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ब्रह्म स्तुति

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः अथवा सायं; श्रीमद्भागवत के अध्ययन के समय, एकादशी एवं जन्माष्टमी पर·📜 Srimad Bhagavata Purana, Canto 10, Chapter 14, verses 1–8 (Brahma-stuti, opening verses of Brahma's prayers to Lord Krishna)

अन्य नाम / खोज: brahma stuti · naumidya te abhra vapushe · brahma krita stuti · brahmas prayers to krishna · jnane prayasam udapasya · brahma stuti bhagavatam 10.14

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अर्थ

ब्रह्म स्तुति भगवान् ब्रह्मा द्वारा वृन्दावन में बालक श्रीकृष्ण को अर्पित प्रसिद्ध प्रार्थना है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध (अध्याय 14) में वर्णित है। श्रीकृष्ण के बछड़ों और ग्वालबालों का अपहरण करके उनकी परीक्षा लेने के पश्चात नतमस्तक होकर ब्रह्मा भगवान् के मनोहर गोप-रूप की स्तुति करते हैं और स्वीकार करते हैं कि भगवान् शुष्क ज्ञान या कठोर योग से नहीं, केवल प्रेमाभक्ति से जाने जाते हैं। ये आरम्भिक श्लोक वैष्णव साहित्य की सर्वाधिक उद्धृत पंक्तियों में से हैं — भक्ति की श्रेष्ठता तथा भगवान् की कृपा की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा को मुक्ति का मार्ग बताते हुए।

उत्पत्ति और कथा

Srimad Bhagavata Purana, Canto 10, Chapter 14, verses 1–8 (Brahma-stuti, opening verses of Brahma's prayers to Lord Krishna) · Sage Veda-Vyasa (as spoken by Lord Brahma) · Classical Puranic era

जब श्रीकृष्ण वृन्दावन में ग्वाले के रूप में अपनी बाल-लीलाएँ कर रहे थे, तब भगवान् ब्रह्मा ने उस बालक की दिव्यता परखने की उत्सुकता से अपनी मायाशक्ति द्वारा श्रीकृष्ण के समस्त बछड़ों और ग्वालसखाओं का अपहरण करके उन्हें छिपा दिया। तनिक भी विचलित हुए बिना श्रीकृष्ण ने स्वयं को प्रत्येक लुप्त बछड़े और बालक के समरूप रूपों में विस्तारित कर लिया, और पूरे एक वर्ष तक उनकी अपनी माताओं को भी भ्रमित किए रखा। जब ब्रह्मा लौटे और उन्होंने अपने छिपाए हुए बछड़ों-बालकों तथा श्रीकृष्ण के स्वयं प्रकट किए द्विरूपों को — और फिर अनगिनत चतुर्भुज विष्णु-रूपों की पूजा होते हुए — देखा, तो वे पूर्णतः नतमस्तक हो गए। अपने हंस-वाहन से उतरकर सृष्टिकर्ता ने उस ग्वालबाल के चरणों में प्रणाम किया और यह स्तुति प्रकट की, जिसके ये आरम्भिक श्लोक सर्वाधिक प्रिय हैं।

शास्त्रों में वर्णित

भागवत कहता है कि जब ब्रह्मा ने अपने चुराए हुए बछड़ों और बालकों को खोजा, तो वे उन्हें वहीं सोते हुए मिले जहाँ उन्होंने अपनी माया से छिपाया था — और साथ ही उन्हें वृन्दावन में श्रीकृष्ण के साथ उपस्थित भी देखा, क्योंकि भगवान् स्वयं उनमें से प्रत्येक बन गए थे। फिर ब्रह्मा की आँखों के सामने प्रत्येक बछड़ा और बालक चतुर्भुज नारायण के रूप में प्रकट हुआ, जिनकी ब्रह्मा, शिव और समस्त जीव पूजा कर रहे थे — इसने सृष्टिकर्ता को स्तब्ध कर दिया और श्रीकृष्ण की परम सर्वोच्चता का विश्वास करा दिया।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

श्रीब्रह्मोवाच नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु- लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय

śrī-brahmovāca naumīḍya te 'bhra-vapuṣe taḍid-ambarāya guñjāvataṃsa-paripiccha-lasan-mukhāya | vanya-sraje kavala-vetra-viṣāṇa-veṇu- lakṣma-śriye mṛdu-pade paśupāṅgajāya || 1 ||

अर्थ:श्रीब्रह्मा ने कहा — हे वन्दनीय प्रभो! मैं आपकी स्तुति करता हूँ। आपका शरीर मेघ के समान श्याम है और वस्त्र बिजली के समान चमकीला; गुञ्जा के कुण्डलों और मयूरपिच्छ से आपका मुख सुशोभित है। वन-पुष्पों की माला धारण किए, हाथ में कौर, छड़ी, सींग और वेणु से युक्त, कोमल चरणों वाले — आप गोपराज नन्द के पुत्र शोभायमान हैं।

श्लोक 2

अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य तु भूतमयस्य कोऽपि नेशे महि त्ववसितुं मनसान्तरेण साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः

asyāpi deva vapuṣo mad-anugrahasya svecchā-mayasya na tu bhūta-mayasya ko 'pi | neśe mahi tv avasituṃ manasāntareṇa sākṣāt tavaiva kim utātma-sukhānubhūteḥ || 2 ||

अर्थ:हे देव! भक्तों पर अनुग्रह हेतु आपकी इच्छा से प्रकट यह दिव्य शरीर, जो भौतिक तत्त्वों से नहीं बना — इसकी महिमा को भी कोई दीर्घ मानसिक प्रयास से नहीं समझ सकता; फिर आत्मसुख के अनुभवस्वरूप साक्षात् आपको तो कौन समझ सकता है!

श्लोक 3

ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्

jñāne prayāsam udapāsya namanta eva jīvanti san-mukharitāṃ bhavadīya-vārtām | sthāne sthitāḥ śruti-gatāṃ tanu-vāṅ-manobhir ye prāyaśo 'jita jito 'py asi tais tri-lokyām || 3 ||

अर्थ:जो लोग ज्ञान के (शुष्क) प्रयास को त्यागकर केवल नमस्कार करते हुए, सन्तों के मुख से गाई गई आपकी कथाओं में जीवन बिताते हैं — अपनी-अपनी स्थिति में रहते हुए, शरीर, वाणी और मन से श्रवण-प्राप्त (आपके संदेश) के प्रति समर्पित — हे अजित! ऐसे भक्त तीनों लोकों में आप जितों को भी जीत लेते हैं।

श्लोक 4

श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम्

śreyaḥ-sṛtiṃ bhaktim udasya te vibho kliśyanti ye kevala-bodha-labdhaye | teṣām asau kleśala eva śiṣyate nānyad yathā sthūla-tuṣāvaghātinām || 4 ||

अर्थ:हे विभो! जो लोग श्रेय के मार्ग भक्ति को छोड़कर केवल निर्विशेष ज्ञान की प्राप्ति के लिए क्लेश उठाते हैं, उन्हें केवल क्लेश ही शेष रहता है — जैसे खाली भूसी कूटने वालों को परिश्रम के सिवा कुछ नहीं मिलता।

श्लोक 5

पुरेह भूमन्बहवोऽपि योगिन- स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम्

pureha bhūman bahavo 'pi yoginas tvad-arpitehā nija-karma-labdhayā | vibudhya bhaktyaiva kathopanītayā prapedire 'ñjo 'cyuta te gatiṃ parām || 5 ||

अर्थ:हे भूमन्! इस लोक में पूर्व में अनेक योगी, अपने कर्मों से प्राप्त साधनों द्वारा आप में चेष्टा अर्पित करके और कथा-श्रवण से उत्पन्न भक्ति द्वारा ही प्रबुद्ध होकर, हे अच्युत! सहज ही आपकी परम गति को प्राप्त हुए।

श्लोक 6

तथापि भूमन्महिमागुणस्य ते विबोद्धुमर्हत्यमलान्तरात्मभिः अविक्रियात्स्वानुभवादरूपतो ह्यनन्यबोध्यात्मतया चान्यथा

tathāpi bhūman mahimāguṇasya te viboddhum arhaty amalāntar-ātmabhiḥ | avikriyāt svānubhavād arūpato hy ananya-bodhyātmatayā na cānyathā || 6 ||

अर्थ:फिर भी, हे भूमन्! दिव्य गुणों वाले आपकी महिमा को निर्मल अन्तःकरण वाले ही जान सकते हैं — अपने निर्विकार, अरूप, आत्मानुभव द्वारा, जिसमें केवल आप ही ज्ञेय हैं — और किसी अन्य प्रकार से नहीं।

श्लोक 7

गुणात्मनस्तेऽपि गुणान्विमातुं हितावतीर्णस्य ईशिरेऽस्य कालेन यैर्वा विमिताः सुकल्पैर् भूपांशवः खे मिहिका द्युभासः

guṇātmanas te 'pi guṇān vimātuṃ hitāvatīrṇasya ka īśire 'sya | kālena yair vā vimitāḥ su-kalpair bhū-pāṃśavaḥ khe mihikā dyu-bhāsaḥ || 7 ||

अर्थ:समस्त गुणों के स्वामी होते हुए भी जो जगत् के कल्याण हेतु अवतीर्ण हुए, उन आपके गुणों को मापने में कौन समर्थ है? कोई समर्थ पुरुष काल के द्वारा पृथ्वी के परमाणुओं, आकाश के हिमकणों, अथवा नक्षत्रों के प्रकाश-कणों को भले गिन ले, पर आपकी महिमा को नहीं।

श्लोक 8

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे दायभाक्

tat te 'nukampāṃ su-samīkṣamāṇo bhuñjāna evātma-kṛtaṃ vipākam | hṛd-vāg-vapurbhir vidadhan namas te jīveta yo mukti-pade sa dāya-bhāk || 8 ||

अर्थ:जो मनुष्य आपकी कृपा की भलीभाँति प्रतीक्षा करते हुए, अपने ही पूर्वकृत कर्मों के फल को धैर्यपूर्वक भोगता हुआ, हृदय, वाणी और शरीर से आपको नमस्कार करते हुए जीवन बिताता है — वही मुक्तिपद का सच्चा अधिकारी (उत्तराधिकारी) है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

श्रीब्रह्मोवाच🔊śrī-brahmovācaश्रीब्रह्मा ने कहा
नौमि ईड्य ते🔊naumi īḍya teमैं आपकी स्तुति करता हूँ, हे वन्दनीय
अभ्रवपुषे🔊abhra-vapuṣeजिनका शरीर वर्षा-मेघ के समान श्याम है, उन्हें
तडिदम्बराय🔊taḍid-ambarāyaजिनका वस्त्र बिजली के समान देदीप्यमान है
गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय🔊guñjāvataṃsa-paripiccha-lasan-mukhāyaजिनका मुख गुञ्जा के कुण्डलों और मयूरपिच्छ से सुशोभित है
वन्यस्रजे🔊vanya-srajeवन-पुष्पों की माला धारण किए हुए
कवलवेत्रविषाणवेणु🔊kavala-vetra-viṣāṇa-veṇuकौर (ग्रास), छड़ी, सींग का बिगुल और वेणु
मृदुपदे पशुपाङ्गजाय🔊mṛdu-pade paśupāṅgajāyaकोमल चरणों वाले, गोपराज (नन्द) के पुत्र को
स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य🔊svecchā-mayasya na tu bhūta-mayasya(यह शरीर) आपकी अपनी इच्छा से बना, भौतिक तत्त्वों से नहीं
आत्मसुखानुभूतेः🔊ātma-sukhānubhūteḥआपके आत्मसुख के अनुभव का
ज्ञाने प्रयासमुदपास्य🔊jñāne prayāsam udapāsyaज्ञान का (शुष्क) प्रयास त्यागकर
नमन्त एव🔊namanta evaकेवल नमस्कार करते हुए
सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्🔊san-mukharitāṃ bhavadīya-vārtāmसन्तों द्वारा गाई गई आपकी कथाओं को सुनकर जीते हैं
स्थाने स्थिताः🔊sthāne sthitāḥअपनी-अपनी स्थिति (दशा) में रहते हुए
अजित जितोऽप्यसि🔊ajita jito 'py asiहे अजित! आप (फिर भी) जीत लिए जाते हैं (ऐसे भक्तों द्वारा)
श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य🔊śreyaḥ-sṛtiṃ bhaktim udasyaश्रेय के मार्ग भक्ति को त्यागकर
केवलबोधलब्धये🔊kevala-bodha-labdhayeकेवल निर्विशेष (निराकार) ज्ञान की प्राप्ति के लिए
क्लेशल एव शिष्यते🔊kleśala eva śiṣyateकेवल क्लेश ही उनके फलस्वरूप शेष रहता है
स्थूलतुषावघातिनाम्🔊sthūla-tuṣāvaghātināmजैसे खाली भूसी कूटने वालों को (कुछ नहीं मिलता)
भूमन्🔊bhūmanहे सर्वव्यापी, अनन्त प्रभो
गुणात्मनः🔊guṇātmanaḥगुणों के स्वामी / दिव्य गुणों वाले आपका
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणः🔊tat te 'nukampāṃ su-samīkṣamāṇaḥआपकी कृपा की भलीभाँति प्रतीक्षा करते हुए
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्🔊bhuñjāna evātma-kṛtaṃ vipākamअपने ही पूर्वकृत कर्मों के फल को धैर्यपूर्वक भोगते हुए
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते🔊hṛd-vāg-vapurbhir vidadhan namas teहृदय, वाणी और शरीर से आपको नमस्कार करते हुए
मुक्तिपदे स दायभाक्🔊mukti-pade sa dāya-bhākवह मुक्तिपद का सच्चा अधिकारी (उत्तराधिकारी) है

ब्रह्म स्तुति पाठ के लाभ

शुष्क तर्क-ज्ञान और कठिन योग की अपेक्षा प्रेमाभक्ति की श्रेष्ठता का गुणगान करती है।

तीसरा श्लोक ('ज्ञाने प्रयासमुदपास्य') एक आधारभूत शिक्षा है: समर्पण और भगवान् की महिमा का श्रवण अजेय भगवान् को भी जीत लेता है।

आठवाँ श्लोक ('तत्तेऽनुकम्पां') मुक्ति का सूत्र देता है — भगवान् की कृपा की प्रतीक्षा करते हुए कर्मफल का धैर्यपूर्वक सहन।

वेणु, मयूरपिच्छ और वन-माला से युक्त श्रीकृष्ण के मनोहर गोप-रूप पर प्रेमपूर्ण ध्यान को गहरा करती है।

विनम्रता को विकसित करती है, यह सिखाते हुए कि भगवान् का दिव्य रूप एवं गुण समस्त माप से परे हैं।

भागवत से पठित होने के कारण, यह हृदय को शुद्ध करने और पाठकर्ता में शुद्ध भक्ति जगाने वाली मानी जाती है।

ब्रह्म स्तुति जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः अथवा सायं; श्रीमद्भागवत के अध्ययन के समय, एकादशी एवं जन्माष्टमी पर

श्रीकृष्ण की मूर्ति के सम्मुख श्लोकों का धीरे-धीरे पाठ करें, भगवान् के मधुर गोप-रूप पर ब्रह्मा के विस्मय और इस स्वीकारोक्ति का चिन्तन करते हुए कि केवल भक्ति ही परमेश्वर को प्रकट करती है। विशेषतः तीसरे श्लोक पर, जो श्रवण एवं समर्पण के मार्ग का गुणगान करता है, और आठवें श्लोक पर, जो भगवान् की कृपा की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की प्रार्थना है, मन को टिकाएँ। विनम्रता सहित, प्रेमपूर्ण समर्पण की भावना से जप करें, जैसे स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने बालक श्रीकृष्ण के सम्मुख किया था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ब्रह्म स्तुति भगवान् ब्रह्मा द्वारा वृन्दावन में भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित प्रार्थना है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कन्ध 10, अध्याय 14) में मिलती है। यह प्रविष्टि इसके प्रसिद्ध आरम्भिक श्लोकों (10.14.1 से 8) को प्रस्तुत करती है, जो 'नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे' से आरम्भ होते हैं और श्रीकृष्ण के सौन्दर्य तथा भक्ति के परम मार्ग का गुणगान करते हैं।
यह परखने के लिए कि वह ग्वालबाल सचमुच परमेश्वर है या नहीं, ब्रह्मा ने श्रीकृष्ण के बछड़ों और सखाओं का अपहरण करके उन्हें छिपा दिया। श्रीकृष्ण ने एक पूरे वर्ष तक स्वयं को उन सबके हूबहू रूपों में विस्तारित कर लिया। जब ब्रह्मा ने अपनी भूल जानी और भगवान् की शक्ति देखी, तब वे श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और यह विनम्र स्तुति अर्पित की।
यह सिखाता है कि जो व्यक्ति मानसिक तर्क के परिश्रम को त्यागकर केवल नमस्कार करता है, सन्तों से श्रीकृष्ण की महिमा सुनकर जीता है, और शरीर, मन व वाणी से समर्पित रहता है — ऐसा भक्त अपनी स्थिति में रहते हुए भी अजेय भगवान् को जीत लेता है। यह भक्तिमय श्रवण (श्रवण) एवं समर्पण की श्रेष्ठता पर एक मूलभूत श्लोक है।
यह घोषणा करता है कि जो व्यक्ति अपने ही पूर्वकर्मों के फल को भगवान् की व्यवस्था मानकर धैर्यपूर्वक सहता है, और साथ ही हृदय, वाणी व शरीर से नमस्कार करते हुए उनकी कृपा की उत्कट प्रतीक्षा करता है, वह मुक्ति का सच्चा अधिकारी (दायभाक्) बन जाता है। यह समस्त वैष्णव साहित्य में समर्पण पर सर्वाधिक प्रिय श्लोकों में से एक है।

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