देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
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✦ अर्थ
ये श्लोक दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय की प्रसिद्ध नारायणी स्तुति के आरम्भिक श्लोक हैं, जिन्हें शुम्भ-वध के पश्चात् इन्द्र और देवताओं ने गाया। 'देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद' देवी की सर्वाधिक प्रिय प्रार्थनाओं में से एक है, जिसमें शरणागतों की पीड़ा हरने वाली माता से प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा की विनती की जाती है। यह उन्हें पृथ्वी और जल की आधार, अनन्त वैष्णवी शक्ति, विश्व का बीज और मुक्ति की हेतु बताती है।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati (Devi Mahatmyam) Chapter 11 — Narayani Stuti, verses 2-4; from the Markandeya Purana · Sage Markandeya (traditional) · Ancient (the Devi Mahatmyam is dated to c. 5th-6th century CE)
देवी माहात्म्य में वर्णित है कि असुर भ्राता शुम्भ और निशुम्भ ने तीनों लोकों को जीतकर देवताओं को निकाल दिया। देवताओं की संयुक्त ऊर्जा से प्रकट होकर देवी ने निशुम्भ, रक्तबीज और अन्ततः स्वयं शुम्भ का वध किया। महान् असुर के गिर जाने पर इन्द्र और देवता — हर्ष से कमल-सदृश खिले मुख वाले — कृतज्ञतापूर्वक नारायणी स्तुति का गान करने लगे, जो 'शरणागतों की पीड़ा हरने वाली' के प्रति इस विनती से आरम्भ होती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि देवी माहात्म्य में देवी का अपना वचन — कि वे स्मरण करते ही गम्भीरतम विपत्तियों का नाश कर देती हैं — उनके लिए चरितार्थ होता है जो उन्हें 'प्रपन्नार्तिहरे' कहकर पुकारते हैं। भक्त बताते हैं कि संकट या शोक के समय श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भार का शीघ्र, लगभग प्रत्यक्ष शमन होता है, क्योंकि माता शरणागत पर अपनी कृपा मोड़ देती हैं।
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देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥
devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato'khilasya prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya
अर्थ:हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी! प्रसन्न होइए; हे सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होइए; हे विश्वेश्वरी! प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा कीजिए — हे देवी! आप ही चराचर की ईश्वरी हैं।
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत- दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥
ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi apāṃ svarūpasthitayā tvayaita- dāpyāyate kṛtsnamalaṅghyavīrye
अर्थ:आप ही अकेली जगत् की आधार हैं, क्योंकि आप पृथ्वी के रूप में स्थित हैं; और जल के रूप में स्थित आपसे ही यह सब आप्यायित (पुष्ट) होता है, हे अलंघ्य वीर्य वाली!
त्वं वैष्णवीशक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥
tvaṃ vaiṣṇavīśaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ
अर्थ:आप अनन्त वीर्य वाली वैष्णवी शक्ति हैं; आप विश्व के बीज और परम माया हैं। हे देवी! आपसे ही यह समस्त जगत् मोहित है; और आप ही प्रसन्न होने पर पृथ्वी पर मुक्ति की हेतु बनती हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद पाठ के लाभ
जो शरण में आते हैं उनके लिए माता की कृपा और तत्काल रक्षा का आवाहन करती है।
शरणागत भक्तों की पीड़ा एवं कष्ट (आर्ति) को दूर करने वाली मानी जाती है।
भय को शान्त करती है और यह विश्वास जगाती है कि देवी समस्त सृष्टि को धारण कर उसमें व्याप्त हैं।
माता के चरणों में शरणागति (प्रेमपूर्ण समर्पण) का भाव विकसित करती है।
नवरात्रि एवं दुर्गा सप्तशती पाठ में नारायणी स्तुति के अंग रूप में कल्याण हेतु पढ़ी जाती है।
देवी के प्रसाद को साधक की ओर मोड़कर मुक्ति की हेतु बनती है, ऐसा कहा जाता है।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद जप विधि
जलते हुए दीप के साथ दुर्गा के चित्र या यन्त्र के सामने बैठें। 'ॐ' और 'प्रसीद' शब्द से आरम्भ करके, पूर्ण समर्पण के भाव से नारायणी स्तुति के इन श्लोकों का पाठ करें। ये प्रायः सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ के अन्त में, अथवा माता की रक्षा हेतु हृदय से उठी विनती के रूप में स्वतन्त्र रूप से भी पढ़े जाते हैं। 'प्रपन्नार्तिहरे' — जो शरण में आने वाले सभी की पीड़ा हरती हैं — के अर्थ में डूबते हुए धीरे-धीरे पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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ॐ
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