देवि प्रसीद परिपालय PDF
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देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥
devi prasīda paripālaya no'ribhīte- rnityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān
हे देवी! प्रसन्न होइए; जैसे अभी असुर-वध से आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा हमें शत्रु-भय से बचाइए। और समस्त जगत् के पापों तथा उत्पातों से उत्पन्न महान् उपसर्गों को शीघ्र शान्त कीजिए।
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava
हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम प्रणत जनों पर प्रसन्न होइए; हे त्रैलोक्य-निवासियों द्वारा वन्दनीय! लोकों को वर देने वाली बनिए!
देव्युवाच वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ । तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥
devyuvāca varadāhaṃ suragaṇā varaṃ yanmanasecchatha taṃ vṛṇudhvaṃ prayacchāmi jagatāmupakārakam
देवी बोलीं — हे देवगण! मैं वरदायिनी हूँ। मन से जो वर चाहते हो, वही माँग लो; जगत् का उपकार करने वाला वह वर मैं प्रदान करती हूँ।
देवा ऊचुः सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि । एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥
devā ūcuḥ sarvābādhāpraśamanaṃ trailokyasyākhileśvari evameva tvayā kāryamasmadvairivināśanam
देवता बोले — हे अखिलेश्वरी! त्रैलोक्य की समस्त बाधाओं का शमन और हमारे शत्रुओं का विनाश — यही आप सदा करती रहें।