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धूमावती स्तोत्रम् (धूमावत्यष्टकम्) PDF

धूमावती स्तोत्रम् (धूमावत्यष्टकम्) की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

प्रातर्यास्यात् कुमारी कुसुमकलिकया जापमालां जपन्ती मध्याह्ने प्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम्। सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालिकापातु युष्मान्॥१॥

Prātar yāsyāt kumārī kusumakalikayā jāpamālāṁ japantī madhyāhne prauḍharūpā vikasitavadanā cārunetrā niśāyām। sandhyāyāṁ vṛddharūpā galitakucayugā muṇḍamālāṁ vahantī sā devī devadevī tribhuvanajananī kālikā pātu yuṣmān॥1॥

प्रातःकाल वह कुमारी रूप में जपमाला फेरती हैं, मध्याह्न में प्रौढ़ रूप में सुंदर मुख और मनोहर नेत्रों वाली, और संध्या में वृद्धा रूप में मुण्डमाला धारण किए होती हैं — वही देवदेवी, त्रिभुवन की जननी कालिका (धूमावती) आप सबकी रक्षा करें।

बद्ध्वा खट्वाङ्गकोटौ कपिलवरजटामण्डलं पद्मयोनेः कृत्वा दैत्योत्तमाङ्गैः स्रजमुरसि शिरश्शेखरं तार्क्ष्यपक्षैः। पूर्णं रक्तैः सुराणां यममहिषमहाश‍ृङ्गमादाय पाणौ पायाद्वो वन्द्यमानः प्रलयमुदितया भैरवः कालरात्र्याम्॥२॥

Baddhvā khaṭvāṅgakoṭau kapilavarajaṭāmaṇḍalaṁ padmayoneḥ kṛtvā daityottamāṅgaiḥ srajam urasi śiraśśekharaṁ tārkṣyapakṣaiḥ। pūrṇaṁ raktaiḥ surāṇāṁ yamamahiṣamahāśṛṅgam ādāya pāṇau pāyādvo vandyamānaḥ pralayamuditayā bhairavaḥ kālarātryām॥2॥

ब्रह्मा की श्रेष्ठ जटाओं को खट्वांग की कोटि पर बाँधे, वक्ष पर दैत्यों के मस्तकों की माला और गरुड़ के पंखों का शिरोभूषण धारण किए, हाथ में देवताओं के रक्त से भरा यम के महिष का विशाल शृंग लिए हुए — प्रलयकाल में पूजित एवं प्रसन्न वह भैरव कालरात्रि में आपकी रक्षा करें।

चर्वन्तीमस्थिखण्डं प्रकटकटकटाशब्दसङ्घातमुग्रं कुर्वाणि प्रेतमध्ये कहहकहकहाहास्यमुग्रं कृशाङ्गी। नित्यं नित्यप्रसक्तां डमरुडिमडिमां स्फारयन्तीं मुखाब्जं पायान्नश्चण्डिकेयं झझमझमझमा जल्पमाना भ्रमन्ती॥३॥

Carvantīm asthikhaṇḍaṁ prakaṭakaṭakaṭāśabdasaṅghātam ugraṁ kurvāṇi pretamadhye kahahakahakahāhāsyam ugraṁ kṛśāṅgī। nityaṁ nityaprasaktāṁ ḍamaruḍimaḍimāṁ sphārayantīṁ mukhābjaṁ pāyānnaś caṇḍikeyaṁ jhajhamajhamajhamā jalpamānā bhramantī॥3॥

कृशकाय, अस्थिखण्डों को कटकट शब्द के साथ चबाती हुई, प्रेतों के बीच 'कहह-कहकहा' का भयंकर अट्टहास करती, सदा तल्लीन, डमरू को 'डिम-डिम' बजाती, मुखकमल को विस्तृत करती और 'झम-झम' बोलती हुई घूमती — वह चण्डिका हमारी रक्षा करें।

वामे कर्णे मृगाङ्कं प्रलयपरिगतं दक्षिणे सूर्यबिम्बं कण्ठे नक्षत्रहारं वरविकटजटाजूटके मुण्डमालाम्। स्कन्धे कृत्वोरगेन्द्रध्वजनिकरयुतं ब्रह्मकङ्कालभारं संहारे धारयन्ती मम हरतु भयं भद्रदा भद्रकाली॥४॥

Vāme karṇe mṛgāṅkaṁ pralayaparigataṁ dakṣiṇe sūryabimbaṁ kaṇṭhe nakṣatrahāraṁ varavikaṭajaṭājūṭake muṇḍamālām। skandhe kṛtvoragendradhvajanikarayutaṁ brahmakaṅkālabhāraṁ saṁhāre dhārayantī mama haratu bhayaṁ bhadradā bhadrakālī॥4॥

बाएँ कान में चन्द्र, दाएँ में प्रलयगत सूर्यबिम्ब, कण्ठ में नक्षत्रों का हार, विकट जटाजूट पर मुण्डमाला, कंधे पर नागराज ध्वज और ब्रह्मा के कंकाल का भार धारण किए — संहारकाल में सबको धारण करने वाली कल्याणदायिनी भद्रकाली मेरे भय को हर लें।

धूमावत्यष्टकं पुण्यं सर्वापद्विनिवारकम्। यः पठेत् साधको भक्त्या सिद्धिं विन्दति वाञ्छिताम्॥५॥

Dhūmāvatyaṣṭakaṁ puṇyaṁ sarvāpadvinivārakam। yaḥ paṭhet sādhako bhaktyā siddhiṁ vindati vāñchitām॥5॥

यह पुण्यमय धूमावत्यष्टक समस्त आपत्तियों का निवारण करता है; जो साधक भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है वह अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है। महान विपत्ति, महाघोर भय, महारोग, महायुद्ध में; शत्रु-उच्चाटन, मारण और प्राणियों के मोहन में — जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, हे देवी, वह सर्वत्र सिद्धि पाता है। देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, सिंह, व्याघ्र आदि सभी इस स्तोत्र के स्मरणमात्र से बहुत दूर भाग जाते हैं, फिर मनुष्यादि की तो बात ही क्या। हे देवेशि! इस स्तोत्र से भूतल पर क्या सिद्ध नहीं होता? सर्वत्र शांति होती है और अंत में जीव निर्वाण को प्राप्त होता है।

महापदि महाघोरे महारोगे महारणे। शत्रूच्चाटे मारणादौ जन्तूनां मोहने तथा॥६॥

Mahāpadi mahāghore mahāroge mahāraṇe। śatrūccāṭe māraṇādau jantūnāṁ mohane tathā॥6॥

पठेत् स्तोत्रमिदं देवि सर्वत्र सिद्धिभाग्भवेत्। देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः॥७॥

Paṭhet stotram idaṁ devi sarvatra siddhibhāg bhavet। devadānavagandharvā yakṣarākṣasapannagāḥ॥7॥

सिंहव्याघ्रादिकास्सर्वे स्तोत्रस्मरणमात्रतः। दूराद्दूरतरं यान्ति किं पुनर्मानुषादयः॥८॥

Siṁhavyāghrādikāssarve stotrasmaraṇamātrataḥ। dūrāddūrataraṁ yānti kiṁ punar mānuṣādayaḥ॥8॥

स्तोत्रेणानेन देवेशि किं न सिद्ध्यति भूतले। सर्वशान्तिर्भवेद्देवि ह्यन्ते निर्वाणतां व्रजेत्॥९॥

Stotreṇānena deveśi kiṁ na siddhyati bhūtale। sarvaśāntir bhaved devi hyante nirvāṇatāṁ vrajet॥9॥