देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद PDF
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देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥
devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato'khilasya prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya
हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी! प्रसन्न होइए; हे सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होइए; हे विश्वेश्वरी! प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा कीजिए — हे देवी! आप ही चराचर की ईश्वरी हैं।
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत- दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥
ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi apāṃ svarūpasthitayā tvayaita- dāpyāyate kṛtsnamalaṅghyavīrye
आप ही अकेली जगत् की आधार हैं, क्योंकि आप पृथ्वी के रूप में स्थित हैं; और जल के रूप में स्थित आपसे ही यह सब आप्यायित (पुष्ट) होता है, हे अलंघ्य वीर्य वाली!
त्वं वैष्णवीशक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥
tvaṃ vaiṣṇavīśaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ
आप अनन्त वीर्य वाली वैष्णवी शक्ति हैं; आप विश्व के बीज और परम माया हैं। हे देवी! आपसे ही यह समस्त जगत् मोहित है; और आप ही प्रसन्न होने पर पृथ्वी पर मुक्ति की हेतु बनती हैं।