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श्री दुर्गा आपदुद्धारक स्तोत्रम् — Word-by-Word Meaning

श्री दुर्गा आपदुद्धारक स्तोत्रम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

नमस्ते
namaste
आपको नमस्कार
शरण्ये
sharanye
हे सबकी शरण, आश्रय देने वाली
शिवे
shive
हे कल्याणमयी, शिव की प्रिया
सानुकम्पे
sanukampe
हे करुणा और दया से पूर्ण
जगद्व्यापिके
jagad-vyapike
समस्त जगत् में व्याप्त रहने वाली
विश्वरूपे
vishva-rupe
जिनका स्वरूप ही ब्रह्माण्ड है
जगद्वन्द्यपादारविन्दे
jagad-vandya-padaravinde
जिनके चरण-कमल समस्त जगत् के वन्दनीय हैं
जगत्तारिणि
jagat-tarini
हे जगत्तारिणि (संसार-सागर से तारने वाली)
त्राहि दुर्गे
trahi durge
मेरी रक्षा करो, हे दुर्गे! (प्रत्येक श्लोक की टेक)
अनाथस्य
anathasya
अनाथ / जिसका कोई रक्षक नहीं
तृष्णातुरस्य
trishnaturasya
तृष्णा/प्यास से व्याकुल
त्वमेका गतिर्देवि
tvam eka gatir devi
हे देवि, आप ही एकमात्र गति/आश्रय
निस्तारकर्त्री
nistara-kartri
मुक्ति और उद्धार करने वाली
अरण्ये रणे
aranye rane
वन में, युद्ध में
शत्रुमध्ये
shatru-madhye
शत्रुओं के बीच
निस्तारनौका
nistara-nauka
उद्धार की नौका (विपत्ति-सागर से पार करने वाली)
विपत्सागरे
vipat-sagare
विपत्ति के सागर में
इडा पिङ्गला सुषुम्ना
ida pingala sushumna
आप ही तीनों नाड़ी — इडा, पिङ्गला, सुषुम्ना हैं
कालरात्रिस्वरूपे
kala-ratri-svarupe
जिनका स्वरूप कालरात्रि (प्रलय की रात्रि) है
आपदुद्धारहेतुकम्
apad-uddhara-hetukam
आपत्ति से उद्धार के लिए रचा गया
परमं पदम्
paramam padam
परम पद / मोक्ष

Complete Translation

हे शरण देने वाली, हे कल्याणमयी और करुणामयी, आपको नमस्कार है; हे जगत् में व्याप्त रहने वाली, हे विश्वरूपिणी, आपको नमस्कार है। जिनके चरण-कमल समस्त जगत् के वन्दनीय हैं, हे जगत् को तारने वाली, मेरी रक्षा करो, हे दुर्गे! जिनका स्वरूप जगत् की कल्पना से परे है, जो महायोगियों का विज्ञान-स्वरूप हैं, जो सदा आनन्दस्वरूपा हैं — उन्हें बार-बार नमस्कार; हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! अनाथ, दीन, तृष्णा से व्याकुल, भय से पीड़ित, डरे हुए और बन्धन में पड़े प्राणी के लिए, हे देवि, आप ही एकमात्र गति और उद्धार करने वाली हैं — हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! वन में, युद्ध में, भयंकर शत्रुओं के बीच, जल में, सङ्कट में, राजभवन में और आँधी में — हे देवि, आप ही एकमात्र रक्षा का साधन हैं — हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! अपार, अत्यन्त दुस्तर और घोर विपत्ति-सागर में डूबते हुए देहधारियों के लिए, हे देवि, आप ही उद्धार की नौका हैं — हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! हे चण्डिके, जिन्होंने अपनी प्रचण्ड भुजाओं की लीला से समस्त शत्रुओं को नष्ट कर डाला, आप ही विघ्नों के समूह को हरने वाली एकमात्र गति हैं — हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! आप ही सदा आराधित, सत्यवादिनी हैं; आप ही इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना नाड़ी हैं — हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! हे देवि दुर्गे, हे शिवे, हे भीमनादा, आप सरस्वती, अरुन्धती और अमोघस्वरूपा हैं; सत्पुरुषों की विभूति और कालरात्रि-स्वरूपा हैं — हे जगत्तारिणि, त्राहि दुर्गे! आप देवताओं, सिद्धों, विद्याधरों, मुनियों, श्रेष्ठ मनुष्यों, रोग से पीड़ितों, राजभवन में बन्दी और दस्युओं से त्रस्त जनों की एकमात्र शरण हैं — हे देवि दुर्गे, प्रसन्न होओ! यह आपत्ति से उद्धार करने वाला स्तोत्र मैंने कहा है। जो इसे तीनों सन्ध्याओं में अथवा एक बार भी पढ़ता है, वह घोर सङ्कट से छूट जाता है — इसमें सन्देह नहीं। जो भक्तियुक्त होकर इसका सम्पूर्ण अथवा एक श्लोक भी सदा पाठ करता है, वह समस्त पाप त्यागकर परम पद को प्राप्त करता है।

Origin & History

Source: Siddheshwari Tantra (Uma-Maheshwara Samvada)

Author: Traditional — revealed by Lord Shiva to Goddess Parvati

Period: Tantric/Puranic era

यह स्तोत्र सिद्धेश्वरी तन्त्र में शिव (महेश्वर) और पार्वती (उमा) के संवाद के रूप में आता है। संसार के दुःखों में फँसे प्राणियों पर करुणा से प्रेरित होकर शिव देवी को एक ऐसा स्तोत्र प्रकट करते हैं जिसका प्रयोजन ही (आपद्-उद्धार-हेतुकम्) भक्तों को हर प्रकार की आपत्ति से बचाना है। प्रत्येक श्लोक दिव्य माता को एकमात्र और अनन्य शरण के रूप में सीधी पुकार है, जो 'त्राहि दुर्गे' — 'मुझे बचाओ, हे दुर्गे' — की टेक पर समाप्त होती है।

Frequently Asked Questions

'आपदुद्धारक' का क्या अर्थ है?
आपद्-उद्धारक का अर्थ है 'आपत्ति से उद्धार करने वाला'। आपद् = विपत्ति/संकट, उद्धारक = उद्धार करने वाला। यह स्तोत्र हर प्रकार के अचानक आए संकट, आपदा और घोर विपत्ति से छूटने के लिए पढ़ा जाता है।
यह स्तोत्र कहाँ से आया है?
यह सिद्धेश्वरी तन्त्र से लिया गया है, जो उमा-महेश्वर संवाद के रूप में रचित है, जिसमें भगवान शिव देवी पार्वती को यह स्तोत्र सिखाते हैं। अतः इसे साक्षात् शिव से आया हुआ माना जाता है।
दुर्गा आपदुद्धारक स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
पारम्परिक रूप से इसका पाठ तीनों सन्ध्याओं (प्रातः, मध्याह्न और सायं) में, अथवा कम से कम दिन में एक बार किया जाता है। विशेष रूप से किसी भी संकट — रोग, यात्रा, संघर्ष, कानूनी विपत्ति या प्राकृतिक आपदा — के समय इसका पाठ किया जाता है।
क्या केवल एक श्लोक पढ़ना पर्याप्त है?
हाँ। अन्तिम फलश्रुति कहती है कि जो सम्पूर्ण स्तोत्र अथवा एक श्लोक भी भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह विपत्ति और पापों से मुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है, अतः श्रद्धा से पढ़ा गया एक श्लोक भी फलदायी माना जाता है।

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