बृहस्पतिकवचम् PDF
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अस्य श्रीबृहस्पतिकवचस्तोत्रमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, गुरुर्देवता, गं बीजं, श्रीशक्तिः, क्लीं कीलकं, गुरुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥
|| śrīgaṇeśāya namaḥ || asya śrībṛhaspatikavacastotramantrasya īśvara ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, gururdevatā, gaṃ bījaṃ, śrīśaktiḥ, klīṃ kīlakaṃ, guruprītyarthaṃ jape viniyogaḥ ||
श्रीगणेश को नमस्कार। इस बृहस्पतिकवच स्तोत्र मन्त्र के ऋषि ईश्वर हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता गुरु (बृहस्पति) हैं, 'गं' बीज है, श्री शक्ति है, 'क्लीं' कीलक है; गुरु की प्रसन्नता के लिए इसका जप किया जाता है।
अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् । अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ १॥
abhīṣṭaphaladaṃ devaṃ sarvajñaṃ surapūjitam | akṣamālādharaṃ śāntaṃ praṇamāmi bṛhaspatim || 1||
मैं बृहस्पति को प्रणाम करता हूँ — जो समस्त अभीष्ट फल देने वाले देव, सर्वज्ञ, देवों से पूजित, अक्षमालाधारी एवं शान्त हैं।
बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः । कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ २॥
bṛhaspatiḥ śiraḥ pātu lalāṭaṃ pātu me guruḥ | karṇau suraguruḥ pātu netre me'bhīṣṭadāyakaḥ || 2||
बृहस्पति मेरे शिर की रक्षा करें, गुरु ललाट की; सुरगुरु मेरे कानों की रक्षा करें, अभीष्टदायक नेत्रों की।
जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः । मुखं मे पातु सर्वज्ञः कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ ३॥
jihvāṃ pātu surācāryo nāsāṃ me vedapāragaḥ | mukhaṃ me pātu sarvajñaḥ kaṇṭhaṃ me devatāguruḥ || 3||
सुराचार्य मेरी जिह्वा की रक्षा करें, वेदपारग मेरी नासिका की; सर्वज्ञ मेरे मुख की रक्षा करें, देवतागुरु मेरे कण्ठ की।
भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः । स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ ४॥
bhujāvāṅgirasaḥ pātu karau pātu śubhapradaḥ | stanau me pātu vāgīśaḥ kukṣiṃ me śubhalakṣaṇaḥ || 4||
आङ्गिरस मेरी भुजाओं की रक्षा करें, शुभप्रद हाथों की; वागीश मेरे वक्ष की रक्षा करें, शुभलक्षण मेरी कुक्षि की।
नाभिं देवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः । कटिं पातु जगद्वन्द्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ ५॥
nābhiṃ devaguruḥ pātu madhyaṃ pātu sukhapradaḥ | kaṭiṃ pātu jagadvandya ūrū me pātu vākpatiḥ || 5||
देवगुरु मेरी नाभि की रक्षा करें, सुखप्रद मेरे मध्य की; जगद्वन्द्य मेरी कटि की रक्षा करें, वाक्पति मेरी ऊरुओं की।
जानुजङ्घे सुराचार्यः पादौ विश्वात्मकस्तथा । अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ ६॥
jānujaṅghe surācāryaḥ pādau viśvātmakastathā | anyāni yāni cāṅgāni rakṣenme sarvato guruḥ || 6||
सुराचार्य मेरे जानु एवं जङ्घाओं की रक्षा करें, विश्वात्मक मेरे पादों की; गुरु सब ओर से मेरे अन्य समस्त अङ्गों की रक्षा करें।
इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥
ityetatkavacaṃ divyaṃ trisandhyaṃ yaḥ paṭhennaraḥ | sarvānkāmānavāpnoti sarvatra vijayī bhavet || 7||
जो मनुष्य इस दिव्य कवच का त्रिसन्ध्या (प्रातः, मध्याह्न एवं सायं) पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और सर्वत्र विजयी होता है।
॥ इति श्रीब्रह्मयामलोक्तं बृहस्पतिकवचं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrībrahmayāmaloktaṃ bṛhaspatikavacaṃ sampūrṇam ||
इस प्रकार ब्रह्मयामल में कथित बृहस्पतिकवच सम्पूर्ण हुआ।