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ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या — Word-by-Word Meaning

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

ब्रह्म
brahma
ब्रह्म, परम अनन्त सत्ता
सत्यम्
satyam
सत्य, यथार्थ, नित्य विद्यमान
जगत्
jagat
जगत्, नाम-रूप का संसार
मिथ्या
mithyā
मिथ्या, आभासी, केवल प्रतीयमान (परतंत्र) सत्ता वाला
जीवः
jīvaḥ
जीव, देहधारी आत्मा
ब्रह्म एव
brahma eva
ब्रह्म ही, ब्रह्म से अन्य कुछ नहीं
न अपरः
na aparaḥ
भिन्न नहीं, अन्य नहीं
अनेन
anena
इसके द्वारा (इस वचन / उपदेश से)
वेद्यम्
vedyam
जानने योग्य, जो जानने योग्य है
सत्-शास्त्रम्
sat-śāstram
सत्-शास्त्र, समस्त प्रमाण-शास्त्र का सार
इति
iti
इस प्रकार, इस तरह
वेदान्त
vedānta
वेदान्त, वेदों की पराकाष्ठा (उपनिषद्-ज्ञान)
डिण्डिमः
ḍiṇḍimaḥ
डिण्डिम (घोषणा), दुन्दुभि का नाद (सार्वजनिक गूँजती हुई घोषणा)

Complete Translation

ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या (आभासमात्र) है, और जीव ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं। यही जानने योग्य सत्-शास्त्र का सार है — ऐसी वेदान्त की डिण्डिम-घोषणा (दुन्दुभि-नाद) है।

Origin & History

Source: Advaita Vedanta tradition; attributed to Adi Shankaracharya (also appears in Brahma Jnanavali Mala)

Author: Adi Shankaracharya (traditional)

Period: c. 8th century CE

यह श्लोक आदि शंकराचार्य के अद्वैत (अद्वय) दर्शन के एकमात्र सर्वाधिक संक्षिप्त सार के रूप में प्रसिद्ध है। पीढ़ियों से आचार्यों ने इसके तीन चरणों का उपयोग शिष्यों को वेदान्त से परिचित कराने के लिए किया है — ब्रह्म की सत्यता, जगत् की मिथ्यात्व, और जीव का परम तत्त्व के साथ मूल ऐक्य। यह इतना केन्द्रीय है कि इसे वही दुन्दुभि-नाद कहा गया है जिससे वेदान्त संसार के समक्ष अपने सत्य की घोषणा करता है।

Frequently Asked Questions

इस श्लोक की रचना किसने की?
यह परम्परा से आदि शंकराचार्य को आरोपित है और उनके अद्वैत वेदान्त के सर्वाधिक उद्धृत सार के रूप में प्रचलित है। यह वेदान्तिक उपदेश-परम्परा में (ब्रह्मज्ञानावली माला जैसे ग्रन्थों सहित) मिलता है और सर्वत्र अद्वैत का शिरोमणि-वचन माना जाता है।
'जगत् मिथ्या है' का अर्थ क्या यह है कि जगत् का अस्तित्व नहीं?
नहीं। 'मिथ्या' का अर्थ अस्तित्वहीन नहीं है; इसका अर्थ है कि जगत् की केवल परतंत्र, आभासी सत्ता है, जैसे प्रतिबिम्ब या स्वप्न। यह विद्यमान है और अनुभव में आता है, किन्तु जैसे ब्रह्म पूर्णतः स्वतंत्र रूप से सत्य है वैसा यह नहीं है। केवल ब्रह्म की ही अपरिवर्तनशील, स्वयंसिद्ध सत्ता है।
जीव ब्रह्म कैसे हो सकता है?
अद्वैत सिखाता है कि जीव की प्रतीयमान पृथक्ता अविद्या (अज्ञान) के कारण है। जब ज्ञान से यह अज्ञान दूर होता है, तब यही अनुभूति शेष रहती है कि अन्तरतम आत्मा (आत्मन्) कभी अनन्त ब्रह्म से भिन्न था ही नहीं — 'जीवो ब्रह्मैव नापरः'।
'वेदान्त-डिण्डिम' का क्या अर्थ है?
'डिण्डिम' एक ढोल या ऊँची, सार्वजनिक घोषणा है। यह पंक्ति काव्यात्मक रूप से घोषित करती है कि इस त्रिविध सत्य को वेदान्त उतने ही साहस और विजयघोष के साथ उद्घोषित करता है जैसे बजता हुआ ढोल — यह समस्त उपनिषदों का गूँजता हुआ निष्कर्ष है।

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