धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धु — Word-by-Word Meaning
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धु
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
धराधरेन्द्रनन्दिनी
Dharadharendra Nandini
पर्वतराज की पुत्री (पार्वती)
विलासबन्धु
Vilasa Bandhu
विलास एवं क्रीड़ा के प्रिय सखा
बन्धुर
Bandhura
मनोहर, सुन्दर, सुशोभित
स्फुरत्
Sphurat
देदीप्यमान, स्फुरित, तेजोमय
दिगन्त
Diganta
समस्त दिशाओं के अन्त, क्षितिज
सन्तति
Santati
अविच्छिन्न विस्तार, सम्पूर्ण फैलाव
प्रमोद मानमानसे
Pramoda Mana-manase
जिनका मन (सभी लोकों में) आनन्दित एवं प्रमुदित रहता है
कृपाकटाक्ष
Kripa Kataksha
करुणामय कृपाकटाक्ष (तिरछी दृष्टि)
धोरणी
Dhorani
अविरल धारा, सतत प्रवाह
निरुद्ध
Niruddha
रोक दी गई, निवारित, टाल दी गई
दुर्धरापदि
Durdhara-apadi
दुर्धर, असह्य आपदाएँ
दिगम्बरे
Digambare
दिगम्बर में (दिशाओं को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले शिव में)
मनोविनोदम् एतु
Mano-vinodam Etu
(मेरा) मन विनोद पाए
वस्तुनि
Vastuni
उस (परम) सत्ता / तत्त्व में
Complete Translation
पर्वतराजपुत्री (पार्वती) के विलास के बन्धु एवं मनोहर, समस्त दिशाओं की दीप्त परम्परा में आनन्दित मन वाले, जिनकी कृपाकटाक्ष की अविरल धारा दुर्धर आपदाओं को रोक देती है — उन दिगम्बर शिव की उस सत्ता में मेरा मन विनोद पाए।
Origin & History
Source: Shiva Tandava Stotram, verse 3 (composed by Ravana)
Author: Ravana, King of Lanka
Period: Treta Yuga (mythological era)
रामायण के अनुसार रावण शिव के सबसे बड़े भक्तों में से एक था। जब उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तब शिव ने उसे दबा दिया और उसकी अँगुलियाँ कुचल दीं; वेदना एवं भक्ति में रावण ने शिव तांडव स्तोत्र का उद्गार किया। यह तृतीय श्लोक ब्रह्माण्डीय नृत्य के वर्णन से मुड़कर एक कोमल प्रार्थना बन जाता है — कि मन दिगम्बर शिव में, पार्वती के सखा में, जिनकी कृपादृष्टि समस्त आपदाओं को टाल देती है, विनोद पाए।
Frequently Asked Questions
'धराधरेन्द्र नन्दिनी' का क्या अर्थ है?▼
यह पार्वती का एक नाम है — 'पर्वतराज (धराधरेन्द्र) की पुत्री (नन्दिनी)'। यह श्लोक शिव को उनके प्रिय एवं मनोहर सखा (विलास-बन्धु) के रूप में वर्णित करता है, और प्रार्थना करता है कि भक्त का मन इस दिगम्बर शिव में विनोद पाए।
यह श्लोक किस स्तोत्र से है?▼
यह शिव तांडव स्तोत्र का तृतीय श्लोक है, जो लंका के भक्त-राजा रावण द्वारा भगवान शिव के ब्रह्माण्डीय तांडव नृत्य की स्तुति में रचित गर्जता हुआ हिमन है।
यह श्लोक किसकी प्रार्थना करता है?▼
यह प्रार्थना करता है कि मन दिगम्बर (दिशाओं को वस्त्र रूप में धारण करने वाले) शिव में विनोद पाए, जिनकी कृपाकटाक्ष की अविरल धारा (कृपा-कटाक्ष-धोरणी) अत्यन्त असह्य आपदाओं (दुर्धर-आपदि) को भी रोक देती है।
मुझे इसे कब चन्तन करना चाहिए?▼
इसे सोमवार को, प्रदोष काल (सन्ध्या-गोधूलि) में, महाशिवरात्रि पर, अथवा श्रावण मास में चन्तन करना श्रेष्ठ है — और जब भी आप कठिनाइयों के विरुद्ध शिव की रक्षाकारी कृपा चाहें।
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