देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद Meaning — Line by Line
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
Every verse and every word explained in English & Hindi
Meaning — Line by Line
Every verse of देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.
devi prapannārtihare prasīda
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥
devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato'khilasya prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya
Meaningहे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी! प्रसन्न होइए; हे सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होइए; हे विश्वेश्वरी! प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा कीजिए — हे देवी! आप ही चराचर की ईश्वरी हैं।
ādhārabhūtā jagatastvamekā
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत- दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥
ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi apāṃ svarūpasthitayā tvayaita- dāpyāyate kṛtsnamalaṅghyavīrye
Meaningआप ही अकेली जगत् की आधार हैं, क्योंकि आप पृथ्वी के रूप में स्थित हैं; और जल के रूप में स्थित आपसे ही यह सब आप्यायित (पुष्ट) होता है, हे अलंघ्य वीर्य वाली!
tvaṃ vaiṣṇavīśaktiranantavīryā
त्वं वैष्णवीशक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥
tvaṃ vaiṣṇavīśaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ
Meaningआप अनन्त वीर्य वाली वैष्णवी शक्ति हैं; आप विश्व के बीज और परम माया हैं। हे देवी! आपसे ही यह समस्त जगत् मोहित है; और आप ही प्रसन्न होने पर पृथ्वी पर मुक्ति की हेतु बनती हैं।
Word-by-Word Breakdown
Origin & History
Source: Durga Saptashati (Devi Mahatmyam) Chapter 11 — Narayani Stuti, verses 2-4; from the Markandeya Purana
Author: Sage Markandeya (traditional)
Period: Ancient (the Devi Mahatmyam is dated to c. 5th-6th century CE)
देवी माहात्म्य में वर्णित है कि असुर भ्राता शुम्भ और निशुम्भ ने तीनों लोकों को जीतकर देवताओं को निकाल दिया। देवताओं की संयुक्त ऊर्जा से प्रकट होकर देवी ने निशुम्भ, रक्तबीज और अन्ततः स्वयं शुम्भ का वध किया। महान् असुर के गिर जाने पर इन्द्र और देवता — हर्ष से कमल-सदृश खिले मुख वाले — कृतज्ञतापूर्वक नारायणी स्तुति का गान करने लगे, जो 'शरणागतों की पीड़ा हरने वाली' के प्रति इस विनती से आरम्भ होती है।
Frequently Asked Questions
'देवि प्रपन्नार्तिहरे' का क्या अर्थ है?▼
यह प्रार्थना कहाँ से आती है?▼
'प्रसीद' शब्द को बार-बार क्यों दोहराया गया है?▼
क्या इसे स्वतन्त्र रूप से भी पढ़ा जा सकता है?▼
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