भ्रमराम्बाष्टकम् — Complete Lyrics
भ्रमराम्बाष्टकम्
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
चाञ्चल्यारुणलोचनाञ्चितकृपाचन्द्रार्कपट्टोदरां
चारुस्मेरमुखीं चराचरजगत्संरक्षणीं तत्पराम् ।
नित्यं चिन्मयकौस्तुभप्रभृतिभिर्भूषामणीभूषितां
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ १॥
cāñcalyāruṇalocanāñcitakṛpācandrārkapaṭṭodarāṃ
cārusmeramukhīṃ carācarajagatsaṃrakṣaṇīṃ tatparām |
nityaṃ cinmayakaustubhaprabhṛtibhirbhūṣāmaṇībhūṣitāṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 1||
1. मैं श्रीशैल में निवास करने वाली भगवती श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जिनके चंचल अरुण नेत्र कृपा से युक्त हैं, जिनका उदर चन्द्र-सूर्य के पट्ट-सा है, जिनका मुख सुन्दर एवं स्मित है, जो चराचर जगत् की रक्षा में तत्पर हैं, और जो चिन्मय कौस्तुभ आदि भूषामणियों से अलंकृत हैं।
Verse 2
कस्तूरीतिलकाञ्चितेन्दुविलसत्प्रोद्भासिफालस्थलीं
कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखदिरामोदोल्लसद्वीटिकाम् ।
लोलापाङ्गतरङ्गितैरधिकृपासारैर्नतानन्दिनीं
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ २॥
kastūrītilakāñcitenduvilasatprodbhāsiphālasthalīṃ
karpūradravamiśracūrṇakhadirāmodollasadvīṭikām |
lolāpāṅgataraṅgitairadhikṛpāsārairnatānandinīṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 2||
2. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जिनका ललाट कस्तूरी-तिलक से चन्द्र-सा देदीप्यमान है, जो कर्पूर-मिश्रित खदिर-सुगन्धित ताम्बूल का आस्वादन करती हैं, और जो अपने चंचल नेत्रान्तों से प्रवाहित अधिक कृपा-धारा से नतजनों को आनन्दित करती हैं।
Verse 3
राजन्मत्तमरालमन्दगमनां राजीवपत्रेक्षणां
राजीवप्रभवादिदेवमकुटैराराधितांघ्रिद्वयाम् ।
राजीवायतमन्दहासवदनां राकेन्दुबिम्बाननां
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ ३॥
rājanmattamarālamandagamanāṃ rājīvapatrekṣaṇāṃ
rājīvaprabhavādidevamakuṭairārādhitāṃghridvayām |
rājīvāyatamandahāsavadanāṃ rākendubimbānanāṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 3||
3. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जिनकी मन्द गति राजहंस-सी है, जिनके नेत्र कमलदल-से हैं, जिनके दोनों चरण ब्रह्मादि देवों के मुकुटों से अर्चित हैं, जिनका मुख कमल-सा मन्दहास-युक्त है और पूर्णचन्द्रबिम्ब-सा है।
Verse 4
षट्तारङ्गणदीपिकां शिवसतीं षड्वैरिवर्गापहां
षट्चक्रान्तरसंस्थितां वरसुधां षड्योगिनीवेष्टिताम् ।
षट्कोणान्तरवर्तिनीं सुरनुतां षड्भावगां षण्मुखीं
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ ४॥
ṣaṭtāraṅgaṇadīpikāṃ śivasatīṃ ṣaḍvairivargāpahāṃ
ṣaṭcakrāntarasaṃsthitāṃ varasudhāṃ ṣaḍyoginīveṣṭitām |
ṣaṭkoṇāntaravartinīṃ suranutāṃ ṣaḍbhāvagāṃ ṣaṇmukhīṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 4||
4. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जो षट्-तारकगण की दीपिका हैं, शिव की सती हैं, षड्वैरिवर्ग (काम-क्रोधादि) की नाशिनी हैं, षट्चक्रों में स्थित श्रेष्ठ सुधा हैं, षड्योगिनियों से वेष्टित हैं, षट्कोण-यन्त्र के मध्य विराजती हैं, देवों से नुत हैं, षड्भावगा एवं षण्मुखी हैं।
Verse 5
श्रीनाथादृतपालितत्रिभुवनां श्रीचक्रसञ्चारिणीं
ज्ञानासक्तमनोजयोगमहितां श्रीबिन्दुनादप्रियाम् ।
मातंगीं मधुपानलोलमनसं माहेश्वरीं श्रीप्रदां
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ ५॥
śrīnāthādṛtapālitatribhuvanāṃ śrīcakrasañcāriṇīṃ
jñānāsaktamanojayogamahitāṃ śrībindunādapriyām |
mātaṅgīṃ madhupānalolamanasaṃ māheśvarīṃ śrīpradāṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 5||
5. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जो श्रीनाथ से आदृत होकर त्रिभुवन का पालन करती हैं, श्रीचक्र में संचार करती हैं, ज्ञानासक्त मनोजय-योग से महित हैं, श्रीबिन्दु-नाद की प्रिया हैं, जो मातंगी हैं, मधुपान में लोलमना हैं, माहेश्वरी एवं श्रीप्रदा हैं।
Verse 6
लावण्याधिकभूषिताङ्गलतिकां लाक्षारसारञ्जितां
सेवायातसमस्तदेववनितां सीमातिगास्थां शिवाम् ।
वाणीवल्लभवासवप्रभृतिभिः संसेविताङ्घ्रिद्वयां
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ ६॥
lāvaṇyādhikabhūṣitāṅgalatikāṃ lākṣārasārañjitāṃ
sevāyātasamastadevavanitāṃ sīmātigāsthāṃ śivām |
vāṇīvallabhavāsavaprabhṛtibhiḥ saṃsevitāṅghridvayāṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 6||
6. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जिनकी अंगलतिका लावण्य से अधिक अलंकृत है, जो लाक्षारस से रंजित हैं, जिनकी सेवा में समस्त देवांगनाएँ आती हैं, जो सीमा से परे स्थित शिवा हैं, और जिनके दोनों चरण ब्रह्मा (वाणीवल्लभ), इन्द्र (वासव) आदि से सेवित हैं।
Verse 7
धन्यां सोमविभावनीयचरितां धात्रादिसम्पूजितां
वेदान्तप्रतिपादितां भगवतीं श्रीशम्भुसम्मानिताम् ।
नित्यं ब्रह्ममुखप्रकीर्तितयशां श्रीनारदाद्यैः स्तुतां
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ ७॥
dhanyāṃ somavibhāvanīyacaritāṃ dhātrādisampūjitāṃ
vedāntapratipāditāṃ bhagavatīṃ śrīśambhusammānitām |
nityaṃ brahmamukhaprakīrtitayaśāṃ śrīnāradādyaiḥ stutāṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 7||
7. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जो धन्या हैं, जिनका चरित चन्द्र-सा विभावनीय है, जो ब्रह्मादि से सम्पूजित हैं, वेदान्त द्वारा प्रतिपादित भगवती हैं, श्रीशम्भु से सम्मानित हैं, जिनका यश ब्रह्मा के मुख से नित्य कीर्तित है, और जो नारदादि से स्तुत हैं।
Verse 8
गायत्रीं गरुडध्वजां गगनगां गान्धर्वगानप्रियां
गम्भीरां गजगामिनीं गिरिसुतां गन्धाक्षतालङ्कृताम् ।
गङ्गागौतमगर्गसन्नुतपदां गां गौतमीं गोमतीं
श्रीशैलस्थलवासिनीं भगवतीं श्रीमातरं भावये ॥ ८॥
gāyatrīṃ garuḍadhvajāṃ gaganagāṃ gāndharvagānapriyāṃ
gambhīrāṃ gajagāminīṃ girisutāṃ gandhākṣatālaṅkṛtām |
gaṅgāgautamagargasannutapadāṃ gāṃ gautamīṃ gomatīṃ
śrīśailasthalavāsinīṃ bhagavatīṃ śrīmātaraṃ bhāvaye || 8||
8. मैं श्रीशैलवासिनी श्रीमाता का ध्यान करता हूँ — जो गायत्री हैं, गरुडध्वजा हैं, गगनगा हैं, गान्धर्व-गान की प्रिया हैं, गम्भीरा हैं, गजगामिनी हैं, गिरिसुता हैं, गन्ध-अक्षत से अलंकृता हैं, जिनके पद गंगा-गौतम-गर्ग से सन्नुत हैं, और जो गौ (पृथ्वी), गौतमी (गोदावरी) एवं गोमती हैं।
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