देवि प्रसीद परिपालय Meaning — Line by Line
देवि प्रसीद परिपालय
Every verse and every word explained in English & Hindi
Meaning — Line by Line
Every verse of देवि प्रसीद परिपालय with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.
devi prasīda paripālaya no'ribhīte-
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥
devi prasīda paripālaya no'ribhīte- rnityaṃ yathāsuravadhādadhunaiva sadyaḥ pāpāni sarvajagatāṃ praśamaṃ nayāśu utpātapākajanitāṃśca mahopasargān
Meaningहे देवी! प्रसन्न होइए; जैसे अभी असुर-वध से आपने हमारी रक्षा की, वैसे ही सदा हमें शत्रु-भय से बचाइए। और समस्त जगत् के पापों तथा उत्पातों से उत्पन्न महान् उपसर्गों को शीघ्र शान्त कीजिए।
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि । त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥
praṇatānāṃ prasīda tvaṃ devi viśvārtihāriṇi trailokyavāsināmīḍye lokānāṃ varadā bhava
Meaningहे विश्व की पीड़ा हरने वाली देवी! हम प्रणत जनों पर प्रसन्न होइए; हे त्रैलोक्य-निवासियों द्वारा वन्दनीय! लोकों को वर देने वाली बनिए!
devyuvāca
देव्युवाच वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ । तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥
devyuvāca varadāhaṃ suragaṇā varaṃ yanmanasecchatha taṃ vṛṇudhvaṃ prayacchāmi jagatāmupakārakam
Meaningदेवी बोलीं — हे देवगण! मैं वरदायिनी हूँ। मन से जो वर चाहते हो, वही माँग लो; जगत् का उपकार करने वाला वह वर मैं प्रदान करती हूँ।
devā ūcuḥ
देवा ऊचुः सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि । एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥
devā ūcuḥ sarvābādhāpraśamanaṃ trailokyasyākhileśvari evameva tvayā kāryamasmadvairivināśanam
Meaningदेवता बोले — हे अखिलेश्वरी! त्रैलोक्य की समस्त बाधाओं का शमन और हमारे शत्रुओं का विनाश — यही आप सदा करती रहें।
Word-by-Word Breakdown
Origin & History
Source: Durga Saptashati Chapter 11
Author: Maharshi Markandeya (traditionally ascribed)
Period: Puranic period (c. 5th–6th century CE for the Devi Mahatmya)
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती या चण्डी), मार्कण्डेय पुराण का अंश, जगन्माता की असुरों पर विजयों का वर्णन करता है। ग्यारहवें अध्याय में, शुम्भ के वध के पश्चात् देवता नारायणी स्तुति गाते हैं और इस उत्कट प्रार्थना से उसका समापन करते हैं: देवी सदा उन्हें शत्रुओं से बचाएँ, समस्त लोकों के पापों और विपत्तियों को मिटाएँ, और त्रैलोक्य को वरदायिनी बनें। प्रसन्न होकर देवी उन्हें इच्छित वर देती हैं। पूर्ण निःस्वार्थता से देवता अपने लिए कुछ नहीं, केवल यही माँगते हैं कि वे सदा जगत् की विपत्तियों का शमन करें और धर्म के शत्रुओं का नाश करें — और देवी यह वचन देती हैं, जब भी संकट आए तब अपने भावी अवतारों की भविष्यवाणी करती हुई।
Frequently Asked Questions
'देवि प्रसीद परिपालय' में कौन से श्लोक हैं?▼
देवता कौन सा वर माँगते हैं?▼
यह अंश कब पढ़ा जाता है?▼
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