ध्रुव स्तुति PDF
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योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना । अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान्नमो भगवते पुरूषाय तुभ्यम् ॥ १ ॥
yo 'ntaḥ praviśya mama vācam imāṃ prasuptāṃ sañjīvayaty akhila-śakti-dharaḥ sva-dhāmnā | anyāṃś ca hasta-caraṇa-śravaṇa-tvag-ādīn prāṇān namo bhagavate puruṣāya tubhyam || 1 ||
हे प्रभो! आप समस्त शक्तियों के धारक सर्वशक्तिमान हैं। मेरे भीतर प्रविष्ट होकर आपने अपने तेज से मेरी सोई हुई वाणी को पुनः जीवित कर दिया, तथा मेरे हाथ, पैर, कान, त्वचा आदि इन्द्रियों और प्राणों को भी सजीव किया। आप उस परमपुरुष को मेरा नमस्कार है।
एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम् । सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि ॥ २ ॥
ekas tvam eva bhagavann idam ātma-śaktyā māyākhyayoru-guṇayā mahad-ādy-aśeṣam | sṛṣṭvānuviśya puruṣas tad-asad-guṇeṣu nāneva dāruṣu vibhāvasu-vad vibhāsi || 2 ||
हे भगवन्! केवल आप ही एक हैं, जो अपनी 'माया' नामक उग्र गुणों वाली शक्ति से महत्तत्त्व आदि समस्त सृष्टि की रचना करके उसमें पुरुषरूप से प्रवेश करते हैं और उसके गुणों में अनेक के समान प्रतीत होते हैं — जैसे एक ही अग्नि विभिन्न काष्ठों में नाना रूपों में प्रकाशित होती है।
त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः । तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो ॥ ३ ॥
tvad-dattayā vayunayedam acaṣṭa viśvaṃ supta-prabuddha iva nātha bhavat-prapannaḥ | tasyāpavargya-śaraṇaṃ tava pāda-mūlaṃ vismaryate kṛta-vidā katham ārta-bandho || 3 ||
हे नाथ! आपके द्वारा दी गई बुद्धि से ही यह शरणागत जीव इस विश्व को वैसे देख पाता है जैसे कोई निद्रा से जागा हुआ। हे आर्तबन्धो! फिर कोई विवेकी पुरुष आपके उन चरणकमलों को कैसे भूल सकता है, जो मुक्ति के एकमात्र आश्रय हैं?
नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः । अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य- मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणाम् ॥ ४ ॥
nūnaṃ vimuṣṭa-matayas tava māyayā te ye tvāṃ bhavāpyaya-vimokṣaṇam anya-hetoḥ | arcanti kalpaka-taruṃ kuṇapopabhogyam icchanti yat sparśajaṃ niraye 'pi nṝṇām || 4 ||
निश्चय ही उनकी बुद्धि आपकी माया से हर ली गई है, जो आपको — कल्पवृक्ष को — जन्म-मृत्यु से छुटकारे आदि किसी अन्य कामना के लिए पूजते हैं; क्योंकि वे जिन स्पर्शजन्य भोगों की इच्छा करते हैं, वे तो शव के समान भोग हैं, जो नरक में भी सुलभ हैं।
या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किंत्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥ ५ ॥
yā nirvṛtis tanu-bhṛtāṃ tava pāda-padma- dhyānād bhavaj-jana-kathā-śravaṇena vā syāt | sā brahmaṇi sva-mahimany api nātha mā bhūt kiṃ tv antakāsi-lulitāt patatāṃ vimānāt || 5 ||
हे नाथ! आपके चरणकमलों के ध्यान से अथवा आपके भक्तों की कथा सुनने से प्राणियों को जो आनन्द प्राप्त होता है, वह आपके स्वमहिमारूप ब्रह्म (निर्विशेष मोक्ष) में लीन होने पर भी न मिले — फिर मृत्यु की तलवार से जिनके विमान नष्ट हो जाते हैं उन स्वर्गभोगों की तो बात ही क्या!
भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्गो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् । येनाञ्जसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः ॥ ६ ॥
bhaktiṃ muhuḥ pravahatāṃ tvayi me prasaṅgo bhūyād ananta mahatām amalāśayānām | yenāñjasolbaṇam uru-vyasanaṃ bhavābdhiṃ neṣye bhavad-guṇa-kathāmṛta-pāna-mattaḥ || 6 ||
हे अनन्त! मुझे सदा उन महान्, निर्मल हृदय वाले भक्तों का संग प्राप्त हो, जिनकी भक्ति निरन्तर आप में प्रवाहित होती है; जिससे आपके गुणों की कथामृत के पान से मतवाला होकर मैं इस घोर विपत्तियों वाले भवसागर को सहज ही पार कर जाऊँ।
ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः । ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द- सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्गाः ॥ ७ ॥
te na smaranty atitarāṃ priyam īśa martyaṃ ye cānv adaḥ suta-suhṛd-gṛha-vitta-dārāḥ | ye tv abja-nābha bhavadīya-padāravinda- saugandhya-lubdha-hṛdayeṣu kṛta-prasaṅgāḥ || 7 ||
हे कमलनाभ! जिन्होंने आपके चरणकमलों की सुगन्ध के लोभी भक्तों के हृदय में प्रेम कर लिया है, वे, हे ईश! पुत्र, मित्र, घर, धन और स्त्री आदि इस मर्त्यलोक की प्रियतम वस्तुओं का भी स्मरण नहीं करते।
तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् । रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं नातः परं परम वेद्मि न यत्र वादः ॥ ८ ॥
tiryaṅ-naga-dvija-sarīsṛpa-deva-daitya- martyādibhiḥ paricitaṃ sad-asad-viśeṣam | rūpaṃ sthaviṣṭham aja te mahad-ādy-anekaṃ nātaḥ paraṃ parama vedmi na yatra vādaḥ || 8 ||
हे अज! पशु, वृक्ष, पक्षी, सरीसृप, देव, दैत्य, मनुष्य आदि से व्याप्त, सत् और असत् के भेद वाले आपके इस महत्तत्त्व आदि अनेक रूपों से युक्त स्थूल विश्वरूप को मैं जानता हूँ; इससे परे जो परम तत्त्व है उसे भी जानता हूँ, जिसमें कोई विवाद नहीं।
कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृह्णन् शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्के । यन्नाभिसिन्धुरुहकाञ्चनलोकपद्म- गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै ॥ ९ ॥
kalpānta etad akhilaṃ jaṭhareṇa gṛhṇan śete pumān sva-dṛg ananta-sakhas tad-aṅke | yan-nābhi-sindhu-ruha-kāñcana-loka-padma- garbhe dyumān bhagavate praṇato 'smi tasmai || 9 ||
जो परमपुरुष कल्पान्त में इस समस्त सृष्टि को अपने उदर में धारण कर, स्वयंप्रकाश रूप से अनन्त शेष को सखा बनाकर उन्हीं की गोद में शयन करते हैं, और जिनकी नाभि-सागर से उत्पन्न स्वर्णिम लोकपद्म के गर्भ में तेजस्वी ब्रह्मा प्रकट होते हैं — उन भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ।
त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः । यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥ १० ॥
tvaṃ nitya-mukta-pariśuddha-vibuddha ātmā kūṭa-stha ādi-puruṣo bhagavāṃs try-adhīśaḥ | yad-buddhy-avasthitim akhaṇḍitayā sva-dṛṣṭyā draṣṭā sthitāv adhimakho vyatirikta āsse || 10 ||
आप नित्यमुक्त, परिशुद्ध, विबुद्ध आत्मा हैं, कूटस्थ आदिपुरुष, त्रिगुण/त्रिलोक के अधीश्वर भगवान् हैं। अपनी अखण्ड दृष्टि से बुद्धि की प्रत्येक अवस्था के द्रष्टा होते हुए भी आप सृष्टि-स्थिति के अध्यक्ष रूप में सबसे पृथक् और निर्लिप्त रहते हैं।
यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् । तद्ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य- मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥ ११ ॥
yasmin viruddha-gatayo hy aniśaṃ patanti vidyādayo vividha-śaktaya ānupūrvyāt | tad brahma viśva-bhavam ekam anantam ādyam ānanda-mātram avikāram ahaṃ prapadye || 11 ||
जिसमें विद्या-अविद्या आदि परस्पर विरुद्ध गति वाली विविध शक्तियाँ क्रमशः निरन्तर उदित होती रहती हैं — उस एक, अनन्त, आदि, आनन्दस्वरूप, निर्विकार, विश्व के उद्गम ब्रह्म की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म- माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः । अप्येवमार्य भगवान् परिपाति दीनान् वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥ १२ ॥
satyāśiṣo hi bhagavaṃs tava pāda-padmam āśīs tathānubhajataḥ puruṣārtha-mūrteḥ | apy evam ārya bhagavān paripāti dīnān vāśreva vatsakam anugraha-kātaro 'smān || 12 ||
हे भगवन्! पुरुषार्थ-स्वरूप आपके चरणकमलों की सेवा करने वाले को जो आशीर्वाद मिलते हैं वे सत्य ही हैं। तथापि, हे आर्य! भगवान् अपने दीन भक्तों की प्रार्थना से भी बढ़कर रक्षा करते हैं — जैसे स्नेह से व्याकुल गाय अपने असहाय बछड़े का पालन करती है।