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ब्रह्म स्तुति PDF

ब्रह्म स्तुति की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

श्रीब्रह्मोवाच नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय । वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु- लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥ १ ॥

śrī-brahmovāca naumīḍya te 'bhra-vapuṣe taḍid-ambarāya guñjāvataṃsa-paripiccha-lasan-mukhāya | vanya-sraje kavala-vetra-viṣāṇa-veṇu- lakṣma-śriye mṛdu-pade paśupāṅgajāya || 1 ||

श्रीब्रह्मा ने कहा — हे वन्दनीय प्रभो! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आपका शरीर मेघ के समान श्याम है और वस्त्र बिजली के समान चमकीला; गुञ्जा के कुण्डलों और मयूरपिच्छ से आपका मुख सुशोभित है। वन-पुष्पों की माला धारण किए, हाथ में कौर, छड़ी, सींग और वेणु से युक्त, कोमल चरणों वाले — आप गोपराज नन्द के पुत्र शोभायमान हैं।

अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि । नेशे महि त्ववसितुं मनसान्तरेण साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः ॥ २ ॥

asyāpi deva vapuṣo mad-anugrahasya svecchā-mayasya na tu bhūta-mayasya ko 'pi | neśe mahi tv avasituṃ manasāntareṇa sākṣāt tavaiva kim utātma-sukhānubhūteḥ || 2 ||

हे देव! भक्तों पर अनुग्रह हेतु आपकी इच्छा से प्रकट यह दिव्य शरीर, जो भौतिक तत्त्वों से नहीं बना — इसकी महिमा को भी कोई दीर्घ मानसिक प्रयास से नहीं समझ सकता; फिर आत्मसुख के अनुभवस्वरूप साक्षात् आपको तो कौन समझ सकता है!

ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् । स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥ ३ ॥

jñāne prayāsam udapāsya namanta eva jīvanti san-mukharitāṃ bhavadīya-vārtām | sthāne sthitāḥ śruti-gatāṃ tanu-vāṅ-manobhir ye prāyaśo 'jita jito 'py asi tais tri-lokyām || 3 ||

जो लोग ज्ञान के (शुष्क) प्रयास को त्यागकर केवल नमस्कार करते हुए, सन्तों के मुख से गाई गई आपकी कथाओं में जीवन बिताते हैं — अपनी-अपनी स्थिति में रहते हुए, शरीर, वाणी और मन से श्रवण-प्राप्त (आपके संदेश) के प्रति समर्पित — हे अजित! ऐसे भक्त तीनों लोकों में आप जितों को भी जीत लेते हैं।

श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये । तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ ४ ॥

śreyaḥ-sṛtiṃ bhaktim udasya te vibho kliśyanti ye kevala-bodha-labdhaye | teṣām asau kleśala eva śiṣyate nānyad yathā sthūla-tuṣāvaghātinām || 4 ||

हे विभो! जो लोग श्रेय के मार्ग भक्ति को छोड़कर केवल निर्विशेष ज्ञान की प्राप्ति के लिए क्लेश उठाते हैं, उन्हें केवल क्लेश ही शेष रहता है — जैसे खाली भूसी कूटने वालों को परिश्रम के सिवा कुछ नहीं मिलता।

पुरेह भूमन्बहवोऽपि योगिन- स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया । विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम् ॥ ५ ॥

pureha bhūman bahavo 'pi yoginas tvad-arpitehā nija-karma-labdhayā | vibudhya bhaktyaiva kathopanītayā prapedire 'ñjo 'cyuta te gatiṃ parām || 5 ||

हे भूमन्! इस लोक में पूर्व में अनेक योगी, अपने कर्मों से प्राप्त साधनों द्वारा आप में चेष्टा अर्पित करके और कथा-श्रवण से उत्पन्न भक्ति द्वारा ही प्रबुद्ध होकर, हे अच्युत! सहज ही आपकी परम गति को प्राप्त हुए।

तथापि भूमन्महिमागुणस्य ते विबोद्धुमर्हत्यमलान्तरात्मभिः । अविक्रियात्स्वानुभवादरूपतो ह्यनन्यबोध्यात्मतया न चान्यथा ॥ ६ ॥

tathāpi bhūman mahimāguṇasya te viboddhum arhaty amalāntar-ātmabhiḥ | avikriyāt svānubhavād arūpato hy ananya-bodhyātmatayā na cānyathā || 6 ||

फिर भी, हे भूमन्! दिव्य गुणों वाले आपकी महिमा को निर्मल अन्तःकरण वाले ही जान सकते हैं — अपने निर्विकार, अरूप, आत्मानुभव द्वारा, जिसमें केवल आप ही ज्ञेय हैं — और किसी अन्य प्रकार से नहीं।

गुणात्मनस्तेऽपि गुणान्विमातुं हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य । कालेन यैर्वा विमिताः सुकल्पैर् भूपांशवः खे मिहिका द्युभासः ॥ ७ ॥

guṇātmanas te 'pi guṇān vimātuṃ hitāvatīrṇasya ka īśire 'sya | kālena yair vā vimitāḥ su-kalpair bhū-pāṃśavaḥ khe mihikā dyu-bhāsaḥ || 7 ||

समस्त गुणों के स्वामी होते हुए भी जो जगत् के कल्याण हेतु अवतीर्ण हुए, उन आपके गुणों को मापने में कौन समर्थ है? कोई समर्थ पुरुष काल के द्वारा पृथ्वी के परमाणुओं, आकाश के हिमकणों, अथवा नक्षत्रों के प्रकाश-कणों को भले गिन ले, पर आपकी महिमा को नहीं।

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् । हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥ ८ ॥

tat te 'nukampāṃ su-samīkṣamāṇo bhuñjāna evātma-kṛtaṃ vipākam | hṛd-vāg-vapurbhir vidadhan namas te jīveta yo mukti-pade sa dāya-bhāk || 8 ||

जो मनुष्य आपकी कृपा की भलीभाँति प्रतीक्षा करते हुए, अपने ही पूर्वकृत कर्मों के फल को धैर्यपूर्वक भोगता हुआ, हृदय, वाणी और शरीर से आपको नमस्कार करते हुए जीवन बिताता है — वही मुक्तिपद का सच्चा अधिकारी (उत्तराधिकारी) है।