ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
अन्य नाम / खोज: brahma satyam jagan mithya · brahma satyam jagat mithya · jivo brahmaiva naparah · vedanta dindima · brahma satya jagat mithya
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✦ अर्थ
यह एकमात्र प्रसिद्ध श्लोक प्रायः अद्वैत वेदान्त का सार कहलाता है। तीन सूत्रमय वाक्यों में यह आदि शंकराचार्य के सम्पूर्ण अद्वैत उपदेश को समेट देता है — केवल ब्रह्म सत्य है, नाम-रूप का जगत् मिथ्या (परतंत्र, आभासी सत्ता) है, और जीव वस्तुतः ब्रह्म से अभिन्न है। यह श्लोक इसे समस्त सच्चे शास्त्र का हृदय बताते हुए विजय-दुन्दुभि के समान घोषित करता है।
उत्पत्ति और कथा
Advaita Vedanta tradition; attributed to Adi Shankaracharya (also appears in Brahma Jnanavali Mala) · Adi Shankaracharya (traditional) · c. 8th century CE
यह श्लोक आदि शंकराचार्य के अद्वैत (अद्वय) दर्शन के एकमात्र सर्वाधिक संक्षिप्त सार के रूप में प्रसिद्ध है। पीढ़ियों से आचार्यों ने इसके तीन चरणों का उपयोग शिष्यों को वेदान्त से परिचित कराने के लिए किया है — ब्रह्म की सत्यता, जगत् की मिथ्यात्व, और जीव का परम तत्त्व के साथ मूल ऐक्य। यह इतना केन्द्रीय है कि इसे वही दुन्दुभि-नाद कहा गया है जिससे वेदान्त संसार के समक्ष अपने सत्य की घोषणा करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि जो इस एक श्लोक को सचमुच आत्मसात् कर लेता है, उसे और किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं — इसकी अनुभूति स्वयं मोक्ष है, क्योंकि आत्मा को ब्रह्म जान लेने पर अज्ञान से उत्पन्न बन्धन विलीन हो जाता है।
मंत्र
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ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः॥
brahma satyaṃ jagan-mithyā jīvo brahmaiva nāparaḥ | anena vedyaṃ sacchāstram iti vedānta-ḍiṇḍimaḥ ||
अर्थ:ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या (आभासमात्र) है, और जीव ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं। यही जानने योग्य सत्-शास्त्र का सार है — ऐसी वेदान्त की डिण्डिम-घोषणा (दुन्दुभि-नाद) है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या पाठ के लाभ
अद्वैत वेदान्त के सम्पूर्ण दर्शन को एक स्मरणीय श्लोक में समेट देता है।
जीव की अनन्त ब्रह्म के साथ अभिन्नता की प्रत्यक्ष पुष्टि करता है।
परिवर्तनशील जगत् और देह के साथ अति-तादात्म्य को विलीन करने में सहायक है।
आत्म-ज्ञान के साधकों के लिए एक प्रभावी मनन-श्लोक है।
सत् और असत् के विवेक द्वारा मानसिक स्पष्टता और समता प्रदान करता है।
आचार्यों द्वारा प्रायः अद्वैत ज्ञान के प्रारम्भिक सार के रूप में प्रयुक्त होता है।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जप विधि
श्लोक को उसकी तीन घोषणाओं पर पूर्ण ध्यान के साथ पढ़ें, प्रत्येक पर रुककर मनन करें — ब्रह्म सत्य है, जगत् आभास है, आत्मा ब्रह्म है। यह मुख्यतः मनन और निदिध्यासन के लिए चिन्तन-श्लोक है, न कि अनुष्ठानिक जप, किन्तु वेदान्त के विद्यार्थियों के लिए इसे स्मरण और आत्मसात् करने हेतु 11 या 21 बार दोहराना अत्यन्त उपयुक्त है।