देवकी स्तुति
अन्य नाम / खोज: devaki stuti · rupam yat tat prahur avyaktam adyam · devaki krita bhagavat stuti · prayers of devaki · devaki stotram bhagavatam
अपनी भाषा/लिपि में पढ़ें
✦ अर्थ
देवकी स्तुति माता देवकी द्वारा नवजात भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित प्रार्थना है, जो कंस के कारागार में उनके समक्ष चतुर्भुज विष्णुरूप में प्रकट हुए — यह श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध (अध्याय 3) में वर्णित है। इन आठ श्लोकों में वे अपने पुत्र को उस अव्यक्त परब्रह्म रूप में पहचानती हैं जो प्रलय के पश्चात भी एकमात्र शेष रहते हैं, सर्वग्रासी काल के स्वामी हैं और मृत्यु से शरण देने वाले हैं। अत्याचारी कंस के भय से व्याकुल होकर वे प्रेमपूर्वक भगवान् से प्रार्थना करती हैं कि वे अपना दिव्य ऐश्वर्यमय रूप समेटकर एक साधारण शिशु के रूप में प्रकट हों।
उत्पत्ति और कथा
Srimad Bhagavata Purana, Canto 10, Chapter 3, verses 24–31 (Devaki-stuti) · Sage Veda-Vyasa (as spoken by Devaki) · Classical Puranic era
अपने अवतरण की उस अन्धकारमयी रात्रि में भगवान् श्रीकृष्ण मथुरा के कारागार में एक साधारण शिशु के रूप में नहीं, अपितु शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए तेजस्वी चतुर्भुज विष्णु के रूप में प्रकट हुए, और उस कोठरी के अन्धकार को दूर कर दिया जहाँ उनके माता-पिता वसुदेव और देवकी बँधे हुए थे। पहले वसुदेव ने और फिर देवकी ने विस्मय एवं पहचान की प्रार्थनाएँ अर्पित कीं। देवकी ने अपने पुत्र को समस्त कारणों के परम कारण के रूप में देखकर, उन्हें सृष्टि और प्रलय से परे सनातन ब्रह्म कहकर स्तुति की — किन्तु एक माता के हत्यारे कंस के भय से ग्रस्त होकर, उन्होंने प्रार्थना की कि वे अपना दिव्य ऐश्वर्य समेटकर एक असहाय शिशु का रूप धारण कर लें, ताकि उन्हें सुरक्षित गोकुल पहुँचाया जा सके।
✦ शास्त्रों में वर्णित
जब भगवान् अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, तब उनके माता-पिता की लोहे की बेड़ियाँ गिर पड़ीं और कारागार के द्वार स्वतः ही खुल गए कहे जाते हैं। देवकी की प्रार्थना के उत्तर में भगवान् तत्क्षण एक साधारण नवजात शिशु में बदल गए, जिससे वसुदेव उन्हें बाढ़ग्रस्त यमुना के पार सुरक्षित गोकुल ले जा सके — नदी स्वयं मार्ग देती गई और शेषनाग ने शिशु को वर्षा से बचाया।
सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें
श्रीदेवक्युवाच रूपं यत्तत्प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद्विष्णुरध्यात्मदीपः ॥ २४ ॥
śrī-devaky uvāca rūpaṃ yat tat prāhur avyaktam ādyaṃ brahma jyotir nirguṇaṃ nirvikāram | sattā-mātraṃ nirviśeṣaṃ nirīhaṃ sa tvaṃ sākṣād viṣṇur adhyātma-dīpaḥ || 24 ||
अर्थ:श्रीदेवकी ने कहा — वेद जिस रूप को अव्यक्त, आदि, निर्गुण, निर्विकार ब्रह्मज्योति कहते हैं, जो केवल सत्तामात्र, निर्विशेष और निरीह है — वही आप साक्षात् भगवान् विष्णु हैं, अध्यात्म-ज्ञान के दीपक।
नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यतेऽशेषसंज्ञः ॥ २५ ॥
naṣṭe loke dvi-parārdhāvasāne mahā-bhūteṣv ādi-bhūtaṃ gateṣu | vyakte 'vyaktaṃ kāla-vegena yāte bhavān ekaḥ śiṣyate 'śeṣa-saṃjñaḥ || 25 ||
अर्थ:ब्रह्मा के दो परार्ध (आयु) के अन्त में जब लोक नष्ट हो जाते हैं, महाभूत आदि प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और व्यक्त जगत् कालवेग से अव्यक्त में चला जाता है — तब केवल आप ही अशेष संज्ञा वाले (अनन्त) शेष रह जाते हैं।
योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् । निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां- स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २६ ॥
yo 'yaṃ kālas tasya te 'vyakta-bandho ceṣṭām āhuś ceṣṭate yena viśvam | nimeṣādir vatsarānto mahīyāṃs taṃ tveśānaṃ kṣema-dhāma prapadye || 26 ||
अर्थ:यह जो काल है, जिसे विद्वान् आपकी चेष्टा कहते हैं और जिससे सम्पूर्ण विश्व चेष्टा करता है, जो निमेष से लेकर वर्ष-पर्यन्त और उससे भी महान् है — हे अव्यक्तबन्धो! उस ईशान, क्षेम के धाम आपकी मैं शरण ग्रहण करती हूँ।
मर्त्यो मृत्युव्यालभीतः पलायन् लोकान् सर्वान्निर्भयं नाध्यगच्छत् । त्वत्पादाब्जं प्राप्य यदृच्छयाद्य सुस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति ॥ २७ ॥
martyo mṛtyu-vyāla-bhītaḥ palāyan lokān sarvān nirbhayaṃ nādhyagacchat | tvat pādābjaṃ prāpya yadṛcchayādya susthaḥ śete mṛtyur asmād apaiti || 27 ||
अर्थ:मृत्युरूपी सर्प से भयभीत होकर भागता हुआ मनुष्य समस्त लोकों में कहीं भी निर्भयता नहीं पाता; किन्तु जो दैववश आपके चरणकमलों को प्राप्त कर लेता है, वह सुखपूर्वक शयन करता है और मृत्यु उससे दूर भाग जाती है।
स त्वं घोरादुग्रसेनात्मजान्न- स्त्राहि त्रस्तान् भृत्यवित्रासहासि । रूपं चेदं पौरुषं ध्यानधिष्ण्यं मा प्रत्यक्षं मांसदृशां कृषीष्ठाः ॥ २८ ॥
sa tvaṃ ghorād ugrasenātmajān nas trāhi trastān bhṛtya-vitrāsa-hāsi | rūpaṃ cedaṃ pauruṣaṃ dhyāna-dhiṣṇyaṃ mā pratyakṣaṃ māṃsa-dṛśāṃ kṛṣīṣṭhāḥ || 28 ||
अर्थ:इसलिए, हे भक्तों का भय हरने वाले! उग्रसेन के पुत्र (कंस) से भयभीत हम लोगों की उस घोर भय से रक्षा कीजिए। और ध्यान का आश्रय यह आपका चतुर्भुज दिव्य रूप मांसमय नेत्रों वाले साधारण लोगों के समक्ष प्रत्यक्ष न कीजिए।
जन्म ते मय्यसौ पापो मा विद्यान्मधुसूदन । समुद्विजे भवद्धेतोः कंसादहमधीरधीः ॥ २९ ॥
janma te mayy asau pāpo mā vidyān madhusūdana | samudvije bhavad-dhetoḥ kaṃsād aham adhīra-dhīḥ || 29 ||
अर्थ:हे मधुसूदन! वह पापी कंस यह न जान पाए कि मुझसे आपका जन्म हुआ है। आपके प्रकट होने के कारण मैं धैर्यहीन होकर कंस से अत्यन्त भयभीत हो रही हूँ।
उपसंहर विश्वात्म- न्नदो रूपमलौकिकम् । शङ्खचक्रगदापद्म- श्रिया जुष्टं चतुर्भुजम् ॥ ३० ॥
upasaṃhara viśvātmann ado rūpam alaukikam | śaṅkha-cakra-gadā-padma- śriyā juṣṭaṃ catur-bhujam || 30 ||
अर्थ:हे विश्वात्मन्! शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म की शोभा से युक्त इस अलौकिक चतुर्भुज रूप को समेट लीजिए।
विश्वं यदेतत्स्वतनौ निशान्ते यथावकाशं पुरुषः परो भवान् । बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू- दहो नृलोकस्य विडम्बनं हि तत् ॥ ३१ ॥
viśvaṃ yad etat sva-tanau niśānte yathāvakāśaṃ puruṣaḥ paro bhavān | bibharti so 'yaṃ mama garbhago 'bhūd aho nṛ-lokasya viḍambanaṃ hi tat || 31 ||
अर्थ:प्रलय के समय यह सम्पूर्ण विश्व जिन परमपुरुष आप के शरीर में यथास्थान समाया रहता है, वही आप मेरे गर्भ में आ गए — अहो! यह तो आपका मनुष्यलोक के व्यवहार का अनुकरणमात्र है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें
देवकी स्तुति पाठ के लाभ
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति, प्रलय के पश्चात भी एकमात्र शेष रहने वाले परब्रह्म रूप में, भक्ति को गहरा करती है।
एक माता की ईश्वर से प्रार्थना पर आधारित, सन्तान और परिवार की रक्षा के लिए प्रिय प्रार्थना।
विशेषतः जन्माष्टमी पर पठित, जो कारागार में भगवान् के प्राकट्य के पवित्र क्षण को पुनर्जीवित करती है।
सिखाती है कि जो जीव भगवान् के चरणकमलों को प्राप्त कर लेता है वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है (श्लोक 27)।
वात्सल्य भाव को — परम को अपने पुत्र के रूप में प्रेम करना — उनकी महत्ता के प्रति श्रद्धा के साथ विकसित करती है।
भय को दूर करने तथा शरण, शान्ति और भगवान् की रक्षक उपस्थिति का आश्वासन देने वाली मानी जाती है।
देवकी स्तुति जप विधि
बाल श्रीकृष्ण अथवा भगवान् विष्णु की मूर्ति के समक्ष इन आठ श्लोकों का धीरे-धीरे पाठ करें, देवकी के उस विस्मय का चिन्तन करते हुए जब वे अपने शिशु को परमेश्वर के रूप में पहचानती हैं, तथा उनके प्रेमपूर्ण भय का जो उनकी सुरक्षा के लिए था। यह स्तुति जन्माष्टमी की अर्धरात्रि में, भगवान् के जन्म के क्षण को अंकित करते हुए, सर्वाधिक प्रभावशाली होती है। उनकी महत्ता के प्रति श्रद्धा और कोमल वात्सल्य प्रेम के मिश्रित भाव से जप करें, तथा अपनी सन्तान और परिवार की रक्षा की प्रार्थना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ये भी पढ़ें
ॐ
Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides