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धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धु

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 सोमवार सन्ध्या, महाशिवरात्रि, अथवा प्रदोष काल·📜 Shiva Tandava Stotram, verse 3 (composed by Ravana)

अन्य नाम / खोज: dharadharendra nandini · dharadharendra nandini vilasabandhu · shiva tandava verse 3 · kripa kataksha dhorani

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अर्थ

यह रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र का तृतीय श्लोक है, जो प्रार्थना करता है कि मन दिगम्बर शिव में विनोद पाए। यह शिव को पार्वती के प्रिय सखा, समस्त दिशाओं में आनन्दमय, तथा जिनकी कृपाकटाक्ष की अविरल धारा दुर्धर आपदाओं को रोकती है — ऐसे रूप में स्मरण करता है। इसका डमरू-जैसा गर्जता छंद स्तोत्र में अत्यन्त प्रिय है।

उत्पत्ति और कथा

Shiva Tandava Stotram, verse 3 (composed by Ravana) · Ravana, King of Lanka · Treta Yuga (mythological era)

रामायण के अनुसार रावण शिव के सबसे बड़े भक्तों में से एक था। जब उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तब शिव ने उसे दबा दिया और उसकी अँगुलियाँ कुचल दीं; वेदना एवं भक्ति में रावण ने शिव तांडव स्तोत्र का उद्गार किया। यह तृतीय श्लोक ब्रह्माण्डीय नृत्य के वर्णन से मुड़कर एक कोमल प्रार्थना बन जाता है — कि मन दिगम्बर शिव में, पार्वती के सखा में, जिनकी कृपादृष्टि समस्त आपदाओं को टाल देती है, विनोद पाए।

शास्त्रों में वर्णित

शिव रावण के तांडव स्तोत्र से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कैलाश को उखाड़ने के कृत्य को क्षमा कर दिया और उसे अजेय चन्द्रहास तलवार प्रदान की। भक्त मानते हैं कि इस जैसे श्लोक — जो शिव की कृपादृष्टि की अविरल धारा का आवाहन करते हैं — श्रद्धापूर्वक चन्तन करने वालों की दुर्धर विपत्तियों को टाल देते हैं।

मंत्र

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धराधरेन्द्र नन्दिनी विलासबन्धु बन्धुर स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि

Dharadharendra nandini vilasabandhu bandhura Sphuraddiganta santati pramoda manamanase Kripakatakshadhorani niruddha durdharapadi Kvachiddigambare manovinodametu vastuni

अर्थ:पर्वतराजपुत्री (पार्वती) के विलास के बन्धु एवं मनोहर, समस्त दिशाओं की दीप्त परम्परा में आनन्दित मन वाले, जिनकी कृपाकटाक्ष की अविरल धारा दुर्धर आपदाओं को रोक देती है — उन दिगम्बर शिव की उस सत्ता में मेरा मन विनोद पाए।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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धराधरेन्द्रनन्दिनी🔊Dharadharendra Nandiniपर्वतराज की पुत्री (पार्वती)
विलासबन्धु🔊Vilasa Bandhuविलास एवं क्रीड़ा के प्रिय सखा
बन्धुर🔊Bandhuraमनोहर, सुन्दर, सुशोभित
स्फुरत्🔊Sphuratदेदीप्यमान, स्फुरित, तेजोमय
दिगन्त🔊Digantaसमस्त दिशाओं के अन्त, क्षितिज
सन्तति🔊Santatiअविच्छिन्न विस्तार, सम्पूर्ण फैलाव
प्रमोद मानमानसे🔊Pramoda Mana-manaseजिनका मन (सभी लोकों में) आनन्दित एवं प्रमुदित रहता है
कृपाकटाक्ष🔊Kripa Katakshaकरुणामय कृपाकटाक्ष (तिरछी दृष्टि)
धोरणी🔊Dhoraniअविरल धारा, सतत प्रवाह
निरुद्ध🔊Niruddhaरोक दी गई, निवारित, टाल दी गई
दुर्धरापदि🔊Durdhara-apadiदुर्धर, असह्य आपदाएँ
दिगम्बरे🔊Digambareदिगम्बर में (दिशाओं को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले शिव में)
मनोविनोदम् एतु🔊Mano-vinodam Etu(मेरा) मन विनोद पाए
वस्तुनि🔊Vastuniउस (परम) सत्ता / तत्त्व में

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धु पाठ के लाभ

शिव तांडव स्तोत्र का एक प्रिय श्लोक जो शिव को पार्वती के प्रिय सखा रूप में वर्णित करता है

इसकी केन्द्रीय प्रार्थना है कि शिव की कृपाकटाक्ष (दयालु दृष्टि) दुर्धर आपदाओं को टाल दे

भगवान शिव के दिगम्बर स्वरूप की रक्षाकारी कृपा का आवाहन करता है

शक्तिशाली गर्जता छंद साहस, निर्भयता एवं भक्ति की तीव्रता को बढ़ाता है

सोमवार को प्रदोष काल (सन्ध्या-गोधूलि) में चन्तन करने पर विशेष फलदायी

असह्य कठिनाइयों एवं संकटों से मुक्ति हेतु पढ़ा जाता है

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धु जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयसोमवार सन्ध्या, महाशिवरात्रि, अथवा प्रदोष काल

शिव तांडव स्तोत्र के इस श्लोक को गहरी एकाग्रता से चन्तन करें, छंद की शक्तिशाली लय को बनाए रखते हुए। इसे प्रदोष काल (सन्ध्या-गोधूलि) में पढ़ना सर्वोत्तम है; यदि सम्भव हो तो दीप जलाएँ और बिल्व-पत्र अर्पित करें। इसे अकेले भी पढ़ा जा सकता है, शिव की रक्षाकारी दयालु दृष्टि पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, अथवा सम्पूर्ण तांडव स्तोत्र के अंग रूप में।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह पार्वती का एक नाम है — 'पर्वतराज (धराधरेन्द्र) की पुत्री (नन्दिनी)'। यह श्लोक शिव को उनके प्रिय एवं मनोहर सखा (विलास-बन्धु) के रूप में वर्णित करता है, और प्रार्थना करता है कि भक्त का मन इस दिगम्बर शिव में विनोद पाए।
यह शिव तांडव स्तोत्र का तृतीय श्लोक है, जो लंका के भक्त-राजा रावण द्वारा भगवान शिव के ब्रह्माण्डीय तांडव नृत्य की स्तुति में रचित गर्जता हुआ हिमन है।
यह प्रार्थना करता है कि मन दिगम्बर (दिशाओं को वस्त्र रूप में धारण करने वाले) शिव में विनोद पाए, जिनकी कृपाकटाक्ष की अविरल धारा (कृपा-कटाक्ष-धोरणी) अत्यन्त असह्य आपदाओं (दुर्धर-आपदि) को भी रोक देती है।
इसे सोमवार को, प्रदोष काल (सन्ध्या-गोधूलि) में, महाशिवरात्रि पर, अथवा श्रावण मास में चन्तन करना श्रेष्ठ है — और जब भी आप कठिनाइयों के विरुद्ध शिव की रक्षाकारी कृपा चाहें।

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