गणेशभुजङ्गम्
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✦ अर्थ
गणेश भुजङ्गम् आदि शंकराचार्य द्वारा प्रवाहमयी भुजंगप्रयात छन्द में रचित नौ श्लोकों का स्तोत्र है, जो नृत्य करते हुए गणेश के स्वरूप की स्तुति करता है। प्रथम छह श्लोक उनकी नृत्यमुद्रा का चित्रण करते हैं — झंकारती घण्टियाँ, उठी हुई सूँड, रत्नजड़ित मुकुट, सर्प का हार — और प्रत्येक 'गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे' से समाप्त होता है। अन्तिम श्लोक निराकार ब्रह्म तक पहुँचते हैं और कहते हैं कि जो प्रातः इसका पाठ करता है उसे समस्त कामनाएँ तथा वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है।
उत्पत्ति और कथा
Stotra attributed to the works of Adi Shankaracharya (Shankaracharya Stotra collection) · Adi Shankaracharya · Traditionally 8th century CE
गणेश भुजङ्गम् आदि शंकराचार्य की प्रसिद्ध 'भुजंग' स्तोत्र-श्रृंखला का अंग है, जिनमें उन्होंने भक्ति को लहराते, गीतमय छन्द में ढाला। जहाँ दार्शनिक आचार्य अन्यत्र निराकार ब्रह्म का विवेचन करते हैं, वहीं यहाँ वे पहले ईश्वर के सबसे मूर्त एवं आनन्दमय रूप में रमते हैं — गजमुख गणेश ताण्डव नृत्य करते, घण्टियाँ बजती, सूँड घूमती। श्लोक-दर-श्लोक वे इस मोहक रूप से ऊपर उठकर इस बोध तक पहुँचते हैं कि वही गणेश अविनाशी ॐ हैं, गुणातीत परब्रह्म हैं — इस प्रकार एक ही लघु स्तोत्र में भक्ति एवं ज्ञान को एक कर देते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा कहती है कि जो अरुणोदय से पूर्व उठकर प्रतिदिन भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करते हैं उन्हें वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है — वह वरदान जिससे वे जो सच्चे मन से कहते हैं वह घटित होता है। भक्त एवं विद्वान बताते हैं कि निरन्तर पाठ ने हकलाहट से बँधी जिह्वाओं को खोल दिया, परीक्षाओं में विद्यार्थियों को वाक्पटुता दी, और गायकों एवं वक्ताओं की वाणी में असाधारण शक्ति एवं सत्यता भर दी।
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रणत्क्षुद्रघण्टानिनादाभिरामं चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम्। लसत्तुन्दिलाङ्गोपरिव्यालहारं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥१॥
raṇat-kṣudra-ghaṇṭā-ninādābhirāmaṁ chalat-tāṇḍavoddaṇḍavat-padma-tālam। lasat-tundilāṅgopari-vyāla-hāraṁ gaṇādhīśam-īśāna-sūnuṁ tam-īḍe॥1॥
अर्थ:मैं गणाधीश, ईशानपुत्र (शिव के पुत्र) की स्तुति करता हूँ — जो अपनी छोटी घण्टियों की मधुर झंकार से मनोहर हैं, उद्दण्ड ताण्डव नृत्य में उठे हुए कमल समान चरणों से ताल देते हैं, और जिनके चमकते हुए स्थूल उदर पर सर्प का हार सुशोभित है।
ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्बीजपूरम्। गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥२॥
dhvani-dhvaṁsa-vīṇā-layollāsi-vaktraṁ sphurach-chuṇḍa-daṇḍollasad-bīja-pūram। galad-darpa-saugandhya-lolāli-mālaṁ gaṇādhīśam-īśāna-sūnuṁ tam-īḍe॥2॥
अर्थ:मैं उन गणाधीश की स्तुति करता हूँ जिनका मुख वीणावादन से प्रफुल्लित है, जिनकी चंचल सूँड हर्ष से बीजपूर (अनार) धारण किए है, और जिनके मद की सुगन्ध पर भ्रमरों की पंक्ति मँडराती है।
प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसून- प्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम्। प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥३॥
prakāśaj-japā-rakta-ratna-prasūna- pravāla-prabhā-tāruṇa-jyotir-ekam। pralambodaraṁ vakra-tuṇḍaika-dantaṁ gaṇādhīśam-īśāna-sūnuṁ tam-īḍe॥3॥
अर्थ:मैं उन शिवपुत्र की स्तुति करता हूँ, जिनकी एकमात्र कान्ति प्रवाल, रक्त जपापुष्प और उदयकालीन अरुण रत्न के समान दीप्त है — जो प्रलम्ब उदर वाले, वक्रतुण्ड और एकदन्त हैं।
विचित्रस्फुरद्रत्नमालाकिरीटं किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम्। विभूषैकभूषं भवध्वंसहेतुं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥४॥
vichitra-sphurad-ratna-mālā-kirīṭaṁ kirīṭollasach-chandra-rekhā-vibhūṣam। vibhūṣaika-bhūṣaṁ bhava-dhvaṁsa-hetuṁ gaṇādhīśam-īśāna-sūnuṁ tam-īḍe॥4॥
अर्थ:मैं उन गणाधीश की स्तुति करता हूँ, जो विचित्र रत्नमालाओं से जड़े मुकुट धारण करते हैं, जिस पर चन्द्ररेखा सुशोभित है — जो समस्त आभूषणों के भी आभूषण हैं और संसार-बन्धन के विनाश के कारण हैं।
उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूल- श्चलद्भ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम्। मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥५॥
udañchad-bhujā-vallarī-dṛśya-mūla- ś-chalad-bhrū-latā-vibhrama-bhrājad-akṣam। marut-sundarī-chāmaraiḥ sevyamānaṁ gaṇādhīśam-īśāna-sūnuṁ tam-īḍe॥5॥
अर्थ:मैं उन गणाधीश की स्तुति करता हूँ, जिनकी ऊपर उठी भुजाएँ लता के समान उनके स्वरूप को प्रकट करती हैं, जिनकी चंचल भृकुटि मुख की शोभा बढ़ाती है, और जिनकी सेवा देवांगनाएँ चामरों से करती हैं।
स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं कृपाकोमलोदारलीलावतारम्। कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यै- र्गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे॥६॥
sphuran-niṣṭhurālola-piṅgākṣi-tāraṁ kṛpā-komalodāra-līlāvatāram। kalā-bindu-gaṁ gīyate yogi-varyair- gaṇādhīśam-īśāna-sūnuṁ tam-īḍe॥6॥
अर्थ:मैं उन गणाधीश की स्तुति करता हूँ, जिनके स्थिर नेत्र पिंगल वर्ण के चंचल हैं, जिनका अवतार ही कोमल एवं उदार करुणा की लीला है, और जिन्हें श्रेष्ठ योगी कला-बिन्दु में स्थित जानकर गाते हैं।
यमेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम्। परं परतरं ब्रह्म वेदान्तवेद्यं वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे॥७॥
yam-ekākṣaraṁ nirmalaṁ nirvikalpaṁ guṇātītam-ānandam-ākāra-śūnyam। paraṁ parataraṁ brahma vedānta-vedyaṁ vadanti pragalbhaṁ purāṇaṁ tam-īḍe॥7॥
अर्थ:मैं उनकी स्तुति करता हूँ जिन्हें मनीषी एकाक्षर, निर्मल, निर्विकल्प, गुणातीत, आनन्दस्वरूप, आकाररहित तथा वेदान्त से ज्ञेय परात्पर ब्रह्म कहते हैं।
चिदानन्दसान्द्राय शान्ताय तुभ्यं नमो विश्वकर्त्रे च हर्त्रे च तुभ्यम्। नमोऽनन्तलीलाय कैवल्यभासे नमो विश्वबीज प्रसीदेशसूनो॥८॥
chidānanda-sāndrāya śāntāya tubhyaṁ namo viśva-kartre cha hartre cha tubhyam। namo'nanta-līlāya kaivalya-bhāse namo viśva-bīja prasīdeśa-sūno॥8॥
अर्थ:हे चिदानन्दघन, शान्तस्वरूप, आपको नमस्कार है; हे विश्व के कर्ता और हर्ता, आपको नमस्कार है; अनन्त लीला वाले, कैवल्य के प्रकाशस्वरूप, आपको नमस्कार है; हे विश्वबीज, हे ईशानपुत्र, प्रसन्न होइए।
इमं सुस्तवं प्रातरुत्थाय भक्त्या पठेद्यस्तु मर्त्यो लभेत्सर्वकामान्। गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचो गणेशे विभौ दुर्लभं किं प्रसन्ने॥९॥
imaṁ sustavaṁ prātar-utthāya bhaktyā paṭhed-yas-tu martyo labhet-sarva-kāmān। gaṇeśa-prasādena sidhyanti vācho gaṇeśe vibhau durlabhaṁ kiṁ prasanne॥9॥
अर्थ:जो मनुष्य प्रातः उठकर भक्तिपूर्वक इस सुन्दर स्तोत्र का पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है। गणेश की कृपा से उसकी वाणी सिद्ध हो जाती है — विभु गणेश के प्रसन्न होने पर भला क्या दुर्लभ रह जाता है?
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गणेशभुजङ्गम् पाठ के लाभ
वाक्-सिद्धि प्रदान करता है — जिससे कहा हुआ वचन सत्य हो जाता है
प्रातः भक्तिपूर्वक पाठ करने पर समस्त धर्ममय कामनाएँ पूर्ण होती हैं (अन्तिम श्लोक के अनुसार)
विघ्नों को दूर करता है और संसार के बन्धन को विलीन करता है ('भवध्वंसहेतुम्')
गणेश के नृत्य-स्वरूप के सजीव चिन्तन से भक्ति को तीव्र करता है
काव्य एवं वक्तृत्व की प्रतिभा देता है, अतः विद्यार्थियों एवं वक्ताओं को प्रिय
आदि शंकराचार्य की परम्परा एवं ध्यानगहनता की विशेष कृपा वहन करता है
मन को सगुण (साकार) से निर्गुण (निराकार ब्रह्म) की ओर ले जाता है
गणेशभुजङ्गम् जप विधि
स्नान कर पूर्वाभिमुख होकर गणेश की प्रतिमा के सम्मुख बैठें। सम्पूर्ण नौ श्लोकों का मधुर पाठ करें, भुजंगप्रयात छन्द की लहराती लय का आस्वादन लें जो स्तोत्र को सर्पगति-सा प्रवाह देती है। प्रथम छह श्लोक उनके नृत्य-स्वरूप का ध्यान हैं, अतः प्रत्येक विवरण की कल्पना करें — घण्टियाँ, अनार धारण किए सूँड, रत्नजड़ित मुकुट, सर्प का हार। अन्तिम श्लोक फलश्रुति है; उसे सच्ची प्रार्थना रूप में पढ़ें। दीप जलाएँ और सम्भव हो तो मोदक या लाल पुष्प अर्पित करें, और 'ॐ गं गणपतये नमः' के जप से समाप्त करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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