बृहस्पतिकवचम्
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✦ अर्थ
बृहस्पतिकवचम् बृहस्पति — ग्रह बृहस्पति (गुरु) एवं देवगुरु — की रक्षात्मक कवच-स्तुति है, जो ब्रह्मयामल से ली गई है और जिसके ऋषि ईश्वर हैं। अभीष्टदायक, सर्वज्ञ, अक्षमालाधारी देवगुरु बृहस्पति को प्रणाम कर यह उन्हें उनके अनेक नामों (सुराचार्य, वागीश, आङ्गिरस, देवगुरु) से भक्त के शिर से पाद तक रक्षा हेतु आमन्त्रित करता है। इसका अन्तिम श्लोक वचन देता है कि जो इसका त्रिसन्ध्या पाठ करता है, वह समस्त कामनाएँ प्राप्त कर सर्वत्र विजयी होता है।
उत्पत्ति और कथा
Brahma Yamala (Brihaspati Kavacha Stotram) · Traditional; rishi Ishvara · Tantric / Puranic
बृहस्पतिकवचम् ब्रह्मयामल में सुरक्षित है, जिसमें ईश्वर इसके ऋषि एवं 'गं' बीजमन्त्र के रूप में नामित हैं। यह बृहस्पति का चित्रण करता है — शान्त, अक्षमालाधारी, ऋषि अङ्गिरा के पुत्र, जो देवताओं के गुरु एवं आचार्य, वेदों के पारंगत तथा वाणी के स्वामी हैं — और इस महाशुभ ग्रह से भक्त की अंग-प्रत्यंग रक्षा की प्रार्थना करता है। बृहस्पति के कवच-स्तोत्र के रूप में यह ग्रह-शान्ति हेतु पाठ की जाने वाली नवग्रह कवचों में आता है, और विशेषकर बुद्धि, समृद्धि एवं धर्ममय कामनाओं की पूर्ति हेतु इसका आश्रय लिया जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कवच का अन्तिम श्लोक वचन देता है कि जो इस दिव्य कवच का दिन की तीनों सन्ध्याओं में पाठ करता है वह 'सर्वान्कामानवाप्नोति' — समस्त कामनाएँ प्राप्त करता है — और सर्वत्र विजयी होता है; विद्यार्थी एवं साधक गुरुवार को इसका पाठ कर देवगुरु से बुद्धि, वाक्-वैभव एवं सौभाग्य की कृपा प्राप्त करते हैं।
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अस्य श्रीबृहस्पतिकवचस्तोत्रमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, गुरुर्देवता, गं बीजं, श्रीशक्तिः, क्लीं कीलकं, गुरुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ॥
|| śrīgaṇeśāya namaḥ || asya śrībṛhaspatikavacastotramantrasya īśvara ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, gururdevatā, gaṃ bījaṃ, śrīśaktiḥ, klīṃ kīlakaṃ, guruprītyarthaṃ jape viniyogaḥ ||
अर्थ:श्रीगणेश को नमस्कार। इस बृहस्पतिकवच स्तोत्र मन्त्र के ऋषि ईश्वर हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता गुरु (बृहस्पति) हैं, 'गं' बीज है, श्री शक्ति है, 'क्लीं' कीलक है; गुरु की प्रसन्नता के लिए इसका जप किया जाता है।
अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् । अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ १॥
abhīṣṭaphaladaṃ devaṃ sarvajñaṃ surapūjitam | akṣamālādharaṃ śāntaṃ praṇamāmi bṛhaspatim || 1||
अर्थ:मैं बृहस्पति को प्रणाम करता हूँ — जो समस्त अभीष्ट फल देने वाले देव, सर्वज्ञ, देवों से पूजित, अक्षमालाधारी एवं शान्त हैं।
बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः । कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ २॥
bṛhaspatiḥ śiraḥ pātu lalāṭaṃ pātu me guruḥ | karṇau suraguruḥ pātu netre me'bhīṣṭadāyakaḥ || 2||
अर्थ:बृहस्पति मेरे शिर की रक्षा करें, गुरु ललाट की; सुरगुरु मेरे कानों की रक्षा करें, अभीष्टदायक नेत्रों की।
जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः । मुखं मे पातु सर्वज्ञः कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ ३॥
jihvāṃ pātu surācāryo nāsāṃ me vedapāragaḥ | mukhaṃ me pātu sarvajñaḥ kaṇṭhaṃ me devatāguruḥ || 3||
अर्थ:सुराचार्य मेरी जिह्वा की रक्षा करें, वेदपारग मेरी नासिका की; सर्वज्ञ मेरे मुख की रक्षा करें, देवतागुरु मेरे कण्ठ की।
भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः । स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ ४॥
bhujāvāṅgirasaḥ pātu karau pātu śubhapradaḥ | stanau me pātu vāgīśaḥ kukṣiṃ me śubhalakṣaṇaḥ || 4||
अर्थ:आङ्गिरस मेरी भुजाओं की रक्षा करें, शुभप्रद हाथों की; वागीश मेरे वक्ष की रक्षा करें, शुभलक्षण मेरी कुक्षि की।
नाभिं देवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः । कटिं पातु जगद्वन्द्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ ५॥
nābhiṃ devaguruḥ pātu madhyaṃ pātu sukhapradaḥ | kaṭiṃ pātu jagadvandya ūrū me pātu vākpatiḥ || 5||
अर्थ:देवगुरु मेरी नाभि की रक्षा करें, सुखप्रद मेरे मध्य की; जगद्वन्द्य मेरी कटि की रक्षा करें, वाक्पति मेरी ऊरुओं की।
जानुजङ्घे सुराचार्यः पादौ विश्वात्मकस्तथा । अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ ६॥
jānujaṅghe surācāryaḥ pādau viśvātmakastathā | anyāni yāni cāṅgāni rakṣenme sarvato guruḥ || 6||
अर्थ:सुराचार्य मेरे जानु एवं जङ्घाओं की रक्षा करें, विश्वात्मक मेरे पादों की; गुरु सब ओर से मेरे अन्य समस्त अङ्गों की रक्षा करें।
इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥
ityetatkavacaṃ divyaṃ trisandhyaṃ yaḥ paṭhennaraḥ | sarvānkāmānavāpnoti sarvatra vijayī bhavet || 7||
अर्थ:जो मनुष्य इस दिव्य कवच का त्रिसन्ध्या (प्रातः, मध्याह्न एवं सायं) पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और सर्वत्र विजयी होता है।
॥ इति श्रीब्रह्मयामलोक्तं बृहस्पतिकवचं सम्पूर्णम् ॥
|| iti śrībrahmayāmaloktaṃ bṛhaspatikavacaṃ sampūrṇam ||
अर्थ:इस प्रकार ब्रह्मयामल में कथित बृहस्पतिकवच सम्पूर्ण हुआ।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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बृहस्पतिकवचम् पाठ के लाभ
अंग-प्रत्यंग की 'कवच' (रक्षा) जो शिर से पाद तक सम्पूर्ण शरीर पर देवगुरु बृहस्पति की रक्षा का आह्वान करती है।
बुद्धि, ज्ञान, सन्तान, धन एवं धर्म के स्वामी महाशुभ ग्रह बृहस्पति के दुर्बल या पीड़ित होने पर उसे बल देने हेतु पाठ की जाती है।
इसका फलश्रुति वचन देता है कि जो इसका त्रिसन्ध्या (दिन में तीन बार) पाठ करता है, वह समस्त कामनाएँ प्राप्त कर सर्वत्र विजयी होता है।
विद्या, वाक्-वैभव (वागीश) एवं बुद्धि की स्पष्टता के लिए विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं साधकों द्वारा विशेष रूप से मूल्यवान।
समृद्धि, सन्तान, वैवाहिक सुख एवं उन आशीर्वादों हेतु पाठ की जाती है जो सर्वाधिक शुभ ग्रह बृहस्पति प्रदान करते हैं।
गुरुवार (बृहस्पति का वार) तथा बृहस्पति या नवग्रह पूजा के समय पाठ की जाती है।
बृहस्पतिकवचम् जप विधि
स्नान कर बृहस्पति (या नवग्रह) की प्रतिमा के सम्मुख पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर बैठें, पीले फूल, पीला चन्दन एवं घी का दीपक रखें; चना दाल, हल्दी या केले का भोग बृहस्पति को उपयुक्त है। पहले 'गं' बीज सहित विनियोग, फिर ध्यान श्लोक, फिर प्रत्येक अंग की रक्षा करने वाले कवच-श्लोक, और अन्त में फलश्रुति पढ़ें। श्लोक त्रिसन्ध्या (दिन में तीन बार) पाठ की सलाह देता है; यह गुरुवार को तथा दुर्बल बृहस्पति को बल देने हेतु सर्वाधिक शुभ है।