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देवकी स्तुति PDF

देवकी स्तुति की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

श्रीदेवक्युवाच रूपं यत्तत्प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद्विष्णुरध्यात्मदीपः ॥ २४ ॥

śrī-devaky uvāca rūpaṃ yat tat prāhur avyaktam ādyaṃ brahma jyotir nirguṇaṃ nirvikāram | sattā-mātraṃ nirviśeṣaṃ nirīhaṃ sa tvaṃ sākṣād viṣṇur adhyātma-dīpaḥ || 24 ||

श्रीदेवकी ने कहा — वेद जिस रूप को अव्यक्त, आदि, निर्गुण, निर्विकार ब्रह्मज्योति कहते हैं, जो केवल सत्तामात्र, निर्विशेष और निरीह है — वही आप साक्षात् भगवान् विष्णु हैं, अध्यात्म-ज्ञान के दीपक।

नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यतेऽशेषसंज्ञः ॥ २५ ॥

naṣṭe loke dvi-parārdhāvasāne mahā-bhūteṣv ādi-bhūtaṃ gateṣu | vyakte 'vyaktaṃ kāla-vegena yāte bhavān ekaḥ śiṣyate 'śeṣa-saṃjñaḥ || 25 ||

ब्रह्मा के दो परार्ध (आयु) के अन्त में जब लोक नष्ट हो जाते हैं, महाभूत आदि प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और व्यक्त जगत् कालवेग से अव्यक्त में चला जाता है — तब केवल आप ही अशेष संज्ञा वाले (अनन्त) शेष रह जाते हैं।

योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् । निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां- स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २६ ॥

yo 'yaṃ kālas tasya te 'vyakta-bandho ceṣṭām āhuś ceṣṭate yena viśvam | nimeṣādir vatsarānto mahīyāṃs taṃ tveśānaṃ kṣema-dhāma prapadye || 26 ||

यह जो काल है, जिसे विद्वान् आपकी चेष्टा कहते हैं और जिससे सम्पूर्ण विश्व चेष्टा करता है, जो निमेष से लेकर वर्ष-पर्यन्त और उससे भी महान् है — हे अव्यक्तबन्धो! उस ईशान, क्षेम के धाम आपकी मैं शरण ग्रहण करती हूँ।

मर्त्यो मृत्युव्यालभीतः पलायन् लोकान् सर्वान्निर्भयं नाध्यगच्छत् । त्वत्पादाब्जं प्राप्य यदृच्छयाद्य सुस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति ॥ २७ ॥

martyo mṛtyu-vyāla-bhītaḥ palāyan lokān sarvān nirbhayaṃ nādhyagacchat | tvat pādābjaṃ prāpya yadṛcchayādya susthaḥ śete mṛtyur asmād apaiti || 27 ||

मृत्युरूपी सर्प से भयभीत होकर भागता हुआ मनुष्य समस्त लोकों में कहीं भी निर्भयता नहीं पाता; किन्तु जो दैववश आपके चरणकमलों को प्राप्त कर लेता है, वह सुखपूर्वक शयन करता है और मृत्यु उससे दूर भाग जाती है।

स त्वं घोरादुग्रसेनात्मजान्न- स्त्राहि त्रस्तान् भृत्यवित्रासहासि । रूपं चेदं पौरुषं ध्यानधिष्ण्यं मा प्रत्यक्षं मांसदृशां कृषीष्ठाः ॥ २८ ॥

sa tvaṃ ghorād ugrasenātmajān nas trāhi trastān bhṛtya-vitrāsa-hāsi | rūpaṃ cedaṃ pauruṣaṃ dhyāna-dhiṣṇyaṃ mā pratyakṣaṃ māṃsa-dṛśāṃ kṛṣīṣṭhāḥ || 28 ||

इसलिए, हे भक्तों का भय हरने वाले! उग्रसेन के पुत्र (कंस) से भयभीत हम लोगों की उस घोर भय से रक्षा कीजिए। और ध्यान का आश्रय यह आपका चतुर्भुज दिव्य रूप मांसमय नेत्रों वाले साधारण लोगों के समक्ष प्रत्यक्ष न कीजिए।

जन्म ते मय्यसौ पापो मा विद्यान्मधुसूदन । समुद्विजे भवद्धेतोः कंसादहमधीरधीः ॥ २९ ॥

janma te mayy asau pāpo mā vidyān madhusūdana | samudvije bhavad-dhetoḥ kaṃsād aham adhīra-dhīḥ || 29 ||

हे मधुसूदन! वह पापी कंस यह न जान पाए कि मुझसे आपका जन्म हुआ है। आपके प्रकट होने के कारण मैं धैर्यहीन होकर कंस से अत्यन्त भयभीत हो रही हूँ।

उपसंहर विश्वात्म- न्नदो रूपमलौकिकम् । शङ्खचक्रगदापद्म- श्रिया जुष्टं चतुर्भुजम् ॥ ३० ॥

upasaṃhara viśvātmann ado rūpam alaukikam | śaṅkha-cakra-gadā-padma- śriyā juṣṭaṃ catur-bhujam || 30 ||

हे विश्वात्मन्! शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म की शोभा से युक्त इस अलौकिक चतुर्भुज रूप को समेट लीजिए।

विश्वं यदेतत्स्वतनौ निशान्ते यथावकाशं पुरुषः परो भवान् । बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू- दहो नृलोकस्य विडम्बनं हि तत् ॥ ३१ ॥

viśvaṃ yad etat sva-tanau niśānte yathāvakāśaṃ puruṣaḥ paro bhavān | bibharti so 'yaṃ mama garbhago 'bhūd aho nṛ-lokasya viḍambanaṃ hi tat || 31 ||

प्रलय के समय यह सम्पूर्ण विश्व जिन परमपुरुष आप के शरीर में यथास्थान समाया रहता है, वही आप मेरे गर्भ में आ गए — अहो! यह तो आपका मनुष्यलोक के व्यवहार का अनुकरणमात्र है।