भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या (देवी की भृकुटि से काली का प्रादुर्भाव) PDF
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भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम् । काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी ॥
bhrukuṭīkuṭilāttasyā lalāṭaphalakāddrutam kālī karālavadanā viniṣkrāntāsipāśinī
उनके भौंहों से टेढ़े हुए ललाट-पटल से सहसा काली प्रकट हुईं, जो विकराल मुख वाली, खड्ग और पाश धारण किए हुए, विचित्र खट्वांग लिए, नर-मुण्डों की माला से विभूषित, बाघ-चर्म पहने, सूखे मांस से अत्यन्त भयंकर थीं; जिनका मुख अत्यन्त फैला हुआ, लपलपाती जीभ से भयानक, गहरे लाल नेत्र वाला, और जिनकी गर्जना से दिशाएँ भर गई थीं।
विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा । द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा ॥
vicitrakhaṭvāṅgadharā naramālāvibhūṣaṇā dvīpicarmaparīdhānā śuṣkamāṃsātibhairavā
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा । निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥
ativistāravadanā jihvālalanabhīṣaṇā nimagnāraktanayanā nādāpūritadiṅmukhā