देवि प्रसीद परिपालय
अन्य नाम / खोज: devi prasida paripalaya · devi prasida paripalaya no aribhiteh · pranatanam prasida tvam devi · varadaham suragana · durga saptashati chapter 11 boon
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✦ अर्थ
नारायणी स्तुति (देवी माहात्म्य / दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय) का समापन करते हुए देवता जगन्माता से प्रार्थना करते हैं कि वे सदा उन्हें शत्रुओं से बचाएँ, समस्त लोकों के पापों और दुष्ट उत्पातों से उत्पन्न विपत्तियों को मिटाएँ, और त्रैलोक्य को वरदायिनी बनें। प्रसन्न होकर देवी उन्हें इच्छित वर देने को कहती हैं; निःस्वार्थ देवता केवल यही माँगते हैं कि वे सदा जगत् की बाधाओं का शमन करें और धर्म के शत्रुओं का नाश करें। यह शरण, कृपा और रक्षा की एक सुन्दर प्रार्थना-प्रत्युत्तर है।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati Chapter 11 · Maharshi Markandeya (traditionally ascribed) · Puranic period (c. 5th–6th century CE for the Devi Mahatmya)
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती या चण्डी), मार्कण्डेय पुराण का अंश, जगन्माता की असुरों पर विजयों का वर्णन करता है। ग्यारहवें अध्याय में, शुम्भ के वध के पश्चात् देवता नारायणी स्तुति गाते हैं और इस उत्कट प्रार्थना से उसका समापन करते हैं: देवी सदा उन्हें शत्रुओं से बचाएँ, समस्त लोकों के पापों और विपत्तियों को मिटाएँ, और त्रैलोक्य को वरदायिनी बनें। प्रसन्न होकर देवी उन्हें इच्छित वर देती हैं। पूर्ण निःस्वार्थता से देवता अपने लिए कुछ नहीं, केवल यही माँगते हैं कि वे सदा जगत् की विपत्तियों का शमन करें और धर्म के शत्रुओं का नाश करें — और देवी यह वचन देती हैं, जब भी संकट आए तब अपने भावी अवतारों की भविष्यवाणी करती हुई।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा मानती है कि यह अंश देवी का अपना वचन धारण करता है — कि वे अपने भक्तों की प्रार्थनाएँ पूर्ण करेंगी और जगत् की रक्षा हेतु बार-बार अवतरित होंगी। जो इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं, उनकी बाधाएँ विलीन, अशुभ शकुन दूर और शत्रु माता की कृपा से शक्तिहीन हो जाते हैं, ऐसा कहा जाता है।
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देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥
devi prasīda paripālaya no'ribhīte- rnityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān
अर्थ:हे देवी! प्रसन्न होइए; जैसे अभी असुर-वध से आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा हमें शत्रु-भय से बचाइए। और समस्त जगत् के पापों तथा उत्पातों से उत्पन्न महान् उपसर्गों को शीघ्र शान्त कीजिए।
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava
अर्थ:हे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम प्रणत जनों पर प्रसन्न होइए; हे त्रैलोक्य-निवासियों द्वारा वन्दनीय! लोकों को वर देने वाली बनिए!
देव्युवाच वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ । तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥
devyuvāca varadāhaṃ suragaṇā varaṃ yanmanasecchatha taṃ vṛṇudhvaṃ prayacchāmi jagatāmupakārakam
अर्थ:देवी बोलीं — हे देवगण! मैं वरदायिनी हूँ। मन से जो वर चाहते हो, वही माँग लो; जगत् का उपकार करने वाला वह वर मैं प्रदान करती हूँ।
देवा ऊचुः सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि । एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥
devā ūcuḥ sarvābādhāpraśamanaṃ trailokyasyākhileśvari evameva tvayā kāryamasmadvairivināśanam
अर्थ:देवता बोले — हे अखिलेश्वरी! त्रैलोक्य की समस्त बाधाओं का शमन और हमारे शत्रुओं का विनाश — यही आप सदा करती रहें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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देवि प्रसीद परिपालय पाठ के लाभ
शत्रुओं और विपत्ति से माता की रक्षा हेतु हृदय से की गई प्रार्थना।
देवी से जगत् के पापों, उत्पातों और महान् उथल-पुथल को शान्त करने की याचना करती है।
देवी द्वारा अपने भक्तों को कोई भी वर देने का स्वयं का वचन वर्णित करती है।
निःस्वार्थ प्रार्थना का आदर्श — अपने लाभ की नहीं, सबके कल्याण की कामना करना।
बाधाओं, अपशकुनों और विपत्ति से मुक्ति हेतु पढ़ी जाती है।
नित्य तथा नवरात्रि के पाठ में नारायणी स्तुति का उपयुक्त समापन।
देवि प्रसीद परिपालय जप विधि
इन श्लोकों का भक्ति और समर्पण के साथ पाठ करें, विशेषकर जब शत्रुओं, बाधाओं या अशुभ उत्पातों से राहत चाहते हों। इन्हें समापन प्रार्थना के रूप में स्वतन्त्र रूप से, अथवा सम्पूर्ण नारायणी स्तुति और दुर्गा सप्तशती (चण्डी पाठ) के अंग रूप में पढ़ा जा सकता है। 'देवि प्रसीद' पर भीतर से नमन करें और देवताओं के उदाहरण का अनुसरण करते हुए केवल अपने लिए नहीं, समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए यह प्रार्थना अर्पित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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