै । इदं स्तोत्रराजं पठन्ति प्रकामं नरा ये नितान्तं प्रसीदेन्महेशी ॥ १५॥

kavitvaṃ ca vāgmitvamedhādikaṃ ca prasannā bhavānī dadātyeva tasmai | idaṃ stotrarājaṃ paṭhanti prakāmaṃ narā ye nitāntaṃ prasīdenmaheśī || 15||

15. प्रसन्न भवानी उसे कवित्व, वाग्मिता, मेधा आदि अवश्य प्रदान करती हैं। जो मनुष्य इस स्तोत्रराज का इच्छानुसार पाठ करते हैं, उन पर महेशी नितान्त प्रसन्न हों।

भवानि त्वदीयाङ्घ्रिसेवानुरक्तान् जनान्पाहि कारुण्यपूर्णैः कटाक्षैः । जगन्मातरस्मादृशां पामराणां गतिस्त्वं विना नैव लोके मदम्ब ॥ १६॥

bhavāni tvadīyāṅghrisevānuraktān janānpāhi kāruṇyapūrṇaiḥ kaṭākṣaiḥ | jaganmātarasmādṛśāṃ pāmarāṇāṃ gatistvaṃ vinā naiva loke madamba || 16||

16. हे भवानि! अपने चरणों की सेवा में अनुरक्त जनों की करुणापूर्ण कटाक्षों से रक्षा कीजिए। हे जगन्माता! हम-जैसे पामरों के लिए संसार में आपके बिना कोई गति नहीं है, हे मेरी अम्बा।

भवानि त्वदीयं पदाम्भोजपोतं प्रपन्नाय याच्छम्भवे देहि मातः । भवाम्भोधिमग्नं समुद्धर्तुमीशे भवानि त्वमेका गतिर्मे भवानि ॥ १७॥

bhavāni tvadīyaṃ padāmbhojapotaṃ prapannāya yācchambhave dehi mātaḥ | bhavāmbhodhimagnaṃ samuddhartumīśe bhavāni tvamekā gatirme bhavāni || 17||

17. हे भवानि! शरणागत मुझे शिव तक पहुँचाने वाली अपने पादाम्भोज की नौका प्रदान कीजिए, हे माता। आप संसार-सागर में डूबते को उद्धार करने में समर्थ हैं। हे भवानि! आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, हे भवानि।